प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अक्तूबर 2017
अंक -34

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जो दिल कहे

गांधीवाद: अब सिद्धांत नहीं एक बिकाऊ प्रोडक्ट

 

भारत में यदि सबसे कम समझे जाने वाले व्यक्ति के बारे में मुझसे पूछा जाये तो निश्चित ही वह व्यक्ति होगा महात्मा गाँधी। दुर्भाग्य से, गाँधी शब्द आज सिर्फ उन लोगों का प्रतिनिधित्व करता है जो खादी के प्रचार-प्रसार के लिए सर्वोदय अभियान में जुटे हुए हैं, जो उन्हें सम्मान दिलाने की बजाय उन्हें हास्यस्पद बनाती है। इससे ज्यादा दुर्भाग्य की कोई बात और हो ही नहीं सकती है। गाँधी जी दुनिया के महानतम विचारकों में से एक थे। उनके ग्राम-पंचायत, न्यासत्व (ट्रस्टीशिप), मिश्रित अर्थव्यवस्था, जातिवाद, दबे कुचले शोषित समाज का उत्थान जैसे विचार आज भी सर्वाधिक प्रासंगिक एवं बहस के मुद्दे हैं। गाँधी जी का स्वछता का विचार आज इतना महत्वपूर्ण विषय बनकर उभरा है कि प्रधानमंत्री मोदी ने गाँधी जयंती (2014) के अवसर पर स्वच्छ भारत मिशन का अभियान प्रारंभ किया पर दुर्भाग्य से गाँधी अपने ही जीवन काल में आप्रसंगिक होते चले जा रहे थे और गांधीवाद एक अलंकृत विषय भर रह गया था।

 

एक लेख में कृपलानी लिखते हैं– "जब 2 अक्तूबर को उनके 78वें जन्मदिन पर दुनिया भर से बधाई सन्देश आने लगे, उन्होंने (गाँधी जी) पूछा कि क्या शोक सन्देश भेजना अधिक उपयुक्त नहीं होगा। उन्होंने अपने सभी शुभचिंतकों से यह प्रार्थना करने को कहा कि या तो मौजूदा तबाही का खात्मा हो या वह (भगवान) मुझे उठा लें, मैं नहीं चाहता कि भारत जब जल रहा हो तो मेरा एक और जन्मदिन आए। उन्होंने स्वीकार किया कि इस निरंतर मातृघात के फलस्वरूप मेरी 125 साल जीने की इच्छा पूरी तरह मर चुकी है। मैं इसका असहाय साक्षी नहीं बनना चाहता हूँ।"

दरअसल गाँधी के जीते जी उनके विचारों का क़त्ल होना शुरू हो गया था। वे चाहते थे कि आजादी मिल गयी, तो कांग्रेस को राजनीतिक दल के रूप में नहीं रहना चाहिए, जनसेवा में कांग्रेसियों को लग जाना चाहिए।

 

गाँधी जी मृत्यु पूर्व अपने जन्मदिन पर व्यथित हैं और कहते हैं– "क्या मैं वही गाँधी हूँ, जिसकी एक आवाज़ पर पूरा हिंदुस्तान खड़ा हो जाता था। आज कोई मेरा सुनने वाला नहीं।" ऐसा इसलिए हुआ क्यूंकि उनके बताये रस्ते पर चलने वाले सत्ता के मद में थे। स्वार्थ और अहंकार में डूबे हुए थे। गाँधी उनके लिए बीते दिनों की बात हो गये थे। कोई उनके रास्ते पर चलने को तैयार नहीं हुआ। अँगुलियों पर गिनाने वाले तैयार हुए। वैसे लोगो की संख्या तब भी कम थी और आज भी कम है। वे बुद्ध की तरह ही गांधीवाद के विरोधी थे। पर उनके शिष्यों ने वही किया, जो बुद्धिष्टों ने किया। जो-जो गाँधी नहीं चाहते थे, गाँधी के नाम पर गांधीवादियों ने वही किया। गाँधीजी का स्वराज उनकी आँखों के सामने ही समाप्त हो गया था। कांग्रेस स्वराज का मज़ाक उड़ाने लगी थी। नोआखाली में गाँधी जी ने प्रो. निर्मल कुमार बोस को कहा था “मैं सफल होकर मरना चाहता हूँ, विफल होकर नहीं। पर हो सकता है कि विफल ही मरुँ।"

 

सारा संसार महात्मा गाँधी के बताये रास्ते पर चल रहा है, मान रहा है। इससे अधिक कहीं गाँधी जी को बेचा जा रहा है। सबसे अधिक बिक रहे हैं आज गाँधी। स्विट्ज़रलैंड की मांट ब्लांक जैसी मशहूर कंपनी ने नमक आन्दोलन की स्मृति में कलम निकाला। इसमें सोने की नीब पर गाँधी जी का चित्र उत्कीर्ण था और कीमत 14 लाख रूपये थी। 1990 में एप्पल कंपनी ने मैकिंतोश कंप्यूटर को लांच किया था। उसने इस अवसर पर ग्राहकों के लिए कोल्लेक्टोर्स कप को जारी किया था, जिस पर गाँधी जी बैकग्राउंड में ध्यानावस्था में थे और उसके ऊपर लिखा था– बी द चेंज व्हाट यू वांट टू सी इन द वर्ल्ड।

 

मशहूर कार कंपनी ऑडी ने अपने प्रचार में गाँधी जी का इस्तेमाल किया और जानकर आश्चर्य होगा कि ऐसा उसने स्पेन में किया एवं कंपनी गाँधी जी को भुनाने में सफल रही। गाँधी जी पर फिल्म बनी गाँधी, जिसने कई पुरस्कार जीते। गाँधी जी पर और एक फिल्म बनी मुन्ना भाई। इसमें एक नए शब्द का प्रयोग किया गया- गांधीगिरी। गाँधी जी व्यवसाय के कभी ख़िलाफ़ नहीं थे। उन्होंने तो कहा था- "दुकान मंदिर है और सामान बेचना पूजा है।" ग्राहक भगवान है और हम ग्राहक के ऊपर निर्भर है न की ग्राहक दूकानदार पर क्यूंकि ग्राहक के पास कई विकल्प हैं।

आज बाज़ार ने इंसान को हैवान बना दिया है। किसी भी तरह लक्ष्य को पाने की इच्छा, चाहे जो भी करना पड़े। बाजार के निर्माता ने लोभ, लालच, क्रोध, भोग, मोह को बढ़ावा दिया है, जिसके चलते आदमी की हवस बढ़ी है। गांधी जी कहा करते थे- "धरती तुम्हारी आवश्यकता पूरी कर सकती है, लोभ को नहीं।"

 

बुद्ध ने मनुष्य के सर्वांगीण विकास के लिए अष्टांगिक मार्ग बताये थे, उसी तरह गाँधी जी ने भी सात सामाजिक पाप का जिक्र किया था। 22 अक्तूबर, 1925 को यंग इंडिया में भी प्रकाशित किया गया था, जो इस प्रकार है-

1. सिद्धांत के बिना राजनीति 2. कर्म के बिना धन 3. आत्मा के बिना सुख 4. चरित्र के बिना धन 5. नैतिकता के बिना व्यापार 6. मानवीयता के बिना विज्ञान 7. त्याग के बिना पूजा।

 

आज दुनिया के किसी भी कोने में शांति मार्च निकलना हों अथवा अत्याचार व हिंसा का विरोध किया जाना हो, या हिंसा का जवाब अहिंसा से दिया जाना हो, ऐसे सभी अवसरों पर पूरी दुनिया को गाँधी जी की याद आ जाती है और हमेशा याद आती रहेगी। अतः यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि गाँधी जी, उनके विचार, उनके दर्शन तथा उनके सिद्धांत कल भी प्रासंगिक थे, आज भी है और आने वाले समय में जब तक धरती पर मानवता की बात होगी, प्रासंगिक रहेंगे।

चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष में हम शपथ लें कि मज़बूरी का नाम महात्मा गाँधी की धारणा को भूल एक बार फिर से हम गाँधी को समझने की चेष्टा करें, यही हमारी तरफ से उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।


- नीरज कृष्ण