प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितंबर 2017
अंक -31

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संपादकीय
आख़िर हम कर ही क्या सकते हैं?
 
 
गुरुग्राम के प्रतिष्ठित विद्यालय में एक मासूम बच्चे प्रद्युम्न की जघन्य हत्या ने हम सबको भीतर तक सिहरा दिया है। माता-पिता की हर ख़ुशी उनके बच्चे से जुड़ी होती है बल्कि यूँ कहें कि उनका सम्पूर्ण जीवन ही बच्चों के नाम होता है। सोचिए, क्या बीती होगी उस पिता पर जो दस मिनट पूर्व ही अपने जिगर के टुकड़े का हाथ थामे उसे कक्षा तक छोड़कर आया था। उस माँ की मानसिक दशा क्या होगी, जो सुई की हल्की-सी नोक भी लग जाने पर अपने लाडले को सीने से लगा घंटों दुलराती थी। आज उसी आँखों के तारे की कटी गर्दन.....! आह, यह कौन-सा युग है, जहाँ मृत्यु इतनी सस्ती और जीना वीभत्स हो चला है! बच्चे, जो किसी दुआ की तरह हमारी उम्मीदों की झोली में आ गिरते हैं, अपनी भोली मुस्कान से दुनिया का हर तम हरते हैं, जिनकी उपस्थिति घर-आँगन में रौशनी बन चहकती फिरती है और रोज शाम घर के दरवाजे पर जिनकी मासूमियत बाँहें फैलाए खड़ी मिलती है....इन ईश्वरीय अनुभूतियों का विध्वंसक निश्चित रूप से मानवता का घोर विरोधी, कोई निकृष्ट, नराधम ही रहा होगा। जिसकी मनुष्यता राक्षसी प्रवृत्तियों में लिप्त हो चुकी है।
 
आख़िर अपराधियों का यह कौन-सा मनोविज्ञान है, जो उन्हें कुकर्म करने को बाध्य करता है? किसी की हत्या कर देने में उनकी रूहें क्यों नहीं काँपती? व्यक्ति की भाषा और सोच उसके व्यवहार में कुछ हद तक परिलक्षित होती ही है, क्या नौकरियाँ देते समय विद्यालय प्रशासन इनका 'ड्राइविंग-लाइसेंस' देखकर ही अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझता है? फीस के रूप में मोटी रक़म वसूलने वाले विद्यालय सुरक्षा को इतनी छोटी बात समझ दरकिनार क्यों कर देते हैं?
 
बात मात्र विद्यालय तक ही सीमित नहीं, हर क्षेत्र में सुरक्षा का यही ढीलापन देखने को मिलता रहा है।
एयरपोर्ट के अलावा हर स्थान की सुरक्षा-व्यवस्था खाना-पूर्ति भर ही है। वो लोग उपस्थित जरूर हैं, जो इस कार्य की पूरी तनख़्वाह लेते हैं पर जिम्मेदारी निभाने का काम केवल मुट्ठी भर लोग ही करते आये हैं। रेलवे स्टेशन, बस-स्टैंड और सभी सार्वजनिक स्थलों पर सुरक्षा एक घटिया चुटकुले की तरह खड़ी मिलती है। कैमरा होगा; पर काम करेगा या नहीं, इसकी जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं! बजट के नाम पर लगाई गई बड़ी-बड़ी मशीनों के दाहिनी ओर से आप आराम से गुजर जाइए, कोई नहीं टोकने वाला। मॉल की सुरक्षा तो और भी शानदार...गाड़ी की डिक्की खुलवाकर देखेंगे और जाने की अनुमति मिल जाएगी, गोया डिक्की के अलावा तो हथियार ले जाने की कोई और जगह संभव ही नहीं! सुरक्षा के नाम पर हो रहा ये ड्रामा न सिर्फ़ खीझ उत्पन्न करता है बल्कि इस बात पर क्रोध भी आता है कि इन तथाकथित सुरक्षाकर्मियों को इसके लिए पैसे भी मिलते हैं।
 
यहाँ प्रश्न न केवल बच्चों की सुरक्षा का है और न स्त्रियों की! प्रश्न यह है कि देश का आम नागरिक जो अपनी कमाई का अच्छा-ख़ासा हिस्सा सुरक्षा एवं अन्य सुविधाओं के नाम पर वर्षों से देता आ रहा, उसका जीवन हर समय ख़तरे में क्यों है? बिना भय के न बच्चे विद्यालय जा सकते हैं, न महिलाएँ कार्यालय, न यात्रा होती है और न ही पर्यटन-स्थलों का आनंद लिया जाता है। हर स्थान पर यही सवाल हमारे साथ चलता है कि कहीं कुछ हो न जाए! तो क्या हम नेताओं के आगे पीछे घेराबंदी कर चलने वाली गाड़ियों और सुरक्षाकर्मियों की लम्बी फौज पर अपना पैसा क़ुर्बान कर रहे हैं?
 
प्रदुम्न के साथ जो जघन्य कृत्य हुआ, उसने हर परिवार में एक घबराहट पैदा कर दी है। यूँ अपराध और समाज का साथ वर्षों से है और हमें कुछ दिन रोने, संवेदन होने और व्यवस्था को कोसने की भी आदत हो चली है...उसके पश्चात् न चाहते हुए भी जीवन उसी द्रुतगति से दौड़ता है और अगली घटना होने तक हम पूर्णत: सहज हो चुके होते हैं। 
हमने ऑपरेशन के नाम पर इंसानों के अंग बेचकर अपनी रोटी कमाने वाले लोग देखे हैं, बच्चों के टुकड़े कर खाने वाला इंसान और किसी की लाश को तंदूर में भून देने वाला अपराधी भी इसी समाज की देन है। हत्या और बलात्कार की ख़बरों को हम एक रात में ही पचा लेते हैं। दंगे-आगजनी को तो अब हम अपराध मानते तक नहीं बल्कि उसे 'मॉडिफाइड प्रजातंत्र' समझ छोड़ दिया जाता है।
 
हमें दूसरों के व्यक्तिगत जीवन में झाँकने में ज्यादा मज़ा आता है, हम अफेयर की ख़बरें चटखारे लेकर पढ़ते हैं, झूठ को सच साबित करने में हमारा कोई सानी नहीं। हम पैसे से ईमान खरीद लेते हैं और ईमानदार का मजाक बनाना हमने अपने धर्म में शामिल कर लिया है। हम इस हद तक आत्मकेंद्रित और स्वार्थी हो चले हैं कि गंभीर मुद्दों पर हमारा ध्यान जाता ही नहीं और सबसे बड़ी बात और आसान उत्तर यह भी कि 'आख़िर हम कर ही क्या सकते हैं?'
 
हम विद्यालयों में प्रारम्भ से ही 'सुरक्षा' को एक विषय के रूप में रख सकते हैं। जहाँ बच्चों को सही-गलत स्पर्श के बारे में जानकारी दी जाए और उन परिस्थितियों से निबटने के लिए उचित प्रशिक्षण भी। शारीरिक शिक्षा में मार्शल आर्ट, जूडो कराटे अनिवार्य विषय के रूप में शामिल हों। जो अब विद्यार्थी नहीं रहे, उनकी ट्रेनिंग की जिम्मेदारी सम्बन्धित कार्यालय या कंपनी ले। अधिकाधिक कैमरा लगाए जाएँ और उनके रखरखाव को भी गंभीरता से लिया जाए। सरकार को इन सब बातों पर ध्यान देना ही होगा। समस्याओं की निंदा और चर्चा भर से वो नहीं सुलझ जातीं, निराकरण के लिए भी उचित क़दम उठाने ही होंगे। 
 
अन्यथा परिस्थितियों के आगे रोना रोने, अपनी व्यस्तताओं का बोझा ढोने और सुन्दर जीवन की कल्पना में खोने के सिवाय 'आख़िर हम कर ही क्या सकते हैं?'
--------------------------------------------------------------
चलते-चलते: हिन्दी हमारी भाषा है, माध्यम है संवाद का...दिलों को दिलों से जोड़ती है और स्वप्न में भी यही उपस्थित होती है। इसके अस्तित्व को कोई ख़तरा है, ऐसा तो नहीं लगता पर इतना अवश्य है कि समय के साथ इसका मूल स्वरुप परिवर्तित हो चुका है। जनमानस के लिए यह हमेशा ही सर्वाधिक सरल, सहज, उपयोगी, प्रभावी एवं ग्राह्य भाषा रही है और भविष्य में भी रहेगी। अन्य भाषाओं की महत्ता स्वीकारते हुए हमें बस इतना ही करना है कि हमारे घर और आसपास की दुनिया के लोग इसे बोलने में गर्व का अनुभव करें न कि ग्लानि का।
जय हिन्दी!
जय भारत!

- प्रीति अज्ञात
 
रचनाकार परिचय
प्रीति अज्ञात

पत्रिका में आपका योगदान . . .
हस्ताक्षर (31)कविता-कानन (1)ख़ास-मुलाक़ात (9)ग़ज़ल पर बात (1)ख़बरनामा (12)व्यंग्य (1)संदेश-पत्र (1)विशेष (2)'अच्छा' भी होता है! (1)