प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अक्तूबर 2017
अंक -34

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- कवच


पाँचों पांडव और द्रोपदी अपने महल में बैठे चौसर खेल रहे हैं। सुधीर कुमार कैमरामैन रंजन के साथ वहाँ पहुँचता है। युधिष्ठर से मिलने का समय लिया गया था, अत: उन्हें सेविकाएँ अंदर ले आती हैं। दोनों सम्राट युधिष्ठर, साम्राज्ञी द्रौपदी और अन्य पांडवों को प्रणाम करते हैं। युधिष्ठर पूछते हैं- कहिए पत्रकार महोदय, कैसे आना हुआ।

"महाराज, हम यह जानना चाहते हैं कि महाभारत के युद्ध का उत्तरदायी कौन था?"
"क्यों? तुम्हें इसकी क्या ज़रूरत पड़ी?"
"महाराज, कलयुग में यह बहस का मुद्दा है, कुछ लोग कौरवों को उत्तरदायी मानते हैं तो कुछ..." सुधीर ने बात को बीच में ही छोड़ दिया।
"कुछ लोग क्या कहते हैं, निडर होकर कहो पत्रकार।"
"कुछ लोग आपको भी उत्तरदायी मानते हैं।"
"तभी तो वह कलयुग है।"
"मैं समझा नहीं?"
"यहाँ कौरवों का पक्ष लिया जाए, यहाँ धर्म के विरुद्ध लोग खड़ें हों, यहाँ हमें महाभारत का उत्तरदायी ठहराया जाए, वो तो निस्संदेह कलयुग ही होगा।"
"जी, फिर भी आप अपना पक्ष तो रखिए।"
"पक्ष तो वहाँ रखा जाता है, यहाँ विवाद हो। उस युद्ध के लिए कौन उत्तरदायी है, यह तो निर्विवादित है।"


"मगर महाराज, कलयुग में आपके चौसर खेलने पर प्रश्न उठते हैं।"
"कहा तो है, कलयुग इसीलिए कलयुग है।"
"मैं समझा नहीं।"
"झूठा दोषारोपण ही काम है वहाँ के लोगों का।"
"आप चौसर खेलने, पत्नी को दाँव पर लगाने को कैसे ठीक मानते हैं?"
"वो सब प्रभु की माया थी। आदमी उसके हाथ की कठपुतली है।"
"फिर तो युद्ध के लिए कौरव दोषी कैसे?"
"आप क्या कहना चाहते हैं पत्रकार महोदय?"
"मेरे कहने का भाव है कि फिर तो युद्ध भी प्रभु की माया हुई।"


युधिष्ठर बोलते इससे पहले ही द्रौपदी बोली- "आप महाराज से जुबान लड़ाते हैं?"
"नहीं, साम्राज्ञी हम तो..."
"इस बारे में सम्राट कोई बात नहीं करेंगे।" साम्राज्ञी ने आदेश दिया।
"ठीक है मगर आपसे भी एक प्रश्न पूछना था?"
"पूछिए।" साम्राज्ञी ने साड़ी के पल्लू को ठीक करते हुए कहा।
"कलयुग में चर्चा है कि आपने भी आग में घी डाला था।"
"मैं अबला क्या आग में घी डालूँगी, वैसे महाराज ने सही कहा है कि कलयुग इसीलिए कलयुग है।"
"क्या आपने दुर्योधन को अंधे का अँधा और कर्ण को सूत पुत्र नहीं कहा?"
"मेरी बात को तोड़-मरोड़कर पेश कर रहे हैं कलयुग के लोग।"
"मतलब आपका कोई दोष नहीं?"
"क्यों, आपको कोई संदेह है?"
"नहीं साम्राज्ञी, कोई संदेह नहीं।"
ऐसा कहकर सुधीर उठ खड़े हुए और उनसे विदा ली। रंजन ने उससे पूछा बाकियों से प्रश्न नहीं पूछना। सुधीर ने समय कम होने की बात कही और वे महल से बाहर निकल गए।


सुधीर और रंजन दुर्योधन के दरबार में पहुँचते हैं। नर्तकियाँ नृत्य कर रही हैं। नृत्य रुकवाकर सुधीर और रंजन को दुर्योधन के पास ले जाया जाता है। शिष्टाचार के बाद सुधीर प्रश्न करता है-
"युवराज, सम्राट युधिष्ठिर आपको युद्ध का उत्तरदायी मानते हैं।"
"वह तो है ही झूठा। ढोंगी, धर्मराज बना फिरता है, मगर कदम-कदम पर झूठ बोलता है।"
"लेकिन राज सिंहासन पर तो उसी का अधिकार था?"
"आप भी उसी की भाषा बोल रहे हैं?"
"नहीं युवराज, हम तो आपकी राय जानना चाहते हैं।"


"मेरी राय जाननी है तो सुनो, राज सिंहासन पर मेरा अधिकार था। मैं महाराज धृतराष्ट्र का ज्येष्ठ पुत्र था।"
"लेकिन आपके वंश में राजा भरत ने यह परम्परा शुरू की थी कि राजा वही होगा, जो योग्य होगा।"
"तो किसने कहा कि मैं योग्य नहीं था।" दुर्योधन ने गुस्से से चीखते हुए कहा। फिर कुछ शांत होकर बोले, “वो तो कपटी मुरली वाले के कारण हम हारे, अन्यथा हमने अपनी योग्यता सिद्ध कर दी होती और रही बात परम्परा की तो परम्पराएं तो बनती ही टूटने के लिए हैं।"
"आपने द्रौपदी के साथ भी दुर्व्यवहार किया था।"
"वो हमारी दासी थी।"
"फिर भी थी तो नारी।"
"दासियाँ सिर्फ दासियाँ होती हैं।"
"लेकिन इससे युद्ध की भूमिका तो बनी।"


"युद्ध तो उसी दिन निश्चित हो गया था, जिस दिन वे कपटी सिंहासन पर अपना अधिकार जताने लगे थे।"
"यानी दोष पांडवों का था?"
"आपको कोई शक?"
"नहीं, लेकिन भीष्म पितामह ने तो समझौता करवाना चाहा था।"
"वह बुढ्ढा तो था ही उनके पक्ष का। हरामी ने जिस थाली में खाया, उसी में छेद किया।"
"आपके पिता की भूमिका?"
"वे तो बेचारे थे ही अंधे। सब कपटी लोग उन्हें घेरे हुए थे। मेरे मामा श्री ने मुझे दिशा दिखाई। हमें अपने अधिकार के लिए लड़ना पड़ा और अगर वह कपटी मुरली वाला नहीं होता तो हम जीत गए होते।"
"आपके मामा श्री से बात हो सकती है?"
"नहीं, वे पांसों की पूजा कर रहे हैं।"


इसके बाद सुधीर और रंजन वहाँ से चल दिए। दुर्योधन के रंगमहल के बगल में ही कर्ण का भवन था। कर्ण बाहर टहलते हुए मिल गए। प्रणाम करके सुधीर ने पूछा- "आपको कौन्तेय कहें या राधेय?"
"कुछ भी कहो। इस हतभाग्य को क्या अंतर पड़ना है।"
"आप पर आरोप है कि आपने दोस्ती का धर्म नहीं निभाया।"
"झूठ, लगता है कि आप दोस्ती का अर्थ नहीं जानते। अगर मैंने दोस्ती का धर्म नहीं निभाया तो कोई नहीं निभा सकता।"
"आप पर आरोप लगता है कि आपने अपने दोस्त का गलत कार्यों में साथ दिया?"
"मैं दल-बदलू नहीं, जो उसका साथ छोड़ देता।"
"साथ तो न छोड़ते मगर समझा तो सकते थे।"
"यह साथ छोड़ने का बहाना ही है। समझाने की आड़ लेकर ही लोग साथ छोड़ते हैं।"
इतना कहकर कर्ण भीतर चले गए। सुधीर और रंजन आगे बढ़ चले।



अगला महल धृतराष्ट्र का था। सुधीर और रंजन वहाँ पहुँचते हैं। धृतराष्ट्र पूछते हैं- "कौन?"
"मैं पत्रकार सुधीर हूँ, कैमरामैन रंजन के साथ। हम कलयुग से आए हैं।"
"ज़रूर आपको कपटी कृष्ण ने भेजा होगा।"
"नहीं महाराज, हम तो कलयुग से हैं। आपसे कुछ प्रश्न पूछने हैं।"
"पूछिए, पूछिए। मुझसे तो सबने प्रश्न ही पूछे हैं।" धृतराष्ट्र ने दुखी होकर कहा।
"महाराज आपने युद्ध क्यों होने दिया?"
"मैं अंधा क्या कर सकता था?"
"आप महाराज थे।"
"महाराज! हाँ, महाराज तो था मैं मगर नाम का। दरअसल मोहरा मात्र था मैं। वास्तविक राज तो भीष्म और विदुर चला रहा थे। सब मेरे पुत्र के विरुद्ध थे।"


सुधीर गांधारी की तरफ रुख करता है- "महारानी हम आप से भी एक प्रश्न पूछना चाहते हैं?"
"पूछिए।"
"आपने आँखों पर पट्टी क्यों बाँधी?"
"क्या आपको दिखता नहीं कि मेरे पति अंधे हैं।"
"वो तो ठीक है, मगर आप अपने पति की आँखें बन सकती थी।"
"ये आपके कलयुग में होता होगा कि पति अंधा हो तो पत्नी दूसरों से आँख मट्टका करे।"
"आप बात नहीं समझीं।"
"सब समझती हूँ मैं तुम पुरुषों की चालबाजियाँ। पट्टी बाँध ली तो आरोप, न बांधती तो आरोप। आप यहाँ से चले जाएँ, हमें कोई उत्तर नहीं देना।"

सुधीर और रंजन वहाँ से प्रस्थान करते हैं।


अगला महल भीष्म का था। महल में भीष्म, द्रोण, विदुर गहन चिन्तन में डूबे मिलते हैं। सुधीर और रंजन भीतर पहुँचते हैं। भीष्म उनकी तरफ देखते हैं, मगर उसी तरह चिंतित मुद्रा में बैठे रहते हैं।
सुधीर उनसे पूछता है- "आप बहुत गंभीर दिख रहे हैं।"
"समस्याएँ आदमी को गंभीर बना देती हैं वत्स।"
"हमें आपसे प्रश्न पूछना है।"
"पूछो, हमें न जाने किस-किस को उत्तर देना होगा।"
"आप युद्ध रोक सकते थे, मगर आपने मौन धारण किए रखा। ऐसा क्यों किया आपने?"
"मैं बंधा हुआ था। ये भी बंधे हुए थे।" उन्होंने द्रोण और विदुर की तरफ इशारा करते हुए उत्तर दिया।"
"कैसा बंधन?"
"प्रतिज्ञा का बंधन, व्रत का बंधन।"
"प्रतिज्ञा और व्रत को तोड़ा जा सकता है।"
"तुम क्या जानो इनका महत्त्व। निष्ठाएँ टूटनी नहीं चाहिए।"
"चाहे महाभारत हो जाए?"


इससे पहले कि भीष्म कोई उत्तर देते अमित की नींद टूट गई। सुनिधि उसे झंझोड़ रही थी। अमित स्वर्ग लोक से गिरकर बिस्तर पर आ पहुंचा था। उसने आँखें मसलते हुए ख़ुद से कहा- ये तो सपना था। सुनीधि जल्दी तैयार होने की कहकर किचन में चली जाती है। अमित को आज अपने बॉस से मिलना था। दरअसल वह देर रात तक इस मीटिंग के बारे में ही सोचता रहा था। उसकी टीम को एक बड़ा प्रोजेक्ट सौंपा गया था, जिसमें वे असफल रहे थे। उनकी असफलता के कारणों को जानने के लिए बॉस ने उसे बुलाया था। अमित रात को सोचते हुए सोया था कि असफलता का ठीकरा किसके सिर फोड़ा जाए। बचाव के लिए किन बहानों का सहारा लिया जाए। उसका दिमाग अब भी तरह-तरह से सोच रहा था। महाभारत के पात्रों की तरह उसे लग रहा था कि उसके पास भी कुछ हथियार और कवच हैं और वह बॉस को संतुष्ट कर लेगा | इसी विश्वास के साथ वह उठकर बाथरूम की तरफ चल पड़ा।


- दिलबाग विर्क
 
रचनाकार परिचय
दिलबाग विर्क

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