प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितंबर 2017
अंक -33

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गंगा

ग़ज़ल-

ग़म के बदले में मिले ऐसी ख़ुशी रहने दे
बाक़ी बस सर पे मेरे दस्त-ए-नबी रहने दे

नेकियों को जो ग़ुरूर आया तो रक्खूँगा कहाँ
मेरे हुजरे में ख़ुदा थोड़ी बदी रहने दे

इतनी ख़ुशियों की हवायें तो हिला सकती हैं
ए ख़ुदा! दर्द की बुनियाद बनी रहने दे

मेरा कहना है कि दरकार बस इक पुल की है
दरमियाँ फिर तू भले कोई नदी रहने दे

अज़्म-ए-परवाज़ मेरा और भी हो जाये बुलन्द
एक ज़ंजीर क़फ़स में भी पड़ी रहने दे

है हक़ीक़त तो हक़ीक़त से मिला दे मुझको
हूँ अगर ख़ाब में तो ख़ाब में ही रहने दे

मुझको इसने ही तो जीने का सलीक़ा बख़्शा
इस परिन्दे में मेरी जान फंसी रहने दे

हिज्र की धूप है, तन्हाई है ओर राह तवील
साया-ए-इश्क़ मेरे सर पे अभी रहने दे

रब्त का कुछ तो मेरे दिल में भरम हो आख़िर
है अदावत, तो अदावत ही सही, रहने दे

एक 'नायाब' दरीचा तो खुला हो उसका
फिर भले बीच में दीवार खड़ी रहने दे


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ग़ज़ल-

जब जब मैं ज़िन्दगी की परेशानियों में था
अपनों के बावुजूद भी तन्हाइयों में था

आबादियों ने सारे भरम ही मिटा दिये
इससे ज़ियादा ख़ुश तो मैं वीरानियों में था

साहिल पे जो खड़े थे उन्हें मौज ले गयी
मैं बच गया कि यार मैं तुग़यानियों में था

आसानियों में ज़ीस्त ही बे-कैफ़ हो गयी
जीने का अस्ल लुत्फ़ तो दुश्वारियों में था

करता भी क्या किसी से शिफ़ा की कोई उमीद
सारा का सारा शहर ही बीमारियों में था

जो सादा लोह थे वो नशेबों में रह गये
चालाक जो भी शख़्स था ऊँचाइयों में था

कुछ आप ही ने ग़ौर से डाली नहीं नज़र
मेरा भी नाम आपके शैदाइयों में था

बातें सतह पे यूँ तो बहुत-सी हुईं मगर
मेरा दिमाग़ झील की गहराइयों में था

'नायाब' भाई बन के गले जो मिला था कल
उस शख़्स का शुमार भी दंगाइयों में था


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ग़ज़ल-

सेहरा की गर्म धूप में बिस्तर दिया गया
और प्यास जब लगी तो समन्दर दिया गया

धीमा-सा एक ज़हर मिला सूरत-ए-दवा
चाक-ए-जिगर के वास्ते खंजर दिया गया

इक शख़्स वो है जिसको तो बेहतर मिला नसीब
इक शख़्स वो भी है जिसे बदतर दिया गया

दीवार-ओ-दर में रखना था ताबीर का भी बाब
ख़्वाबों भरा ये मुझको अगर घर दिया गया

हमको भी अपनी जां से मुहब्बत तो थी मगर
दस्तार पर जब आई तो फिर सर दिया गया

इक ये सितम कि शीशे का बख़्शा था दिल हमें
उस पर सभी के हाथ में पत्थर दिया गया

उल्टा है क्या निज़ाम तेरे शहर-ए-हुस्न का
बदला जो क़ुर्बतों का बिछड़कर दिया गया

सबकी मुहब्बतों को मिली थी मुहब्बतें
इक मेरे इश्क़ ही को सितमगर दिया गया

बख़्शी गयी है गर ये मसर्रत हिसाब से
क्या दर्द भी ये सोच समझकर दिया गया

हमने हर एक दर्द को हँसकर किया क़ुबूल
जब भी ख़ुशी के हाथ में रखकर दिया गया

दीवाना एक ही तो है 'नायाब' शहर में
जिसको ख़िताब ये सर-ए-मिम्बर दिया गया


- नितिन नायाब
 
रचनाकार परिचय
नितिन नायाब

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ग़ज़ल-गाँव (1)