प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अक्तूबर 2017
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ख़ास मुलाक़ात

पाठ्यक्रमों में सम्मिलित होने से 'ग़ज़ल' पर आलोचना के द्वार खुले हैं- ज़हीर कुरेशी

 

ज़हीर साहब हस्ताक्षर की सम्पादक प्रीति 'अज्ञात' के साथ

 

ग़ज़ल की दुनिया में ज़हीर क़ुरेशी आज जिस मक़ाम पर हैं, वहाँ होना हर ग़ज़लकार के लिए एक ख़्वाहिश जैसा है। उनकी ग़ज़लें विशुद्ध आज की ग़ज़लें हैं। उनके वहाँ सिर्फ हिन्दी भाषा का शुद्ध स्वरूप ही नहीं, बल्कि शुद्ध हिन्दी की शैली और परिवेश भी मिलता है। और यही एक वजह उन्हें अन्य तमाम ग़ज़लकारों से अलग खड़ा करती है। बहुत ही सादा मिज़ाज और सरल व्यक्तित्व के मालिक ज़हीर साहब जब किसी मुद्दे पर बात करते हैं, तो पूरी तरह खुलकर बोलते हैं। अपने दृष्टिकोण पर अडिग दिखते हैं।
ग़ज़ल के लिए निरन्तर सक्रीय ज़हीर साहब की इन दिनों एक संपादित पुस्तक आई है '
कुछ भूले-बिसरे शायर'। यह पुस्तक कई मायनों में बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस बार मैंने जब 'हस्ताक्षर' के लिए उनसे 'बातचीत' की तो मुझे भी उन्हें बेहतर तरीक़े से जानने-समझने का मौका मिला। हमारी बातचीत में दो-तीन चीज़ें ऐसी थीं जिसके लिए मैंने अब तक कई ग़ज़लकारों को टटोला था लेकिन उनका सटीक जवाब सिर्फ़ ज़हीर साहब के पास मिला। इस 'ख़ास-मुलाक़ात' में आप पढेंगे इनसे जुड़ी बहुत-सी ख़ास बातें।
- के. पी. अनमोल

 

 

अनमोल- अपने जीवन के आरंभिक समय, शिक्षा और परिवार के बारे में कुछ बताइए।
ज़हीर साहब- किसी भी सृजन-धर्मी का मनोजगत बचपन से ही बनता है। उसके बनने में किशोरावस्था के अनेक कारक चुपचाप अपना काम करते रहते हैं। कई बार जब मैं अपने बचपन...अपनी किशोरावस्था को याद करता हूँ- तो याद आती है अपनी जन्म स्थली चन्देरी (ज़िला अशोकनगर, मध्य-प्रदेश)। अपना निम्न-मध्यवर्गीय परिवार संसाधनों की कमी। अभाव। लेकिन, अनेक प्रतिकूलताओं के बावजूद आगे बढने की उत्कट अभिलाषा!
मेरी ग़ज़ल का एक शेर है-


मैं अचानक ही पिता के प्यार से वंचित हुआ
छह बरस की उम्र लगते ही पिता जाता रहा!

जी हाँ, जब मैं अपनी आयु के 6 वर्ष भी पूरे नहीं कर पाया था, 'कैंसर' जैसी असाध्य बीमारी से मेरे पिता शेख़ नज़ीर मोहम्मद साहब का देहावसान हो गया। उस घटना ने मेरे बाल-मन पर गहरा प्रभाव छोड़ा। आज भी मुझे अपने पिता की शक्ल याद नहीं। पिता के अवसान के बाद, बहादुर माँ श्रीमती मासूमा बेग़म और मेरे बड़े भाई शेख़ बशीर मोहम्मद ने परिवार का मोर्चा सम्हाला। बशीर भाई से छोटे और मुझसे बड़े एक भाई और हैं- शेख़ क़दीर कुरेशी ‘दर्द’। माँ के अलावा, तीन भाई, बड़ी भाभी और नन्हीं भतीजी- उस समय यही संयुक्त परिवार था हमारा।

पहली कक्षा से बारहवीं (इन्टरमीडिएट) तक की मेरी शिक्षा चन्देरी में ही हुई। बाद की शिक्षा के लिए मैं (सोफ़िया कॉलेज) भोपाल चला आया। फिर नौकरी के सिलसिले में बीती सदी के वर्ष 1971 में ग्वालियर (म.प्र.) चला गया- जहाँ मैं और मेरा परिवार (पत्नी, बेटा, बेटी) पूरे बयालीस वर्ष रहा। फिर कुछ ऐसी परिस्थितियाँ बनीं कि विगत 5 वर्ष पहले मैं ग्वालियर से पूरी तरह शिफ्ट होकर भोपाल आ बसा।

 

अनमोल- लेखन की तरफ जुड़ाव कैसे और कब हुआ, जानना चाहूँगा?
ज़हीर साहब- लेखन की शुरूआत चन्देरी में ही हुई। मुझसे छह वर्ष बड़े भाई शेख़ क़दीर कुरेशी ‘दर्द’ हैं, जिन्हें ग़ज़ल-गीत लिखने का शौक था। उन्हीं का पदानुगमन करते हुए, मैंने संभवत: 1964 से लिखना शुरू किया- जब मैं सातवीं कक्षा में पढ़ता था। शाम को चन्देरी में नियमित रूप से सार्वजनिक वाचनालय जाता। लगभग दो घंटे रोज़ अखबार और पत्रिकाएँ पढ़ता। वाचनालय की कविता-पुस्तकें, कहानी-संग्रह और उपन्यास भी ‘इशू’ करवा के पढ़ता रहा मैं।

 

अनमोल- जब लेखन शुरू किया तो किस तरह का साहित्यिक माहौल मिला? उस समय के कुछ रोचक अनुभव साझा करना चाहेंगे?
ज़हीर साहब- आरंभिक तौर पर चन्देरी का ही साहित्यिक माहौल था मेरे सामने। उस समय 20000 आबादी वाला यह छोटा-सा क़स्बा था। सार्वजनिक वाचनालय वहाँ एकमात्र स्थल था, जहाँ द्वैमासिक साहित्यिक गोष्ठियाँ होती थीं। सक्रिय कवियों के नाम पर, उस समय सर्वश्री कुन्दन लाल ‘भारतीय’, चम्पालाल सिंघई, राम भरोसे चौरसिया, शम्स साहब ही ऐसे लोग थे- जिन्हें क़स्बे भर की आबादी जानती थी। मैं बहुत नया था। द्वैमासिक गोष्ठियों में प्राय: मुझे ओपनिंग बैट्समैन की तरह उपयोग किया जाता था। उस समय, किसी ने भी नहीं सोचा था कि एक-एक रन लेकर हिन्दी ग़ज़ल के क्षेत्र में मेरा शतक पूरा हो जाएगा। मैंने भी ग़ज़ल-रचना-अवदान में यहाँ तक पहुँचने की उम्मीद नहीं की थी।

 

अनमोल- क्रिकेट की ज़बान में आपने बहुत सटीक बात कह दी! बहरहाल इस दौर की हिन्दी ग़ज़ल के आप प्रमुख हस्ताक्षर हैं। आपके नज़रिए से ग़ज़ल की प्रवृत्ति कैसी होनी चाहिए? आज की ग़ज़ल के बारे में क्या कहेंगे?
ज़हीर साहब- अगर साढ़े तीन सौ साल के इतिहास को खँगाला जाए तो बरास्ता ग़ज़ल फ़ारसी से उर्दू में और उर्दू से हिन्दी में आई। मुख्य रूप से उर्दू ग़ज़ल का पल्लवन दरबारों, ख़ानकाहों से होते हुए आम आदमी की भावधारा तक हुआ। उस काल का एक बड़ा मीडिया ग़ज़लों का कोठों पर गाया जाना भी था। अत: ग़ज़लों को म्यूजि़कल बनाने पर ही सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया जाता था, उस समय। एक वक़्त तो ऐसा आया कि उर्दू के शब्दों को म्यूजि़कल और नॉन म्यूजि़कल दो वर्गों में बाँट कर, तय कर दिया गया कि ग़ज़ल म्यूजि़कल लफ्ज़ों में ही स्वीकार्य होगी। उर्दू ग़ज़ल में वह अतिवादिता कमोबेश आज तक चली आ रही है। संगीत-उन्मुख होने के कारण, उस समय की उर्दू ग़ज़ल ने परोक्ष रूप से समकालीनता से परहेज़ किया।

हिन्दी ग़ज़ल आज की यानी विचार युग की ग़ज़ल है। वह कोठों पर गाई जाने वाली संगीत-पगी ग़ज़ल नहीं, बल्कि खेतों, कारखानों, दफ़्तरों में काम करते हुए रफ-टफ आदमी की भावनाओं की कलात्मक अभिव्यक्ति है। दुष्यंत से आरंभ हिन्दी ग़ज़ल ने ग़ज़ल की शैली में सबसे पहले समकालीन ज्वलंत मुद्दों को उठाना आरंभ किया। पाँच दशक आयु की इस विधा के प्रमुख सामयिक संदर्भों में हमारे मुल्क की राजनीति सबसे ऊपर है। वर्तमान भारतीय राजनीति, उसकी कुटिलता, धर्म के साथ उसका घाल-मेल, वोटों का प्रबंधन आदि विषयों पर सैकड़ों हिन्दी ग़ज़लकारों ने शेर कहे हैं।
जब भी मैं आज की ग़ज़ल की भाव-धारा की पड़ताल करता हूँ तो पाता हूँ कि बाज़ारवाद पर भी हिन्दी ग़ज़लकारों की पैनी नज़र है। विश्व-बाज़ार और उसके अनुसार बदलता मनुष्य का मन, बाज़ार के अनुसार बदलती आकाँक्षाएं, सीमा से बाहर जाने पर उसके दुष्परिणाम आदि समकालीन विषयों पर उल्लेखनीय शेर कहे जा रहे हैं।

उपरोक्त विषयों के अलावा भी, हिन्दी ग़ज़ल ने मनुष्य की वर्तमान सामाजिक चेतना में हस्तक्षेप किया है और विभिन्न समकालीन संदर्भों पर शेर कहे हैं। उन समकालीन विषयों में आतंकवाद, आधुनिक टेक्नालॉजी, पर्यावरण-विनाश भी प्रमुख मुद्दे हैं। आज के सामयिक संदर्भों में भारतीय किसान की पीड़ा, उसकी मौसम पर निर्भरता, किसान की आकांक्षाएं, आशा-निराशा, ख़ुदकुशी पर भी जागरुक हिन्दी ग़ज़लकार शेर कह रहे हैं।
समय-सापेक्ष हिन्दी ग़ज़ल की वर्तमान प्रवृत्ति तो यही है!

 

अनमोल- ग़ज़ल को उर्दू और हिन्दी के खाँचों में बाँटने की कितनी ज़रूरत महसूस करते हैं?
ज़हीर साहब- यह प्रश्न मुझसे अक्सर पूछा जाता है। यह प्रश्न लगभग वैसा ही है कि हम मनुष्य को हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी और बौद्ध का चश्मा लगाकर क्यों देखते हैं?

मेरे विचार से ग़ज़ल के अरूज़ और मेनरिज़्म में हमने कोई परिवर्तन नहीं किया है। हिन्दी ग़ज़ल को परखने के लिए भी हम अरेबिक अर्कानों का ही उपयोग करते हैं। लेकिन, भाषिक रूप से, इतिहास ने हिन्दी और उर्दू को दो भाषाओं के रूप में विभाजित कर दिया है। दोनों भाषाओं की लिपियाँ अलग-अलग हैं। एक को हम दायीं ओर से लिखते हैं तो दूसरी को बायीं ओर से। आप हिन्दी और उर्दू को एक भाषा की दो शैलियाँ कहते रहिए, लेकिन, दोनों भाषाओं का मैनरिज़्म, मुहावरे, मिथक अलग-अलग हैं। मैं पूछता हूँ कि जब हम सुविधा के लिए 'भारतीय नागरिक', 'पाकिस्तानी नागरिक', 'अमेरिकी नागरिक' कह सकते हैं, तो 'हिन्दी ग़ज़ल' कहने में आपत्ति क्यों?

 

अनमोल- मैंने यह प्रश्न आपसे पहले भी कई ग़ज़लकारों से किया है लेकिन सबसे ज़्यादा संतुष्टिप्रद उत्तर आपसे ही मिला, शुक्रिया।
'आज की हिन्दी ग़ज़ल, उर्दू ग़ज़ल के समकक्ष आ खड़ी है' क्या कहेंगे आप?

ज़हीर साहब- सबसे पहली बात तो यह गाँठ बाँध लें कि हिन्दी ग़ज़ल की उर्दू ग़ज़ल से कोई स्पर्धा नहीं है। उर्दू ग़ज़ल की ज़मीन पर चल कर ही हिन्दी की भाषा प्रकृति के अनुरूप हिन्दी काव्य में ग़ज़ल का यह रूप विकसित हुआ है। इस बात को यूँ भी समझा जा सकता है कि जैसे फ़ारसी ग़ज़ल की राह पर चलकर उर्दू ग़ज़ल ने आकार ग्रहण किया। उसी प्रकार, उर्दू ग़ज़ल के मार्ग पर चलकर हिन्दी ग़ज़ल पल्लवित हुई है.... हो रही है। समकालीनता के स्तर पर, आज हिन्दी ग़ज़ल की स्पर्धा उर्दू ग़जल से नहीं, बल्कि हिन्दी की छन्द मुक्त और मुक्तछन्द कविता से है।

 

अनमोल- बहुत सही। आप के नज़रिए से हिन्दी ग़ज़ल की राह में कौन-कौनसी चुनौतियाँ हैं, जिन पर समय रहते विचार किया जाना ज़रूरी है?
ज़हीर साहब- अनमोल साहब, आपके इस प्रश्न का माकूल जवाब देने के लिए एक पूरा आलेख लिखने की आवश्यकता है। फिर भी, संक्षेप में मैं हिन्दी ग़ज़ल की राह में आने वाली प्रमुख चुनौतियों पर बात करूँगा- जिन पर समय रहते विचार किया जाना ज़रूरी है।
हिन्दी काव्य-जगत में, मुक्त-छंद या छंद मुक्त कविता की तुलना में, हिन्दी ग़ज़ल के प्रति उपेक्षा या विरोध का भाव होने के बावजूद, ग़ज़ल आज भी अपना महत्व अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है। हिन्दी ग़ज़ल की सबसे बड़ी चुनौती है- समकालीन हिन्दी कविता संसार द्वारा हिन्दी ग़ज़ल को आलोचकीय ख़ातिर में न लाना! समकालीन हिन्दी आलोचना में आज जो लोग शिखर पर हैं, वे काव्य-विमर्श या समीक्षाओं में हिन्दी ग़ज़ल या गीत (गीति कविता) पर बात ही नहीं करते। और अगर बात करते भी हैं तो उनका लहजा बहुत तुर्श और नकारात्मक होता है।

मुझे यह बात कहने में कोई संकोच नहीं है कि समकालीन हिन्दी कविता के समालोचना सेक्टर पर 'फ्री वर्स पोइट्री' पक्षधरों का वर्चस्व है। वे हिन्दी ग़ज़ल को 'लोकप्रिय कविता' कह कर टालने की कोशिश कर रहे हैं। पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से लगातार छपने की प्रक्रिया तक हिन्दी ग़ज़ल या लिरिकल पोइट्री से उन्हें कोई ख़तरा नज़र नहीं आता। लेकिन, कविता की समकालीन आलोचना में वे हिन्दी ग़ज़ल या गेय कविता को उसका हिस्सा देना नहीं चाहते। आज आवश्यकता है कि हिन्दी ग़ज़ल अपने निष्पक्ष आलोचक स्वयं पैदा करे।

इधर हमारे हिन्दी ग़ज़ल संसार में कुछेक ऐसे ग़ज़लगो हैं- जो मुक्त-छंद और छंद मुक्त कविताएं भी लिखते हैं और ग़ज़लें भी कहते हैं। ऐसे कवियों में, सर्वश्री देवेन्द्र आर्य, नूर मोहम्मद नूर, रामकुमार कृषक, सुलतान अहमद, हरेराम समीप, कुमार विनोद, विनय मिश्र और मालिनी गौतम के नाम प्रमुखता से लिए जा सकते हैं। ग़ज़ल के अलावा, एक अन्य काव्य-रूप अपनाने में कोई हानि भी नहीं है। लेकिन, मैं अपने इन मित्रों से इतना ज़रूर जानना चाहूँगा कि वे हिन्दी ग़ज़ल को (अपने ख़ालिस छंद मुक्त या मुक्त छंद कवि साथियों की तर्ज़ पर) समकालीन कविता मानते हैं अथवा नहीं? अगर मानते हैं तो क्या वे छंद मुक्त कविता के बरअक्स शेरों के उपयुक्त उदाहरण देते हुए इस आशय का विमर्श करने को तैयार हैं? कहीं हमारे ये साथी हिन्दी ग़ज़ल को स्वाद बदल विधा के रूप में तो नहीं अपनाए हुए!

हिन्दी ग़ज़ल की एक आन्तरिक चुनौती भी है। वह है हिन्दी ग़ज़ल की भाषिक समस्या। फिलहाल हिन्दी ग़ज़ल की सबसे बड़ी कठिनाई यही है कि उसकी कोई सर्वमान्य मानक भाषा नहीं है। लेकिन दोस्तो, हिन्दी ग़ज़ल की भाषिक समस्या ऐसी बिल्कुल नहीं है, जिसको हल ही न किया जा सके।
अपने व्यक्तिगत आग्रहों-दुराग्रहों..... लाभ-हानियों को छोड़कर हम ग़ज़लकार उसे जब भी हल करने बैठेंगे, तो हम निश्चित ही हिन्दी ग़ज़ल की इस आँतरिक चुनौती से पार पा सकेंगे। यह हमारी अपनी निजी समस्या है। इसे हल करने के लिए हमें किसी दूसरे शिविर के पास नहीं जाना।

 

अनमोल- आज हिन्दुस्तानी ग़ज़ल को किस मुकाम पर पाते हैं आप? इस क्षेत्र में युवाओं से क्या आशा है और इस धारा के युवा ग़ज़लकारों से कितना संतुष्ट हैं?
ज़हीर साहब- जहाँ तक हिन्दुस्तानी ग़ज़ल का सवाल है- उसके दायरे में उर्दू और हिन्दी ग़ज़ल दोनों आती हैं। विषय तो दोनों ओर ही ग़ज़लों के बदले हैं। लेकिन, उर्दू ग़ज़ल जहाँ कमो-बेश शालीन है, वहाँ हिन्दी ग़ज़ल अधिक मुखर एवं आक्रामक दिखाई देती है।जहाँ तक युवाओं का सवाल है तो तेज़-रफ़्तार जीवन उनकी मानसिकता में शामिल हो गया है। उस तेज़ रफ्तारी और आक्रामकता के लिहाज से उन्हें छंद मुक्त और मुक्त छंद कविता अधिक रास आती है- जिसमें उन्मुक्तता पर कोई लगाम नहीं, जहाँ शब्दों की मितव्ययता नहीं करनी, जिसमें निर्बंध हो कर लिखा जा सकता है।

गज़ल के क्षेत्र में प्राय: वे ही युवा प्रवेश करते हैं- जिनमें थोड़ा-बहुत धैर्य विद्यमान है, जो अनुशासन को बोझ नहीं समझते, जिनमें राग और लय के प्रति एक प्रकार का मोह दिखाई देता है। ऐसे अधिकाँश युवा रूमानी शेर कहने से शुरूआत करते हुए, उर्दू सीखना आरंभ कर देते हैं। फिर किसी (शायर) अरूज़ी से ग़ज़ल का छंद- विज्ञान ग्रहण करते हुए, प्राय: उर्दू मिज़ाज की ग़ज़ल कहने की ओर उनका रुझान होता जाता है। इस प्रक्रिया से गुज़रने वाले, भोपाल के अनेक युवा ग़ज़लगो मुझसे आकर मिलते हैं। कहते हैं- हम आपकी भाषा-शैली में शेर कहना चाहते हैं, लेकिन, हिम्मत नहीं जुटा पाते!
फिर भी, हिन्दी अथवा उर्दू में शेर कहने वाले अधिकाँश युवाओं का कथ्य तुलनात्मक रूप से नया है। ग़ज़ल का छंद-विज्ञान सीखने की कोशिश के बावजूद, उनके यहाँ वज़्न और बहर की न्यूनतम ग़लतियाँ भी मिलती हैं। मैं ग़ज़ल-धारा के युवाओं के रचनात्मक प्रयत्न से फिलहाल काफी हद तक संतुष्ट हूँ।

 

अनमोल- स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में सम्मिलित होने वाले पहले ग़ज़लकार हैं आप। आपके रचना-कर्म पर अब तक पाँच लघु-शोध और दो पी.एच-डी हो चुकी हैं। दुष्यंत साहब और फिराक साहब भी पिछले कुछ सालों से विश्व-विद्यालयीन पाठ्यक्रमों में पढ़ाए जा रहे हैं। कितना ज़रूरी समझते हैं आप ग़ज़लों का उपरोक्त पाठ्यक्रमों में सम्मिलित होना?
ज़हीर साहब- देखिए, पाठ्यक्रमों में सम्मिलित रचनाकार को पीढ़ियाँ याद रखती हैं। आज प्रेमचंद, निराला, महादेवी, पंत, प्रसाद हमें इसीलिए याद हैं, क्योंकि इन सभी कवि-लेखकों को कभी हमने अपने पाठ्यक्रम में पढ़ा था। इस संदर्भ में, मैं आपको एक सच्ची घटना सुनाने का लोभ-संवरण नहीं कर पा रहा हूँ।
उन दिनों मेरी कुल 25 ग़ज़लें उत्तर महाराष्ट्र वि.वि. जलगाँव और स्वामी रामानंद तीर्थ मराठवाड़ा वि.वि. नाँदेड़ के एम.ए. (हिन्दी) चतुर्थ सेमिस्टर पाठ्यक्रम में निर्धारित थीं।..... एक बार, मझे 'समकालीन हिन्दी ग़ज़ल का परिदृश्य' विषय पर व्याख्यान देने और ग़ज़ल-पाठ करने के लिए उत्तर महाराष्ट्र वि.वि. जलगाँव बुलाया गया। विद्यार्थियों एवं प्राध्यापकों से खचाखच भरे हॉल में सफलता-पूर्वक अपना वक्तव्य एवं रचना-पाठ समाप्त करने के बाद, मैं जैसे ही हॉल से बाहर निकला, 3-4 लड़कियों ने मुझे घेर लिया, कहा, "सर, अपने पाठ्यक्रम में हम आपकी ग़ज़लें पढ़ रहे हैं। हमें विश्वास ही नहीं हो रहा, आप हमारे सामने हैं। इसलिए हम आपको छू कर देखना चाहते हैं!" तो पाठ्यक्रम में सम्मिलित रचनाकार का दर्जा इतना अद्भुत होता है, अनमोल जी!

'हिन्दी ग़ज़ल' जैसी विधा के एम.ए. या बी.ए. पाठ्यक्रमों में सम्मिलित होने से 'ग़ज़ल' पर समीक्षा और आलोचना के द्वार खुले हैं। हिन्दी काव्य में मुख्य-धारा की कविता होने का ग़ज़ल का मार्ग यूँ भी प्रशस्त हो रहा है।

 

अनमोल- 'पाठ्यक्रमों में सम्मिलित होने से 'ग़ज़ल' पर समीक्षा और आलोचना के द्वार खुले हैं' बहुत सही, पूरी तरह सहमत हूँ। ज़हीर कुरेशी एक बहुत विनम्र और सादगी-पसंद शख्सियत हैं। इस चकाचौंध से सामंजस्य किस तरह बिठाते हैं?

ज़हीर साहब- अगर आपके मन में तरह-तरह की कामनाएँ कुलाँचें भर रही हैं तो जल्दी ही आपकी विनम्रता और सादगी का भरम खुल जाएगा। इक्कीसवीं सदी की साहित्यिक चकाचौंध आपको आकर्षित करने लगेगी और कुछ पाने की इच्छा में आप तरह-तरह के समझौते करने के लिए तैयार हो जायेंगे। 'जाको कछू न चाहिए, वाही शाहंशाह' को अपना ध्येय-वाक्य मानने वाले साहित्यकार को चकाचौंध से सामंजस्य नहीं बैठाना पड़ता।

 

अनमोल- ग़ज़ल के अलावा भी आपने कई और विधाओं में लेखन किया है। ग़ज़ल के बाद, किस विधा को अपने सबसे क़रीब पाते हैं?
ज़हीर साहब- नवगीत को।

 

अनमोल- आपकी भविष्य की साहित्यिक योजनाओं के बारे में जानना चाहेंगे।
ज़हीर साहब- हाल ही में, 5 अगस्त, 2017 को मैंने अपनी आयु के 67 वर्ष पूरे किये हैं। ग़ज़लकारों के रचना-संसार में, देश में संभवत: मैं अकेला रचनाकार हूँ- जो केवल हिन्दी ग़ज़ल पर केन्द्रित है। मेरे साथ के अधिकाँश रचनाकार ग़ज़ल को स्वाद, बदल विधा के रूप में अपनाए हुए हैं। उन लोगों में से एक हैं जो लब्ध-प्रतिष्ठ कथाकार हैं और ग़ज़लगो भी हैं। उनको लोग ग़ज़ल का आलोचक भी मानते हैं। मैंने आपके प्रश्न क्र. 7 के उत्तर में, ऐसे 8 हिन्दी ग़ज़लकारों का उल्लेख किया है, जो छन्द मुक्त और मुक्त छंद कविता लिखते-लिखते हिन्दी ग़ज़ल में भी प्रवत्त हैं। इन्हीं आठ में से, कुछ नवगीतकार और दोहाकार भी हैं।

हिन्दी ग़ज़ल पर केन्द्रित होने के कारण, मेरी भविष्य की समस्त साहित्यिक योजनाएँ हिन्दी ग़ज़ल के उन्नयन को लेकर ही हैं।

 

अनमोल- हाल ही आपकी एक संपादित पुस्तक 'कुछ भूले-बिसरे शायर' आई है। हम यहाँ इस पुस्तक के बारे में आपसे जानना चाहेंगे।
ज़हीर साहब- अनमोल जी, मैं पिछले दो सालों से 'अक्षर-पर्व' नामक एक मासिक पत्रिका के लिए 'कुछ भूले-बिसरे शायर' नाम से स्तम्भ लिख रहा हूँ, जो लगातार जारी है। इस स्तम्भ में किसी एक शायर की 15 ग़ज़लें, उसके परिचय और मेरी संपादकीय टिप्पणी के साथ प्रकाशित होती हैं। इसका उद्देश्य ऐसे बेहतरीन शायरों के लेखन पर प्रकाश डालना है, जो अपनी क्षमतानुसार ख्याति अर्जित नहीं कर पाये।
इसी स्तम्भ में पहले 12 शायरों पर प्रकाशित मेरे लेखों को भोपाल के पहले-पहल प्रकाशन ने पुस्तकाकार दिया है, स्तम्भ के नाम 'कुछ भूले-बिसरे शायर' से ही।

 

अनमोल- आपके व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में जान कर बहुत अच्छा लगा। 'हस्ताक्षर' के पाठकों को समय देने के लिए शुक्रिया! ...जाते-जाते अपने चाहने वालों के लिए कोई संदेश देना चाहेंगे?
ज़हीर साहब- अनमोल जी, मेरा एक चर्चित शेर है-

ऐसा भी स्वप्न देखने वाला मिला मुझे
साकार हो न पाया तो सपना बदल दिया

मैं अपने चाहने वालों से विनम्रता-पूर्वक एक ही बात कहना चाहता हूँ कि जागी आँखों से जो भी सपना देखें वह बहुत सुविचारित हो। एक बार स्वप्न देखने के बाद उसे साकार करके ही दम लें।  यानि जो भी सुविचार सपना देखें, उसे साकार करें, बदलें नहीं!


- ज़हीर क़ुरेशी
 
रचनाकार परिचय
ज़हीर क़ुरेशी

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