प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितंबर 2017
अंक -33

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

लघुकथा- मेरा रोबोट

वह आँख मूँदकर लेटी ही थी कि तभी सात साल का केशु आ गया और उसके गाल पर पुच्ची देते हुए बोला, "दादी, तुम अभी से सो रही हो? अभी तो सिर्फ सात बजे हैं।"
"सो नहीं रही बेटू, ऐसे ही लेट गयी हूँ।" कहते हुए उसने उसे अपनी बाहों में भर लिया।"
"अब उठ भी जाओ। कहानी नहीं सुनाओगी क्या?"
"सुनाऊँगी न। बदन में ज़रा भी जान नहीं है। तू हाथ-पाँव दबा दे तो कुछ ताकत आ जायेगी।"
"ठीक से खाती-पीती हो नहीं, इसीलिये।" कूदकर वह बगल में आ बैठा और अपने हाथों से हल्के-हल्के दबाने लगा।
"अरे, तेरे ताकत नहीं है क्या? ज़रा ज़ोर से दबा न! ठीक से तू भी खाता-पीता नहीं है, इसीलिए।"
"खाता तो हूँ। ... ... दादी सुनो, एक बात मेरे दिमाग में आई है।"
"हूँ, कौनसी बात?"
"मेरा ज़माना जब आयेगा, तब तुम्हारे ज़माने से बहुत फ़र्क होगा।"
"वो कैसे?"
"मेरे ज़माने में रोबोट हुआ करेंगे, बदन दबाने के लिए।"
"अच्छा! तो अब समझ में आया कि हाथ इतने हल्के क्यों पड़ रहे हैं? मालूम है? रोबोट का दिमाग जब खराब हो जाता है तो वह बदन के बजाय गला भी दबा सकता है।"
"तुम्हें कैसे मालूम?"
"अरे भाई, रोबोट एक मशीन ही तो है, कोई पुर्जा खराब हो गया तो कुछ भी कर दे, क्या पता?"
"हम्म...।" उसके हाथ अब रुक गये थे और वह कुछ सोचने लगा।"

"लेकिन केशु एक बात बताऊँ, "मेरा रोबोट तो तू ही है, प्यारा-प्यारा-सा। मशीन वाला रोबोट कोई तेरे जैसा थोड़ी न दबाएगा, वो भी इतने प्यार से।"
अब केशु के हाथ ज़ोर-ज़ोर से दादी के हाथ-पाँव दबाने में लग गये।"


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लघुकथा- मेरा आँगन

पत्नी को तैयार देखकर पति भौंचक्क हो उठा, "कहीं जा रही हो क्या?"
"नहीं तो।"
"तो साड़ी क्यों बदली?"
"बस ऐसे ही, मन हो आया।"

तभी फोन की घंटी बजी, पत्नी ने फोन उठाया, "हेलो, मास्टर साहब? जी...बस वहाँ से सीधे हाथ को मुड़ जाइए, आखिरी वाला घर मेरा है।
उसके फोन रखते ही पति के तेवर गरम हो गये, "कौन है ये मास्टर? क्यों आ रहा है?"
"मुझे ढोलक और गाना सिखाने।"
"अच्छा..!! अच्छा तो अब घर में नाच-गाना होगा, वो भी आदमी के साथ।" उसने लगभग चीखते हुए कहा।
"इसमें बुराई ही क्या है?"
"ये सब यहाँ नहीं चलेगा।"
"क्यों नहीं चलेगा।"
"घर मेरा है।"
"आपसे ज्यादा मेरा है। सत्ताईस सालों से इस घर के आँगन को अपने तन-मन से सजाया है।"
"बहुत निडर हो गयी हो अब तुम, अपनी मनमानी करोगी?" वह लाल-पीला हो उठा।"
"सारी उम्र तो आपके लिए जिया। अब बची-खुची उम्र, अपने लिए भी जियूँगी।"

दरवाजे पर घंटी बजते ही, पति तनतनाता हुआ अन्दर कमरे की तरफ भागा और बोला, "खबरदार! जो मुझे मिलने को बुलाया, मैं उससे नमस्ते भी नहीं करूँगा।" कहकर उसने धड़ाम से दरवाज़ा बंद कर लिया।
आँगन में पड़े तख़्त पर बैठे मास्टर साहब के हाथों की थाप पड़ते हो ढोलक ढमक-ढमक बज उठी। पति का मन नहीं माना, उसने धीरे से दरवाज़ा खोलकर झाँका कि पत्नी से आँखें चार हो गयीं जो मुस्कुराती गा रही थी, "रूठे-रूठे पिया मनाऊँ कैसे, आज न जाने बात हुई क्या, क्यूँ रूठे मुझसे। जब तक वो बोलें न मुझसे, मैं समझूँ कैसे।"

अचानक पति के हाथ भी पत्नी की सुमधुर आवाज़ के साथ चौखट पर थाप देने लगे।



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लघुकथा- एक दूजे के लिए

साँझ होते ही दिए जल उठे। उजाले से चौंधिया कर अँधेरा कोने में जा दुबका, अपने अस्तित्व पर ख़तरा नज़र आता देख, उसने हवा के साथ मिलकर एक साजिश रची।
हवा जैसे ही लहराई, उजाला काँप उठा। देखकर अँधेरा ठहाका लगाने लगा, "चले थे मेरा अस्तित्व मिटाने? मैं तो सदा से पूरे संसार में व्याप्त हूँ।"
उजाला डगमगाया नहीं, खुद पर संयम रखते हुए बोला, "तुम्हें जो करना है, करो। लेकिन मैंने जो प्रण लिया है, उसे जीवन भर निभाऊँगा। चाहे तूफ़ान क्यों न आ जाए।"
हवा फिर लहरा उठी, उजाले को फड़फड़ाते देखकर बाती बोल पड़ी, "अगर तुम बुझ भी गये तो फिर जल उठोगे क्योंकि तुम्हारे बिना ये संसार अधूरा है।"
अँधेरा शेखी मारते हुए बोला, "सुबह की रौशनी में कोई पूछता तक नहीं तुम्हें। मैं न रहूँ तो न जुगनू चमके और न ही चन्दा।"
उजाला धीरे से मुस्कुरा कर बोला, "तुम ठीक कहते हो भाई, तुम न होगे तो मुझे कोई भी नहीं पूछेगा।"
अँधेरे ने चौंककर उसे देखा, "वो कैसे?"
दिये से रहा न गया, उसने बाती की ओर देखा, फिर उनसे बोला, "हम दोनों, तुम दोनों के जन्म के साक्षी हैं। तुम दोनों सदा एक-दूसरे के पूरक हो और तुम्हारे बिना हमारा भी कोई अस्तित्व नहीं है।"

बाती भावुक हो उठी और अँधरे से बोली, "अगर काजल का रंग तेरे जैसा काला न होता तो सारी माएँ अपने बच्चों की नज़र कैसे उतारतीं?"
सुनकर हवा खिलखिला उठी, "कुछ भी हो, मन में अँधेरा मत होने देना।"


- प्रेरणा गुप्ता
 
रचनाकार परिचय
प्रेरणा गुप्ता

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कथा-कुसुम (4)