प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितंबर 2017
अंक -31

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

लेख

हिन्दी में राजनीति से, राजनीति में हिन्दी तक- घनश्याम बादल


दुनिया भर के 200 से भी ज़्यादा देशों में हम आज अपनी एक अलग पहचान बना चुके हैं और अब अमेरिका जैसा सुपर पॉवर मुल्क तक यह मान रहा है कि भारत की आवाज़ को अब न तो अनसुना किया जा सकता है औेर न ही उसे अनदेखा रखा जा सकता है। विश्व के करीब - करीब हर बड़े मंच पर आज भारत का नाम केवल उपस्थिति दर्ज कराने से,फर्क डालने वाले नाम बदल चुका है । उसकी आवाज़ की एक महत्ता व अहमियत है। मगर एक दूसरा पहलू यह भी है कि हम खुद भी नहीं जानते कि आखिर हमारी आवाज़ क्या है । ऐसा इसलिये कि आवाज़ के लिये अपनी एक भाषा का होना बेहद ज़रुरी है और आज़ादी के 70 साल पूरे होने के बाद भी हमारी अधिकारिक रूप से कोई अपनी राष्ट्रभाषा ही नहीं है।


भले ही संसद की कार्यवाही के लिए हमने एक नहीं अनेक भाषाएं चुनी हैं , संविधान की 26 वीं अनुसूची में कई क्षेत्रीय भाषाएं दर्ज हैं पर आज भी दासता की प्रतीक रही अंग्रेजी ही हमारी पहली भाषा के रूप में अंकित है । भले ही उत्तर भारत के निवासी मानसिक व भावनात्मक रूप  से देवनागरी हिन्दी को राष्ट्रभाषा का मान व दर्जा देते हैं पर संविधान उसे ऐसा कोई दर्जा नहीं देता है और वह भी दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं की तरह ही एक भाषा मात्र है जिसे राज्य व केन्द्र सरकारें अपने काम काज में ला सकती हैं । पर , हर आदेश व प्रपत्र में अंतिम मान्यता व स्वीकृति आज भी अंग्रेजी की ही है।


आपको जानकर अचरज होगा कि पाकिस्तान , तुर्की , बहरीन फिजी व मॉरीशस जैसे छोटे छोटे देशों से लेकर ब्रिटेन , अमेरिका , चीन व जर्मनी जैसे बड़े देशों तक सबकी अपनी एक अधिकृत राष्ट्रभाषा है और वहां का हर सरकारी काम उसीमें करने की अनिवार्यता व बाध्यता है । इतना ही नहीं संयुक्त राष्ट्रसंघ व दूसरे मंचों पर भी उसे अंकित करा रखा है जिसका बड़ा लाभ यह होता है कि वहां अपनी बात अपनी ही भाषा में कह सकते हैं हालांकि कई बार संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिन्दी का प्रयोग हमारे प्रतिनिधि कर चुके हैं पर राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी वहां अंकित नहीं है।


बाहर की तो छोड़िए भारत के ही कुछ राज्यों में तो हिन्दी का विरोध भी जमकर हो रहा है स्थानीयता व क्षेत्रवाद की हिमायत का बहाना बनाकर वहां हिन्दी का विरोध जारी है । ऐसे कई राज्य हैं जहां का सारा सरकारी काम या तो अंग्रेजी में होता है या वहां की किसी स्थानीय भाषा में । तमिलनाड़ु , आंध्र ,  तेलंगाना , केरल , कर्नाटक , असम , मिजोरम , त्रिपुरा , मणिपुर , गोवा , महराष्ट्र आदि में हिन्दी के विरोध का सहारा लेकर सता हासिल करना एक ऐसा राजनैतिक खेल बन गया है जो अभी भी खत्म होता नहीं दिख रहा है । अब चूंकि केन्द्र सरकार राज्यों की स्वायत्तता की बात कह कर इसमें हस्तक्षेप न करने की नीति का पालन करती है तो इससे दूसरे कुछ राज्यों की महत्वाकांक्षाएं भी बढ़ रही हैं । जैसे पंजाब भी अब चाहता है कि उसे गुरमुखाी में ही काम करना चाहिए , कशमीर  व हिमाचल में भी उर्दू व डोगरी के प्रति तो जूनून बढ़ रहा है । और हिन्दी प्रधान माने जाने वाले उत्तरप्रदेश , मध्यप्रदेश , हरियाणा राजस्थान में भी सरकारी कामों में अधिकतर पहले अंग्रजी का प्रयोग होता है फिर उसका उल्टा सीधा अटपटा अनुवाद देवनागरी में किया जाता है । कई बार तो यह अनुवाद भी इतना स्तरहीन व क्लिष्ट होता है कि हास्य का पात्र बन जाता है । अब ऐसी स्थिति में हिन्दी का उन्नयन व विकास हो भी तो कैसे?  
 

हिन्दी का प्रयोग न करने या न कर पाने के पीछे कई बार बहुत ही थोथा तर्क दिया जाता है कि हिन्दी में कारगर व सरल षब्दावली ही नहीं है । किसी हद तक यह बात एकदम गलत भी नहीं है पर यह कहना कि हिन्दी एक कमजोर या अक्षम भाषा है हजम नहीं होता है । दुनिया भर के विद्वान मान चुके हैं कि हिन्दी जैसी समर्थ भाषाएं बहुत ही कम हैं और जहां तक उसके वैज्ञानिक व व्याकरणीय होने का प्रश्न है तो उसमें तो वह बेजोड़ व लगभग त्रुटिरहित भाषा के रूप  में उभरी है ।  कम से कम अंग्रेजी से तो इस संदर्भ में वह बहुत ही आगे है जिसका न कोई सटीक ध्वनि विज्ञान है न ही उच्चारण का मानक व अपना वृहद शब्दकोष । यह एक ऐसी भाषा है जो दुनियाभर की दूसरी भाषाओं से शब्द लेकर,चुराकर, बदल कर अपना काम चला रही है । पर उसके पैरोकारों ने उसका एक ऐसा प्रभामंडल व उपयोगिता बना दी है कि वह  भारत ही नहीं अपितु दुनिया भर में बोली, लिखी, पढ़ी , व समझी जा रही है और उसका प्रयोग करना आज एक फैषन और उच्चवर्गीय होने की निशानी बन गया है । इंग्लैंड वासी तो खैर उस पर जान देते हैं.


अंगेजी के हिमायती यूरोपीय देशों ने  भी उसका प्रयोग अपनी उन्नति में तो किया है पर वें अपनी क्षेत्रीय व स्थानीय भाएं भी बचाए हैं । आज भी जर्मन , फ्रेंच , डच , बल्गारियन , जापानी , चीनी , इरानी , इराकी , कोरियन और नेपाली तक अपनी भाषा में बोलने , लिखने को गर्व के साथ प्राथमिकता देते ।
 हमारे देष में भी क्षेत्रीय बोलियों व भाषाऔ के प्रति गज़ब का आकर्षण है । बंगाली , गढ़वाली , राजस्थानी , मराठी , कोंकणी , तामिल , तेलुगु , कन्नड़ सब पा्रयः अपनी अपनी बोलियों का इस्तेमाल खूब करते हैं मगर जब बात हिन्दी की आती है सब कहीं पीछे खड़े व हटते नज़र आते हैं और इसके पीछे का बहुत बड़ा कारण है देश की राजनीति । राजनीति अपने वोट बैंक बचाने के लिए हिन्दी की हत्या किये जा रही है । उसका हक छीन रही है उसका हिस्सा किसी और को दे रही है बिना यह जाने व महसूस किये कि भारत कि भाषा के रूप  में अगर कोई पहचान है तो वह केवल और केवल हिन्दी है । दूसरी भाषाएं वैसे ही है जैसे गंगा के साथ यमुना या दूसरी सहायक नदियां व प्रवाहिकाएं हों । ध्यान रहे जब तक गंगा का मान है उसमें जल है तब तक ही इनका मान है उनमें जल है गंगा सूखी तो सबका सूख जाना , मर जाना भी तय है । उसी तरह अगर हिन्दी नहीं बची तो भारत की पहचान कम से कम एक बड़े व प्रखर देश के रूप  में नहीं ही बचेगी।


अब चलते चलते एक नज़र इस पर भी कि आखिर हिन्दी ताकतवर व समृद्ध होकर भी क्यों कमजोर हो रही है ? तो उसके पीछे जहां क्षेत्रीयतावाद की राजनीति व हिन्दी भाषी लागों द्वारा अहिन्दी भाषी क्षेत्रों के लोगों के रोजगार छीन लेने का छद्म भय खड़ा करना व क्षेत्रीय पहचान खोने का भय दिखाना है तो हिन्दी के अंदर की राजनीति भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है
हिन्दी के मठाधीशों ने जितना जोर अपना वर्चस्व बनाने बढा़ने में लगाया है अगर उसका शतांश भी हिन्दी कें संवर्द्धन व विकास में लगाते , उसकी शब्दावली व शब्दकोष को बढ़ाते , उसे सार्थक , सरल ,सहज व ऐसे उपयोगी शब्द दे पाते जो बोलने में आसान व प्रचलन में आने लायक होते , उसे क्लिष्टता के प्रेत से मुक्ति दिलाने का ईमानदार प्रयास करते , खेमेबाजी से बच , अपने और सहयाोगी बोलियों , भाषाओं के विद्वानों के साथ मिलकर काम करते , टांग खिंचाई की बजाय कुछ सार्थक करते तो हिन्दी आज सिरमौर भाषा होती।


अगर नेता व राजनीति लोगों को हिन्दी के विरोध हेतु आंदेालित कर सकते तो हम भी तो उन्हे हिन्दी का महत्व व गौरव समझा सकते हैं । अगर राजनीति देशभक्ति का तड़का लगाकर सत्ता हासलि कर सकती है तो हम भी तो राष्ट्रीय गौरव व अस्मिता को जगाकर हिन्दी को राष्ट्रभाषा का उसका जायज हक दिलवा सकते हैं । पर , क्या ऐसा होगा ? या क्या हमारे विद्वान व नेता ऐसा करेगें ? अथवा कर पाएंगें या करने देगें यह यक्ष प्रष्न आज भी पिछले पूरे एक युग की ही तरह अनुत्तरित है । देखें , कब व कहां से और किसके करकमलों से हिन्दी राष्ट्रभाषा के सिहांसन पर चढ़ती है और चढ़ती भी या नहीं इसका उत्तर आने वाला समय ही दे सकता है ।


- घनश्याम बादल
 
रचनाकार परिचय
घनश्याम बादल

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