प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितंबर 2017
अंक -33

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

उभरते स्वर

हम भारतवासी हैं

पाक करे नापाक हरकतें
चीन साजिशें रचता है
लेकिन हम तो अपने पर में
चिरविश्वासी हैं
हम भारतवासी हैं

हम भारतवासी जिसने सिकंदर तक को दे दी मात
हम हैं वही वीर जिसने गिन लिए शेर के दांत
हमने दुनिया को वेद दिया, अर्थशास्त्र, विज्ञान दिया
हमने ही योग दिया जग को, हमने ही शून्य का ज्ञान दिया
हम रहे हमेशा विश्व गुरु गौरव इतिहासी हैं
हम भारतवासी हैं

यह देश हमारा हमको जान से बढ़कर प्यारा है
तीनों लोकों में न होगा इतना न्यारा है
अलग भले हैं मंदिर-मस्जिद, अलग भले गुरुद्वारा है
हम एक-दूसरे के पूरक हैं ऐसा भाईचारा है
हम सत्य-अहिंसा, प्रेम, एकता के अभिलाषी हैं
हम भारतवासी हैं

इतने साल गुलामी की ज़ंजीरों की जकड़न में रहकर
कैद-कफ़स और ज़ुल्म सितम तड़पन में रहकर
फिर से दुनिया को ताकत अपनी दिखलाते हैं
हम थे विश्व गुरु और हैं ये बतलाते हैं
नहीं मिटी हस्ती अपनी नाकाम रही हर कोशिश उनकी
नहीं मिटा पाए हमको ऐसे अविनाशी हैं
हम भारतवासी हैं


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मंज़िलें ख़ुद ही तुम्हारे पास चलकर आएँगी

मंज़िलें ख़ुद ही तुम्हारे पास चलकर आएँगी
उनको पाने के लिए गर तय सफ़र कर दो

ये आँधी और तूफानों के झोंके यदि डराते हैं तुम्हें
तुम नहीं उनमें से जो डरते ख़बर कर दो

बहुत काँटे मिलेंगे राह में चलने से रोकेंगे
कुचल कर उन सभी काँटों को राही बेअसर कर दो

तुम्हारी राह में कुछ मुश्किलें दीवार-सी होंगी
कई तरह की होंगी वो घृणा और प्यार की होंगी

कहीं रिश्तों की डोरी रोकने की चाह रक्खेगी
कहीं पर दुश्मनों की आ खड़ी तलवार भी होगी

मगर रुकना नहीं है, बस तुम्हें बढ़ते ही जाना है
जुस्तजू है तुम्हें मंज़िल की तो मंज़िल को पाना है

कई सपने जो अपने बन के छलने की करेंगे कोशिश
मीठे ज़हर-से होकर बनेंगे राह की वो बंदिश

तुम्हें हर मोड़ पर करना पड़ेगा मुश्किलों का सामना
उन मुश्किलों का डर करेगा क्षीण मंगल कामना

तुम अपने मन को गंगाजल से राही तर-ब-तर कर दो
वो मंज़िल ढूंढ कर तुमको तुम्हारे पास चलकर आएँगी
तुम उसकी जुस्तजू में कोशिशें इतनी अगर कर दो


- अभिषेक शुक्ला
 
रचनाकार परिचय
अभिषेक शुक्ला

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