प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितंबर 2017
अंक -31

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कथा- विगत का डर

रंजना ने बच्चों के कमरे में जाकर श्रेया और रम्या को दूध से भरी गिलास को पकड़ा दिया और प्यार से उन्हें तैयार होने को कहा। श्रेया का कोचिंग और रम्या का वायलिन क्लास का समय हो रहा था। लॉबी में आकर रंजना ने समाचार का चैनल लगा दिया। बच्चों को नौकरानी के बल पर पालना रंजना को कभी नहीं पसंद था इसलिये उसने नौकरी छोड़ दी थी। सुनील बेहद सुलझे हुए इंसान हैं। रंजना ने पहले से ही यह सोच रखा था कि बच्चों को कदम-कदम पर लड़की होने का अहसास नहीं करायेगी।

सुनील को तो नहीं पर रंजना को श्रेया की बढ़ती उम्र का एहसास था इसलिये रंजना सतर्क और सचेत थी। समाचार में दिल्ली दुष्कर्म काण्ड की चर्चा चल रही थी। रंजना का मन व्यथित हो जाता है और आँखें भर आती हैं। कोई कपड़ों पर चर्चा कर रहा था तो कोई संस्कारों पर और कोई संवेदना के साथ उसके दर्द को समझ रहा था। तभी अचानक रम्या बाहों को फैलाकर रंजना के गर्दन को घेर लेती है और उसके ऊपर झूल जाती है और बड़े ही प्यार से पूछ्ती है- "मम्मा ये दुष्कर्म क्या होता है?" रंजना ने हड़बड़ाकर चैनल बदल दिया और रम्या के गालों पर प्यार से हल्की चपत लगाते हुए कहा "तुम तैयार नहीं हुई, वायलिन क्लास को देर हो जायेगी।" रम्या ने भी रंजना की स्टाईल में जवाब दिया- "तैयार तो हो गयी बस चोटी बना दो फिर टी.वी. देखना।"
"आज तो मेरी बिटिया बड़ी जल्दी तैयार हो गयी और दीदी क्या कर रही है।" रंजना का वाक्य अभी पूरा भी नहीं हुआ कि देखा श्रेया अपने बैग को लिये सामने मुस्कुरा रही थी। "आई एम रेडी मॉम" कहकर वह रम्या के बालों को प्यार से बिखेर देती है। रम्या चिढ़कर बोलती है- "दीदी! बिहैव।"
रंजना हँसते हुए रम्या की चोटी बनाने लगती है पर मन में एक प्रश्न कौंध रहा था, "मम्मा ये दुष्कर्म क्या होता है?"


आठ साल की रम्या को इस शब्द का अर्थ पता नहीं है और कल ही चार साल की बच्ची की मृत्यु का समाचार पढ़कर वह सिहर उठी थी। सोचा इतनी अमानवीयता? पर ख़ुद भी तो जीवन के हर पल को डर-डर कर जिया है। एक डर हमेशा कि कहीं कोई कुछ गलत न कर दे और यह डर तब से था जबसे गलत क्या है यह भी नहीं पता था। कभी अकेले मत बाहर जाना, किसी के साथ अकेले मत रहना, कुछ पाने के लिये समझौता मत करना, किसी पुरुष पर विश्वास मत करना और न जाने कितनी हिदायतें माँ देती थी। कुछ समझ में आती थी कुछ नहीं, पर इन हिदायतों ने एक चीज़ सिखा दी थी वह है लड़की होने का डर। पर आज पलट कर देखती हूँ तो माँ समझदार लगने लगी है। उसका रोकना-टोकना अब बुरा नहीं लगता, पहले लगता था। शायद अब ख़ुद माँ बन गयी हूँ इसलिये। श्रेया में अपना यौवन साकार रूप में देख मुस्कुराने के अलावा मेरे पास कोई चारा नहीं है।

श्रेया माँ को मुस्कुराते हुए देखकर पुछती है- "क्या हुआ मॉम?" रंजना प्यार भरी आँखों से उसे देखते हुए कहती है- "बस मुझे गलत मत समझना।"
"आप क्या कह रहीं हैं मॉम?" श्रेया के कहने पर रंजना जल्दी से बोल पड़ती है- "अच्छा बातें बाद में अभी टाइम हो गया है।" रंजना दोनों को छोड़ने के लिये बाहर आती है। रम्या का ऑटो रिक्शा पहले से ही खड़ा था। वह लपक कर उसमें बैठ जाती है। रम्या अपने ऑटो वाले को अच्छे से पहचानती है और ऑटो वाला भी उसे बहुत मानता है। ऑटो वाला रम्या को प्यार से हल्की-सी चपत लगाकर कहता है- "पाँच मिनट लेट कर दिया, कल से टाइम पर आना।"
रम्या ने बड़े चहकते हुए कहा- "ओ.के. अंकल।" "बाय माँ, बाय दी।" रम्या बाय करते हुए दूर निकल गई। रंजना गौर करती है कि ऑटो में बैठने वाली पहली लड़की रम्या ही है। रम्या ऑटो वाले को घर के सदस्य की तरह मानती है। रंजना सोचती है अगर यह ऑटो वाला रम्या को वायलीन क्लास न ले जाये तो? अगर यह किसी और बच्चे को न ले तो? घर से जाने और क्लास से आने में रम्या को तीन घन्टे का समय लगता है। तीन घंटे में!!!
अचानक ही रंजना के रोयें खड़े हो गये और वह डर से सिहर गयी। उसके माथे से पसीना बहने लगा और होंठ थरथराने लगे। अपने कंधे पर श्रेया के हाथ के स्पर्श से वह वापस धरातल पर आ जाती है। श्रेया पूछ बैठती है- "क्या हुआ मॉम?"
रंजना अपने माथे का पसीना पोंछकर कहती है, "कुछ नही बेटा बस.....।"


श्रेया भी बाय करके कोचिंग के लिये निकल जाती है। श्रेया अपनी सुविधानुसार बस या ऑटो लेती है। रंजना का मन उचाट हो जाता है। घर के बाकी काम वह बेमन से करती है। श्रेया के कोचिंग पहुंचने के समय का अनुमान लगाकर रंजना श्रेया को फोन करती है। श्रेया बड़ी तलखी से जवाब देती है- "क्या मॉम? रोज़ फोन करतीं हैं, मैं पहुच गयी हूँ और क्लास स्टार्ट हो गयी है।" रंजना को श्रेया की आवाज़ में खीझ साफ महसूस हो रही थी पर वह कुछ कहती नहीं है।
श्रेया की उम्र और इस उम्र की नादानियों का एहसास उसे है इसलिये वह चुप हो जाती है पर सतर्क रहना उसका काम है और यह काम वह करेगी चाहे श्रेया को पसंद आये चाहे नहीं।


टी. वी. पर स्त्रीवादी कार्यक्रम चल रहा था पर उसके मन में विपरीत भाव प्रबल रूप से चल रहें थे। स्त्रीवादी विचारधारा के सारे आदर्श वाक्य धुंधले होने लगते हैं और श्रेया रम्या का यथार्थ स्पष्ट दिखाई देने लगता है। स्त्री के अस्तित्व स्थापना के यथार्थ को वह सुन रही थी और कुछ अलग गुन रही थी। जीवन का यथार्थ उसे विचलित कर रहा था। आदमी के भीतर बैठा अनजान चेहरा उसे बेचैन कर रहा था। रंजना को लगता है कि स्त्री का इतिहास बस एक है और बार-बार उसकी पुनरावृत्ति होती है। हर रिश्ते के भीतर सिर्फ एक चेहरा सिर्फ पुरूष और कुछ नहीं। वह पुरूष है और कुछ नहीं। रिश्तों के नाम केवल दिखावे के हैं। असली रिश्ता सिर्फ एक है कि वह पुरूष है और स्त्री को लेकर रहेगा, चाहे वह कुछ भी लगती हो, चाहे उसकी उम्र कितनी भी छोटी हो। हर रिश्ते और पहचान का बिंदु धुल जाता है। कुछ धुले हुए अक्स समाज के सामने आ जाते हैं और कुछ आजीवन सामने नहीं आ पाते हैं।
रंजना के भीतर से आवाज आयी- "जो हुआ उसे किसी से मत कहना।" अचानक ही रंजना के सामने होठों पर उंगली रखे माँ का अक्स उभर आता है। बाबूजी की लाल आँखें उसका पीछा करने लग जाती हैं। खून से लथपथ रंजना खुद को लहूलुहान हुए देखती है। बाबूजी ने माँ से कड़क आवाज़ में कहा- "अस्पताल ले जायेंगे तो सबको पता चल जायेगा। मैं शहर जाकर डॉक्टर से दवा लिखवाकर ले आता हूँ।"
माँ जल्दी से सफाई करने मे लग जाती है। दर्द बढ़ता गया और यह एहसास कम होता गया कि क्या हो रहा है। अपने ठीक होने के दिन वह गिन नहीं पाई। माँ ने कभी यह नहीं पूछा कि दर्द हो रहा है या मैं कैसी हूँ पर हर रोज़ एक बात ज़रूर कहती थी कि "किसी से कुछ मत कहना।"


उस समय यह नहीं समझ नहीं आया कि बाबूजी को पूछने आये काका ने उसे धक्का क्यों दिया। सिर पर इतनी तेज चोट लगी कि कुछ याद नहीं रहा और दर्द इतना हुआ कि पूरा शरीर दुखने लगा। दर्द इतना हुआ कि सब कुछ सपने में हो रहा है यह लग रहा था। अब समझ आता है कि वह बेहोशी की हालत थी। वह दर्द, वह चीख आज भी रोम-रोम में दर्द उठाती है। जितने दिन वह बीमार रही माँ मार खाती रही, कभी लात से और कभी आँखों से। तब माँ की गलती क्या थी! पता न था पर आज वह क्या यह गलती नहीं कर रही है? पर घर में कब तक बंद करके रखुंगी? सुनील कहते हैं सोच बदलो। सुनील और बाबूजी में कितना फर्क है। बाबूजी माँ से हमेशा कहते थे कि अगर किसी को पता चला तो इसे ब्याहेगा कौन? और सुनील कहते हैं अब ये सब बातें मायने नहीं रखती हैं।
जब बाबूजी ने कहा था कि अगर किसी को पता चला तो इसे ब्याहेगा कौन?  उस समय मुझे फिर वही दर्द हुआ था और अंदर से चीखें निकलती थीं पर आज तक उन चीखों को न कोई सुन सका और न महसूस कर सका। कभी-कभी जी करता है कि सुनील को सब बता दूँ। वह औरों जैसे नहीं हैं, पर दूसरे ही पल लगता है कि जैसा मैं सोचती हूँ वैसा नहीं हुआ तो? मेरे साथ खुली विचारधारा रखने वाले सुनील भी औरों की तरह हुए तो?
आख़िर हर पुरूष किसी न किसी का भाई, पति या पिता ही तो होता है फिर भी ऐसी घटनायें होती हैं। क्या सुनील भी..........।


अचानक रंजना अपना सिर झटकती है और बुरे ख़याल दिमाग से निकालती है। वह सोचती है- सुनील सच कहते हैं- 'मैं अनावश्यक ही बातों को तूल देती हूँ। अच्छे और बुरे इंसान हर जगह हैं बस पहचानने की समझ होनी चाहिये।'  सुनील कितने सुलझे तरीके से यह बात समझा देते हैं। सच ही तो है यह मीडिया वाले ख़बरों को मसाला बनाकर पेश करते हैं। सुनील ठीक कहते हैं हर पुरूष बलात्कारी तो नही है पर सब पर विश्वास भी नहीं कर सकते हैं। समाचार हो या विज्ञापन, फिल्म हो या साहित्य हर जगह बस एक ही चीज़ बिकती है। इसलिए हर जगह बस वही चीज़ दिखाई देती है। पर यह बात तो इस उम्र में समझ आती है। श्रेया और रम्या इन बातों को समझने के लिये अभी बहुत छोटी हैं। श्रेया की उम्र तो ज्यादा ध्यान देने की है। इस उम्र मे लड़कियाँ बेवकूफ़ ज्यादा बनती हैं और लड़कों को अपना मतलब निकालना खूब आता है। लड़कों की गोष्ठियों के बारे में सुनील बताते हैं, कैसे वह ग्रुप में डिस्कस करते हैं किसे फँसाना है और कैसे फँसाना है। उनके लिये हर चीज़ एन्जॉय है। अगर सुनील न बताते तो क्या वह जान पाती लड़कों की तमाम बातें, नहीं। जब मैं नहीं सोच पाती इन सबको तब श्रेया से क्या उम्मीद करूं। मेरा कुछ भी समझाना उसे अविश्वास की ओर ही ले जायेगा क्योंकि इस उम्र मे तो मैं भी ऐसी ही थी। उसे कैसे सतर्क करूं।

पिछ्ले साल जब टूर जाने के लिये मना किया था तो उसने कितना तूफान मचाया था। सच ही तो कहा था श्रेया ने कि जो बच्चे गये थे, वे भी तो उसी की तरह थे। मैं ही अपना डर नहीं निकाल पायी थी। कैसे समझाती उसे कि अनजान शहर, अनजान रास्ते और हम वयस्क लड़के-लड़कियाँ, उस पर से मोबाइल का ज़माना। अब तो उँगली की एक क्लिक पर पूरी दुनिया को देखा जा सकता है और कुछ भी किया जा सकता है, ऐसे मे पंद्रह दिन बाहर रहना।
मैं जानती हूँ कि श्रेया का दिल दुखाया था मैंने, पर सुनील अपनी बात पर अड़े रहे। कितना कहा पर सुनील ने उसे टूर पर भी भेजा और मोबाइल भी दिलाया और मुझे पूरे समय विचार सुनाते रहें, समय बदल गया है सोच बदलो। अरे मेरे सोच बदलने से क्या लोगों की सोच बदल जायेगी? क्या लोगों के चेहरे पर से नकाब उतर जायेंगे? क्या लड़कियाँ सुरक्षित हो जायेंगी?


रंजना को अपने समय में एक टूर पर घटी घटना याद आ गयी। बिना कसूर के भी उस लड़की का शहर छोड़ना आज भी रंजना को रूला जाता है। पंद्रह दिन तक उसने समय कैसे काटा है, वह ही जानती है। रंजना के ज़ेहन में काका के बाहुपाश में दबा खुद का चेहरा कौंध जाता है और अगले ही पल वह चेहरा श्रेया में बदल जाता, रंजना डर जाती है। माँ के शब्द बार-बार कान में गुंजते है 'किसी से कुछ न कहना'।
अगर श्रेया ने भी हमसे कुछ नहीं कहा तो? अगर .....?


कॉलबेल की घंटी से रंजना यथार्थ में आती है। वह दरवाज़ा खोलती है। रंजना को पसीने से लथपथ और चेहरे की हवाइयाँ उड़ी देखकर सुनील के चेहरे की मुस्कान गायब हो जाती है। वह घबराकर पूछ बैठते है "क्या हुआ?"
"कुछ नहीं।"
"ऐसा लग रहा है जैसे कोई हॉरर मूवी देख रही थी।" सुनील की बात पर रंजना मुस्कुराकर मुँह धुलने चली गयी।


सुनील सच कह रहे थे शीशे में उसके बिखरे बाल और आँखों में लाल निशान अब भी दिख रहे थे। वह चाय बनाने रसोई में जाती है  तो पीछे-पीछे सुनील भी आ जाते हैं। वह रंजना की चुटकी लेते हैं– "लगता है फिर सावधान इंडिया देखा जा रहा था?"
रंजना सिर्फ मुस्कुरा देती है। सुनील अपनी रो में बह रहे थे– "यार कितनी बार समझाया इस तरह के सीरियल मत देखा करो हल्के-फुल्के लाइट प्रोग्राम देखा करो।" रंजना ने हाँ में सिर हिला दिया। सुनील कपड़े बदलने चले जाते हैं और रंजना सोचती है, सुनील को कैसे समझाये की उसकी मुश्किल क्या हैं। रंजना रम्या को क्या कहे और कैसे समझाये की स्पर्श की परिभाषा अलग-अलग होती है। वह कैसे समझाये की यह स्पर्श प्यार का है और यह स्पर्श घातक है।
कैसे बतलाये की किस पर विश्वास करो, किस पर नहीं! क्या अच्छा है, क्या बुरा है। यह कैसे बताये और बताये तो वह कैसे समझ पायेगी? क्या इस उम्र में वह यह बात समझ पाई थी?


नहीं। पर सचेत तो करना ही है। सचेत करने में कहीं ऐसा न हो की उम्र की उसकी स्वभाविक कोमलता चली जाये और नकारात्मकता पैठ कर जाये। श्रेया तो फिर भी अब दुनिया देख रही है पर रम्या की दुनिया तो उसकी उम्र की तरह ही छोटी है पर क्या कोई उसे छोटा समझेगा? और श्रेया की भी दुनिया सिर्फ उतनी ही बड़ी है जितनी उसकी दोस्तों ने बनाई है। और...................!
"चाय क्या पूरी जला दोगी।" सुनील ने पीछे से तेज़ आवाज़ में कहा तो रंजना हड़बड़ा गई। उसने गैस बंद किया और सुनील के लिये चाय छानने लगी। सुनील उसके कंधे पर हाथ रखकर उसे अपनी तरफ मोड़ता है और बड़े प्यार से कहता है– "क्या हुआ रंजना। तबियत ठीक नहीं है क्या?" रंजना कहना कुछ और चाहती है पर उसके मुंह से निकलता है- "कुछ नहीं बस ऐसे ही।"
"ऐसे ही क्या रंजना!"
"मन उचाट है मेरा।"
"दिन भर काम करोगी और फालतू बातें सोचोगी तो मन उचाट होगा ही। अच्छा चलो आज खाना मत बनाना, हम कहीं बाहर खाना खाने चलेंगे। रम्या का तो टाइम हो गया है वह आती ही होगी।"
"हूँ!" रंजना ने हाँ में सिर हिलाया। दोनों लॉबी में आते हैं और चाय पीने लगते हैं। थोड़ी देर में रम्या वायलिन क्लास से वापस आ जाती है और पापा की गोद में बैठ जाती है। रंजना मुस्कुराने लगती है। रंजना ने सुनील से पूछा कल तो आप घर पर रहेंगे। सुनील ने हाँ में सिर हिलाया और पूछा क्यों?
"कुछ ज़रूरी सामान लाना था, मैं निकल नहीं पा रही थीं।"
"ठीक हैं तुम मार्केट चलीं जाना और पापा-बिटिया खेलेगें क्योंकि कल छुट्टी हैं।" रम्या भी उतने ही उत्साह से पापा से चिपक जाती है।
वह बहुत खुश है कि पापा कल पूरा दिन घर पर रहेंगे। वह पापा के साथ खूब खेलेगी।


श्रेया कोचिंग से आकर बताती है कि उसका कल आई टी आई का पेपर है। सुनील गम्भीरता से सोचने लगते हैं फिर श्रेया से पूछते हैं सेंटर कहाँ है? श्रेया विद्यालय का नाम बताती है। सुनील सोचने लगते हैं और कहते हैं- "ठीक है, मैं सोनू से कह देता हूँ वह तुम्हें छोड़ देगा।" पर रंजना तुरंत विरोध कर देती है और कहती है "सोनू क्यों? आप नहीं छोड़ सकते हैं।" सुनील को रंजना की आँखों में अविश्वास स्पष्ट दिखाई देता है। "ठीक है बाबा, मैं ही छोड़ दूँगा।" मौका देखकर श्रेया ने तुरंत कहा- "पापा मुझे स्कूटी खरीद दीजिए।"
"पहले बड़ी हो जाओ तब।" रंजना ने स्पष्ट कहा तो श्रेया तमक गयी और कहा- "आपकी नज़र में मैं कभी बड़ी नहीं हो सकती। आप हमेशा छोटी बच्ची की तरह ट्रीट करते हो।" सुनील इशारों से श्रेया को रोकते हैं और कहते हैं- "अच्छा पहले खाना खाने चलते हैं फिर इस टॉपिक पर बात होगी।" सुनील के कहते ही सब तैयार होने चल्रे जाते हैं।


सुनील नोटिस करता है कि रंजना का मन पूरे समय उदासीन है। बच्चे उत्साह से खाना ऑर्डर करते हैं। बीच में सभी हँसी-मज़ाक करते है। रंजना भी शामिल रहती है इन सब में पर अन्दर से उसे कुछ टीस रहा था, यह सुनील अनुमान लगा लेता है पर वह कुछ कहता नही है। बच्चों के सोने के बाद वह रंजना के पास आता है। जैसे ही वह रंजना को गले लगाता है रंजना फफक कर रो पड़ती है। सुनील उसे बडे प्यार से चुप कराता है। अपनी आवाज़ में मधुरता भरकर वह पूछता है- "क्या बात है रंजना? तुम क्यों ऐसी होती जा रही हो। किस बात की चिन्ता है तुम्हें?"
"आप जानते हैं कि सोनू का आना मुझे बिल्कुल पसन्द नहीं है फिर भी इतनी बड़ी बात कैसे भूल गये आप?"
"हाँ भूल गया पर वह घटना इतनी ब‌ड़ी नहीं है, जितना तुम बड़ा बना रही हो।"
"अच्छा! अगर सही वक्त पर मैं न पहुँचती तो रम्या के साथ क्या होता?"
"ऐसा कुछ भी नहीं है। वह फोटोग्राफर सोनू का दोस्त था और रम्या को वाशरूम ले जा रहा था।"
"वाश रूम छत पर होता है? यह सोनू और फोटोग्राफर की मिलीभगत थी।"
"अरे भाई वह भी तो घर में नया ही था। वह क्या पहले से घर का हर हिस्सा जान रहा था। रंजना हर बात पर शक ठीक नहीं होता है। याद करो रम्या जबसे श्रुति की बर्थडे पार्टी में गई थी तब से तुम बाहर लॉन में टहल रही थी। पहले उसे जाने के लिए मना किया, फिर जब मैंने भेजा तो एक मिनट भी तुम चैन से नहीं बैठी। आखिर कॉलोनी के और भी बच्चे तो गये थे पार्टी में, सिर्फ तुम्हारी ही बेटी तो नहीं थी वहाँ?"
"पर जब में गई रम्या को वापस लाने के लिए तब वह पार्टी वाले कमरे में नहीं छत पर मिली। तुम्हें क्या पता उस समय मेरा क्या हाल हुआ था। अगर में समय पर नहीं पहुँचती तो ….? अभी रम्या को सही-गलत का पता ही कहाँ है। हर दिन अखबार और न्यूज चैनल पर छोटी बच्चियों पर हो रहे अत्याचार की खबरें रहती हैं। हर रिश्ते तार-तार हो गये है। खतरा घर और बाहर दोनों जगह है।"
"मैं समझता हूँ रंजना! पर इस डर से हम अपनी बच्चियों को जिंदगी जीने नहीं देंगे? उन्हें समझदार बनाओ और बंदिशें उतनी ही लगाओ जितनी जरूरी है न कि डर से उन्हें घर मे बंद कर दो। क्या तुम्हारा शक, तुम्हारा हर बात में रोकना-टोकना उन्हें स्वाभाविक जीवन जीने देगा? उनके नजरिये से सोचो, उन्हें पता ही नहीं होता है कि कोई काम करने से क्यों रोका गया है या उन्हें कहाँ ख़तरा है। उनके लिये तुम्हारा सचेत होना महज रोक-टोक है। तुम्हारा डर क्या है यह उन्हें नहीं पता है न ही वह इस डर को महसूस करती है क्योंकि डर का रूप ही वह नहीं जानती है। इसलिये कहता हूँ उन्हें समझदार बनाओ, अपना अच्छा बुरा वह ख़ुद ही समझ जायेंगी। तुम अपना दिमाग फ्री रखो और ये क्राइम पेट्रोल देखना बंद करो। दुनिया में बुराई है पर हर कोई बुरा नहीं है सिर्फ आदमी को पहचानने की ज़रूरत है। आओ तुम्हें कोल्ड कॉफी पिलाता हूँ।" कहते हुए सुनील रंजना को रसोई तक बाहों में भरकर अपने सहारे ले जाता है तो रंजना को अनायास हँसी आ जाती है और वह मुस्कुराते हुए कहती है- "यह कोल्ड कॉफी बनाना कब सीखा?"


"मैंने कब कहा कि मैं बना रहा हूँ। तुम बनाओगी और मैं पिलाऊंगा।" कहते हुए सुनील ठहाका लगाकर हँसने लगते हैं और रंजना की हँसी साथ में मिल जाती है। अगले दिन सुनील श्रेया को छोड़कर आता है और रम्या के साथ खेलने लगता है। रंजना सुनील को बोलकर मार्केट चली जाती है।  मार्केट से वापस आते हुए जैसे ही रंजना दरवाजे के पास आती है, वैसे ही खिड़की खुली होने के कारण रम्या की आवाज़ हल्के से कानों में पड़ती है। रम्या भय से हल्के-हल्के चीख रही थी। रंजना ने घबराकर कॉल बेल बजाई। दरवाजा खुलते ही रम्या रंजना से चिपक गई, वह अब भी हौले-हौले सिसक रही थी। पीछे से सुनील दौड़ते हुए आते हैं, वह पसीने से तर-ब-तर थें। सुनील को देखकर रंजना की आँखें फटी की फटी रह जाती हैं। एक पल भी रूके बिना रंजना ने सुनील को एक थप्पड़ जड़ दिया। सुनील अवाक रह जाते है और रम्या चीख पड़ती है- मॉम?

सुनील को रंजना की आँखों में अविश्वास और विगत का डर दिखाई देता है। इस बार हाथ सुनील का उठ गया। रंजना को तमाचा जड़ते हुए सुनील चीखते हुए रो पड़ते हैं- "पागल हो गयी हो तुम।" रंजना सोफे पर धम्म से गिर पड़ती है और अपना सिर पकड़ लेती है। अंदर से सुनील के रोने की आवाज़ आती रहती है। रंजना को लगता है कि उसका कलेजा मुँह को आ जायेगा। रम्या एक तरफ सहमी खड़ी रहती है। रम्या के चेहरे पर ढेरों प्रश्न थे कि आज पापा के साथ खेल में ऐसा क्या हो गया!!


- डॉ. शुभा श्रीवस्तव
 
रचनाकार परिचय
डॉ. शुभा श्रीवस्तव

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कथा-कुसुम (1)