प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितंबर 2017
अंक -31

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

हिन्दी का सफर: राष्ट्रभाषा से राजभाषा तक

भारत विविधताओं का देश है। इसका विस्तृत भू-भाग और भौगोलिक स्थिति भारत में भाषायी विविधताओं को प्रबल आधार प्रदान करता है। शायद यही कारण है कि भारत में लगभग 1600 से अधिक भाषाओं का प्रयोग किया जाता है। जिनमें लगभग 63 भाषाएँ गैर-भारतीय हैं। विश्व में राष्ट्रवादी विचारधारा के परिप्रेक्ष्य में किसी देश को एकता के सूत्र में बांधने के लिए एक सर्वमान्य संपर्क भाषा का होना अनिवार्य है। आठवीं अनुसूची में वर्णित भारतीय भाषाओं में हिन्दी सर्वाधिक विस्तृत भू-भाग में बोली जाने वाली भाषा है। भारतीय समाज में लगभग 60 प्रतिशत लोग हिन्दी भाषा का प्रयोग करते हैं। सभी प्रादेशिक भाषाओं में हिन्दी बोलने और समझने वालों की संख्या अधिकतम है। इसी कारण हिन्दी स्वतंत्रता के पूर्व भारतीय राजनेताओं जैसे- महात्मा गांधी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, बाल गंगाधर तिलक आदि ने भारत को राष्ट्र का स्वरूप देने के लिए हिन्दी को ही भारत की राष्ट्र भाषा मानने की स्वीकृति प्रदान की।


भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से ही विविधता में भी एकता बनी हुई है। हमारे देश में कई भाषाओं का प्रयोग किया जाता है और सभी भाषाओं का परिवेशानुकूल विषेश गरिमा और अस्तित्व है। इसके सम्बन्ध में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का यह कथन अधिक समीचीन प्रतीत होता है कि-

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नत को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटै न हिय को सूल।।

यह सर्वविदित है कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। समाज में रहने के कारण उसे अपने विचारों एवं भावों को आपस में व्यक्त करने की जरूरत पड़ती है। यह अभिव्यक्ति शब्दों के द्वारा, वाक्यों के द्वारा और शारीरिक हाव-भाव से व्यक्त किया जाता है। वास्तव में यह अभिव्यक्ति ही भाषा कहलाती है। डाॅ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार- ‘‘भाषा वह साधन है। जिसके माध्यम से हम सोचते हैं तथा अपने विचारों को व्यक्त करते हैं।"1 महर्षि पतंजलि ने अपने महाभाष्य में कहा है कि ‘व्यक्ता वाचि वर्णा येषा त इमे व्यक्तवाचः।" अर्थात जो वाणी, वर्णाें में व्यक्त होती है, उसे भाषा कहते हैं।
वैश्विक स्तर पर भाषा का राष्ट्रीयता से गहरा सम्बन्ध है। राष्ट्रीयता का सर्वाधिक प्रयोग उसके लिए होता है, जिसमें देश-प्रेम की भावना प्रबल रहती है। ‘राष्ट्र’ का विशेषण शब्द राष्ट्रीय होता है। ‘‘राष्ट्र अंग्रेजी शब्द नेशन के पर्याय रूप में हिन्दी में प्रयोग किया जाता है। इसकी उत्पत्ति लेटिन भाषा के ‘नेशियों’ शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है, जन्म या जाति।’’2 राष्ट्रीयता के सम्बन्ध में जान स्टुअर्ट मिल ने भी कहा है कि ‘‘राष्ट्र मनुष्य जाति का ऐसा भाग है, जो एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति से बंधा हुआ एक सरकार के अधीन रहने की प्रबल इच्छा रखता हो।’’3 इस प्रकार राष्ट्रीयता उस भावना विशेष का नाम है, जिसके कारण कोई व्यक्ति या समुदाय पारस्परिक एकता की भावना का अनुभव करता है। वह श्रद्धा और निष्ठा पर आधारित एक ऐसा आदर्श है, जिसका केन्द्र राष्ट्र होता है। राष्ट्रीयता का बीज यूनान से उत्पन्न हुआ है। वैसे तो राष्ट्रीय भावना की सहायता से एक जनसमूह संघटित होता है। "भारत में विदेशी दासता से मुक्ति पाने की लालसा महज राजनीतिक उद्देश्यों से उत्प्रेरित नहीं थी, उसके पीछे अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को विस्मृति के अंधेरे से बाहर लाने की आकांक्षा भी थी। इस दृष्टि से यह यूरोप की आधुनिक राष्ट्रीय सत्ताओं (नेशन स्टेट्स) की आक्रामक अहंग्रस्त भावना से कुछ अलग थी, जिसकी स्थापना अनेक जातियों, नस्लों और जन भाषाओं को नष्ट करने के बाद ही सम्भव हुई थी।’’4


राष्ट्रभाषा का शाब्दिक आशय समस्त राष्ट्र में प्रयुक्त भाषा अर्थात आम जन की भाषा (जनभाषा) से है। अर्थात जो भाषा समस्त राष्ट्र में जन-जन के विचार-विनिमय का माध्यम हो, वह राष्ट्रभाषा कहलाती है। राष्ट्रवाद के सम्बन्ध में डाॅ. रहीस सिंह का कहना है कि ‘‘राष्ट्रवाद एक ऐसी परिघटना है, जिसका उदय पश्चिमी यूरोप में 18 वीं शताब्दी में हुआ और बाद में 19 वीं तथा 20 वीं शताब्दी में दुनिया के अन्य भागों में इसका प्रसार हुआ। यद्यपि यह सर्वमान्य सिद्धान्त नहीं है लेकिन अधिकांश विद्वान यह मान ही लेते हैं कि आधुनिक राष्ट्रवाद का उदय औद्योगिक पूंजीवाद या मुद्रण पूंजीवाद के साथ हुआ और इसमें कई कारण शामिल हुए जैसे- भाषा, जातीयता या धर्म पर आधारित समुदाय या राज्यों या कल्पित समुदायों के बीच प्रतिस्पर्धा और प्रतियोगिता..........आदि।’’5
वास्तव में राष्ट्रभाषा राष्ट्रीय एकता एवं अंतर्राष्ट्रीय संवाद-संपर्क की आवष्यकता की देन है। वैसे तो भारत की सभी भाषाएँ राष्ट्रभाषा होती हैं। लेकिन राष्ट्र की जनता स्थानीय एवं तात्कालिक हितों व पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर अपने राष्ट्र की कई भाषाओं में से किसी एक भाषा को चुनकर उसे राष्ट्रीय अस्मिता का एक पहचान समझने लगती है तो वही भाषा राष्ट्रभाषा बन जाती है। राष्ट्रभाषा सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताओं, परम्पराओं के द्वारा सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर देश को जोड़ने का काम करती है। सच्चे अर्थों में राष्ट्रभाषा उद्देश्य विभिन्न समुदायों के बीच भावनात्मक एकता स्थातिप करना है। राष्ट्रभाषा शब्द कोई संवैधानिक शब्द नहीं है बल्कि यह प्रयोगात्मक, व्यावहारिक एवं राष्ट्र के मानक को पूर्ण करने वाला जनमत शब्द है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रभाषा की आवश्यकता होती है। ‘‘....राष्ट्रीय भाषा का उद्देश्य यह है कि राष्ट का उच्चतर सोच व विचारों तक उठाया जाए और उसे वर्तमान की तुलना में उच्चतर सामाजिक, नैतिक एवं राजनीतिक अस्तित्व प्रदान किया जाय। यह काम प्रधानतः एक राष्टीय भाषा और राष्टीय साहित्य के माध्यम से ही सम्पन्न किया जा सकता है।’’6 भारत के संदर्भ में इस आवश्यकता की पूर्ति हिन्दी ने किया। यही कारण है कि हिन्दी स्वतंत्रता-संग्राम (विशेषतः 1900 ई. से 1947 ई. तक) के दौरान भारतीय राजनेताओं द्वारा राष्ट्रभाषा बनी तथा ‘स्वराज’ के मानक का प्रतिपूर्ति की। राष्ट्रभाषा के सम्बन्ध में यह तो स्पष्ट है कि इसका प्रयोग क्षेत्र विस्तृत एवं देशव्यापी होता है। यह सम्पूर्ण देश की संपर्क भाषा होती है और इसका व्यापक जनाधार होता है। राष्ट्रभाषा हमेशा स्वभाषा ही हो सकती है क्योंकि उसी के साथ जनता का भावनात्मक लगाव होता है।


राष्ट्रभाषा के सम्बन्ध में डाॅ. द्वारिका प्रसाद सक्सेना ने कहा है कि ‘‘जो भाषा किसी राष्ट्र के भिन्न-भिन्न भाषाभाषियों के पारस्परिक विचार-विनिमय का साधन बनती हुई समूचे राष्ट्र को भावनात्मक एकता के सूत्र में बाँधती है, उसे ‘राष्ट्रभाषा’ कहते हैं। वैसे किसी भी राष्ट्र में प्रचलित सभी भाषाएँ राष्ट्रीय भाषाएँ होती हैं, परन्तु प्रत्येक समृद्धशाली राष्ट्र की कोई एक भाषा ही ‘राष्ट्रभाषा’ के नाम से अभिहित की जाती है, क्योंकि वह भाषा राष्ट्र की प्रतीक होती है, उसी को विदेशी राष्ट्रों में सम्मान दिया जाता है, उसी में सारे राष्ट्र की अन्तर्रात्मा विद्यमान रहती है और उसी को उस राष्ट्र के नाम से अन्य देशों में जाना जाता है।’’7 उदाहरण स्वरूप भारत में बंगला, मराठी, गुजराती, पंजाबी, राजस्थानी, बिहारी, उडि़या, तमिल, कन्नड़, मलयालम आदि अनेक समृद्ध एवं उन्नत भाषाएँ प्रचलित हैं, परन्तु भारत के राष्ट्रीय नेताओं ने हिन्दी भाषा को ‘राष्ट्रभाषा’ के महत्वपूर्ण पद पर प्रतिष्ठित किया गया है। संविधान में इसकी घोषणा करके हिन्दी को सम्पूर्ण भारत राष्ट्र की प्रतिनिधि एवं प्रतीक भाषा के रूप में अपनाया गया है। वस्तुतः आज यह हिन्दी भाषा राष्ट्रभाषा के गौरवमय पद को ग्रहण करके बंगला, मराठी, गुजराती, तमिल, कन्नड़, मलयालम आदि सभी भाषाओं के क्षेत्रों में विचार-विनिमय का साधन बनी हुई है, समूचे राष्ट्र को भावानात्मक एकता के सूत्र में बाँध रही है और सभी स्थानों पर पारस्परिक सम्पर्क स्थापित करने में सहायता प्रदान कर रही है।


हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के सम्बन्ध में इसी प्रकार महात्मा गाँधी ने भी कहा कि ‘राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है।’ गांधी जी हिन्दी के प्रश्न को स्वराज का प्रश्न मानते थे। उन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में सामने रखकर भारत में भाषा समस्या को लेकर गंभीर विचार किया। ‘‘भारत एक राष्ट्र के रूप में संगठित, सुदृढ़ हो, इसके लिए एक राष्ट्रभाषा का होना आवश्यक समझते हुए गांधी ने प्रांतीय भाषाओं के पायदान से आगे बढ़ते हुए राष्ट्रभाषा के सवाल को लिया और इसके लिए उन्होंने हिन्दी का प्रचार करना शुरू किया। जनवरी, 1915 में गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से भारत आ गये और तब से लेकर जीवन के अंतिम पहर तक वे देश में राष्ट्रीय चेतना, अछूतोद्धार, सांप्रदायिक सद्भाव के साथ-साथ प्रांतीय भाषाओं के विकास तथा राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी के प्रचार-प्रसार का कार्य करते रहे।’’8
इसी क्रम में महात्मा गांधी ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन के इन्दौर अधिवेशन (सन् 1918 ई.) में सभापति के पद से भाषण देते हुए हिन्दी को राष्ट्रभाषा का समर्थन किये और कहा कि मेरा यह मत है कि हिन्दी ही हिन्दुस्तान की राष्ट्रभाषा हो सकती है और होनी चाहिए तथा अगर हिन्दुस्तान को सचमुच आगे बढ़ना है तो चाहे कोई माने या न माने राष्ट्रभाषा तो हिन्दी ही बन सकती है क्योंकि जो स्थान हिन्दी को प्राप्त है वह किसी और भाषा को नहीं मिल सकता।


बालगंगाधर तिलक ने सन् 1917 ई. में कहा था कि "यद्यपि मैं उन लोगों में से हूँ जो चाहते हैं और उनका विचार है कि हिन्दी की भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है।" सी. गोपालचारी ने कहा कि "हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा तो है ही, यही जनतंत्रात्मक भारत में राजभाषा भी होगी।" देखा जाय तो ‘‘गांधी जी पहले राजनीतिक व्यक्ति थे, जिन्होंने प्रांतीय भाषाओं के महत्व के साथ-साथ राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी के महत्व एवं अपरिहार्यता को राष्ट्रीय स्तर पर उजागर करना शुरू किया।’’9
‘राजभाषा’ के सम्बन्ध में यह अवधारणा है कि ‘‘जो भाषा किसी राज्य के सरकारी कार्याें में सर्वाधिक प्रयुक्त होती है, उसे ‘राजभाषा’ कहते हैं। ‘राजभाषा’ में केन्द्रीय एवं प्रान्तीय सरकारें अपने पत्र-व्यवहार किया करती हैं सरकारी आदेश एवं आज्ञाएँ भी इसी भाषा में मुद्रित होती हैं और केन्द्र और प्रदेशों के मध्य सम्पर्क स्थापित करने का कार्य भी इसी भाषा के द्वारा होता है। राजभाषा सदैव देश में शासनात्मक ऐक्य की स्थापना में बड़ी सहायता पहुँचाती है।’’10


यदि हम भारतीय इतिहास को देखते हैं तो भारत में पहले संस्कृत राजभाषा रही, फिर आभीरों की राज-सत्ता स्थापित होने पर प्राकृत एवं अपभ्रंश भाषाएँ राज्य भाषा हो गयी। शनैः-शनैः मुसलमानों के शासनकाल में फारसी को राजभाषा का गौरव प्राप्त हुआ ततपश्चात फिर अंग्रेजी सत्ता स्थापित होते ही भारत में अंग्रेजी ने राजभाषा का स्थान ग्रहण कर लिया। स्वतंत्र भारत के बाद पुनः ‘हिन्दी’ को राजभाषा घोषित कर दिया गया। आज भारत का अधिकांश राज्य-कार्य हिन्दी के माध्यम से होता है। भारत एक विशाल राष्ट्र है। यहाँ अनेक प्रदेश हैं और सभी प्रदेशों की भाषाएँ पर्याप्त समृद्ध एवं विकसित हैं। परन्तु सभी प्रदेशों के साथ सम्पर्क स्थापित करने के लिए केन्द्र ने हिन्दी को ही राज्यभाषा के रूप में स्वीकार किया है, क्योंकि हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है, जिसे भारत के अधिकतम निवासी बोलते हैं और अच्छी तरह समझते भी हैं।


भारत को राष्ट्र की उपाधि मिलने में हिन्दी भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। संविधान के भाग-17 में अनुच्छेद 343-351 में हिन्दी भाषा के विकास, आयोग का गठन, भाषाओं को शासकीय भाषा बनाना, एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच या संघ के बीच पत्राचार की भाषा, बहुतायत जनसंख्या के द्वारा बोले जाने वाली भाषा के सम्बन्ध में विशेष प्रावधान एवं अन्य भाषाओं संरक्षण सवंर्धन की बात की गयी है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 351 के अनुसार-‘‘संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिन्दी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे ताकि वह भारत की सामाजिक संस्कृति के सभी तत्वों के अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति मे हस्तक्षेप किये बिना हिन्दुस्तानी के और आठवीं अनुसूची में उल्लिखित भारत के अन्य भाषाओं के प्रयुक्त रूप, शैली और पदावली को आत्मसात करते हुए तथा जहाँ तक आवश्यक या वांछनीय हो वहाँ तक उसके शब्द भण्डार के लिए मुख्यतः संस्कृत से तथा गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।’’11 सविंधान के भाग-17 के आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं का उल्लेख किया गया है। जिसमें हिन्दी, असिमिया, बंग्ला, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, ओडि़या, पंजाबी, संस्कृत, सिंधी, तमिल, तेलुगु, उर्दू, डोगरी, बोडो, मैथिली, संथाली हैं।


वैश्वीकरण के इस युग में आज सम्पूर्ण विष्व में अंग्रेजी भाषा का बोलबाला है। जिसको यूनाइटेड नेशन संघ ने अन्तर्राष्ट्रीय भाषा का दर्जा प्रदान किया हुआ है। अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के सम्बन्ध में कहा गया है कि ‘‘जो भाषा विभिन्न राष्ट्रों के बीच विचार-विनिमय, पत्र-व्यवहार आदि का माध्यम होती है, वह ‘अन्तर्राष्ट्रीय भाषा’ कहलाती है।’’12 वैसे तो इस भाषा का प्रयोग प्रायः अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में होता है, क्योंकि जहाँ विविध राष्ट्रों के विभिन्न भाषाभाषी प्रतिनिधित्व एकत्र होते हैं, वहाँ पारस्परिक विचार-विनिमय के लिए किसी एक ऐसी परिनिष्ठित भाषा का प्रयोग किया जाता है, जो अधिकांश राष्ट्रों में प्रचलित होती है और जिसे विश्व के अधिकांश राष्ट्रों के प्रतिनिधि अपना लेते हैं। जैसे-आजकल अंग्रेजी भाषा एक अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में विख्यात है, क्योंकि विश्व के अधिकांश राष्ट्रों की एक मात्र संस्था ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ में इसी भाषा के माध्यम से सर्वाधिक विचार-विनिमय होता है और इसी भाषा का जानना अब प्रत्येक राष्ट्र के राजदूत के लिए अपेक्षित होता है। अन्तर्राष्ट्रीय समाचार पत्र इसी भाषा में प्रसारित किये जाते हैं और अन्तर्राष्ट्रीय दूरसंचार-व्यवस्था भी इसी भाषा में का प्रयोग किया जाता है।


निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि भारत में राष्ट्रीयकरण को लेकर बहुत से नारे दिये गये, जिनमें सबसे प्रमुख नारा था कि ‘हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान’। इस प्रकार जैसे-जैसे स्वतंत्रता-संग्राम तीव्र होता गया, वैस-वैसे हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का आन्दोलन प्रबल होता गया। राष्ट्र 20 वीं शताब्दी के चौथे दशक तक हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में सहमति मिल चुकी थी। भारतीय इतिहास में वर्ष 1942 ई. से 1945 ई. का सफर ऐसा था कि देश में स्वतंत्रता की लहर जाग उठी थी। उस समय राष्ट्रभाषा से ओत-प्रोत जितनी रचनाएँ हिन्दी में लिखी गयी, उतनी शायद किसी अन्य भाषा में नहीं लिखी गयीं।


हिन्दी भाषा के सम्बन्ध में डाॅ. उदय नारायण तिवारी ने कहा है कि ‘‘हिन्दी में अन्य प्रादेशिक भाषाओं से भी अनेक शब्द आये हैं। इस हिन्दी जब से राष्ट्रभाषा घोषित हुई है तब से प्रादेशिक-भाषाओं के शब्दों के लिए हिन्दी ने अपना द्वार उन्मुक्त कर दिया है। भारत जैसे विशाल-देश के लिए यह आवश्यक भी है। वस्तुतः कोई भी जीवित भाषा अन्य भाषाओं के शब्दों के आदान-प्रदान को अस्वीकार नहीं कर सकती।’’13 इस प्रकार राष्ट्रभाषा के प्रचार के साथ राष्ट्रीयता के प्रबल हो जाने पर अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा और स्वतत्रता के बाद हिन्दी ही स्वतंत्र भारत की संवैधानिक रूप से राजभाषा बनायी गयी और राजभाषा के सम्बन्ध में यह अन्तर्राष्ट्रीय अवधारणा भी थी कि जब कोई भाषा राज-काज में सर्वाधिक प्रयुक्त होने लगती है, तब वह राजभाषा बन जाती है। इसी क्रम में जब कोई परिनिष्ठित एवं समृद्ध भाषा किसी एक राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने लगती है, तब वह ‘राष्ट्रभाषा’ कहलाती है। अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के सम्बन्ध में अवधारणा है कि जब कोई समृद्ध भाषा विविध राष्ट्रों के विचार-विनिमय का साधन बनती हुई अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर लेती है तो वह भाषा ‘अन्तर्राष्ट्रीय भाषा’ कहलाती है।



 

 

संदर्भ सूची-
1- भाषा विज्ञान, डाॅ. भोलानाथ तिवारी, किताब महल, 22-सरोजनी नायडू, मार्ग इलाहाबाद, सत्तानवाँ संस्करण 2013, पृ. 1
2- हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली, डाॅ. अमरनाथ, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., 1-बी,
    नेताजी सुबास मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली-110002, पहला छात्र संस्करण, दूसरी आवृत्ति 2015, पृ. 301
3- वही, पृ. 301
4- आवर्तन, त्रैमासिक शोध पत्रिका, कुनराघाट, गोरखपुर, उ0प्र0, वर्ष 3, अंक-1-2, स्प्रिंग एण्ड समर 2015, पृ. 31
5- विश्व इतिहास, डाॅ. रहीस सिहं, डाॅर्लिंग किंडरस्ले (इंडिया) प्रा. लि. (पियर्सन प्रकाशन), कापीराईट 2013, पृ. 155
6- हिन्दू परम्पराओं का रष्ट्रीयकरण, वसुधा डालमिया, अनुवाद-संजीव कुमार, राजकमल प्रकाशन
    प्राइवेट लिमिटेड, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली-110002, पहला संस्करण 2016, पृ. 194
7- भाषा विज्ञान के सिद्धान्त और हिन्दी-भाषा, डाॅ. द्वारिका प्रसाद सक्सेना, मीनाक्षी प्रकाशन, बेगम
    ब्रिज, मेरठ, दसवाँ संशोधित एवं परिवर्द्धित संस्करण, 2013, पृ. 30
8- गांधी का साहित्य और भाषा चिन्तन, श्री भगवान सिंह, सर्व सेवा संघ-प्रकाशन, राजघाट,
    वाराणसी-221001, पहला सस्करण 2014, भूमिका, पृ. 4
9- वही, पृ. 116

10- भाषा विज्ञान के सिद्धान्त और हिन्दी-भाषा, डाॅ. द्वारिका प्रसाद सक्सेना, मीनाक्षी प्रकाशन, बेगम
    ब्रिज, मेरठ, दसवाँ संशोधित एवं परिवर्द्धित संस्करण, 2013, पृ. 30
11- भारत का संविधान, डाॅ. जय नारायण पाण्डेय, सेन्ट्रल लाॅ एजेन्सी, 30-डी/1 मोतीलाल नेहरू
    रोड, इलाहाबाद-2, पैंतालीसवाँ संस्करण 2012, पृ. 686
12- भाषा विज्ञान के सिद्धान्त और हिन्दी-भाषा, डाॅ. द्वारिका प्रसाद सक्सेना, मीनाक्षी प्रकाशन, बेगम
    ब्रिज, मेरठ, दसवाँ संशोधित एवं परिवर्द्धित संस्करण, 2013, पृ. 31
13- हिन्दी भाषा का उद्गम और विकास, डाॅ. उदय नारायण तिवारी, लोकभारती प्रकाशन, पहली
    मंजिल, दरबारी बिल्डिंग, महात्मा गांधी मार्ग, इलाहाबाद-211001, संस्करण 2014, पृ. 162-163


- अवधेश कुमार
 
रचनाकार परिचय
अवधेश कुमार

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