प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अक्तूबर 2017
अंक -42

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

उभरते-स्वर

सपने

सपने तो देखो तुम
सच हो या न हो।

सपने ही बनाते हैं
कर्म करने की राह
सपने ही पैदा करते हैं
ज़िंदगी की चाह

सपने ही कम करते
असफलता की आह
और भर देते हैं
संघर्ष का उत्साह

सपने तो देखो तुम
सच हो या न हो।

सपने होते हैं अपने
अस्तित्व की पहचान
सपने होते हैं
अात्मज्ञान का गान

सपने ही देते हैं
आत्मविश्वास को प्राण
सपने ही दिलाते हैं
अतत: आत्मसम्मान

सपने तो देखो तुम
सच हो या न हो।


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साथ तुम्हारा ऐसे जैसे


साथ तुम्हारा ऐसे जैसे
सहरा पर बरसी घटाएँ हो
साथ तुम्हारा ऐसे जैसे
खुशबू से महकी फ़िज़ाएँ हो

साथ तुम्हारा ऐसे जैसे
बिन मौसम के फूल खिले
साथ तुम्हारा ऐसे जैसे
हवाओं मे संगीत घुले

साथ तुम्हारा ऐसे जैसे
एहसासों का सागर हो
साथ तुम्हारा ऐसे जैसे
स्वर्ण घट भरा गागर हो

साथ तुम्हारा ऐसे जैसे
भावों के मेले हो
साथ तुम्हारा ऐसे जैसे
हम तुम एक-दूजे के हो

साथ तुम्हारा प्यार है जानम
साथ तुम्हारा सबकुछ है
साथ तुम्हारा साँस है मेरी
जिसके बिना जीवन ही नहीं


- कंचन अपराजिता
 
रचनाकार परिचय
कंचन अपराजिता

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