प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितंबर 2017
अंक -31

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कथा- एक हठयोगी की बाँह

अगर आप समाचार-पत्र पढ़ते हैं और अगर आपने कल का समाचार-पत्र पढ़ा है तो यकीनन आपने उस योगी के बारे में जरूर पढ़ा होगा, नहीं, ये ख़बर मुख-पृष्ठ पर नहीं थी क्योंकि ये कोई नेशनल लेवल से जुड़ा बड़ा मुद्दा नहीं है, ना ही ये बॉलीवुड से जुड़ी किसी सैन्सेशनल न्यूज़ है, जो अख़बार की टी.आर.पी. बढ़ा सके। ये दूसरे पृष्ठ पर भी नहीं थी जहाँ कि आमतौर पर हम पहले पेज पर दी ख़बरों के बचे हुऐ हिस्से पढ़ते हैं, तीसरा और चौथा पन्ना जैसे कि सब जानते हैं कि ईश्तिहारों के लिए आरक्षित होते हैं। छोटे वाले शादियों के और रोजगार संबधी और बड़े वाले गुप्त रोगों के ईलाज वाले। कई बार इन ईश्तिहारों को पढ़ने पर ऐसा महसूस हो सकता है कि जैसे पूरी दूनिया ही नपुंसक हो गई है या फिर जल्द ही होने वाली है। पाँचवा पन्ना राज्य की राजनीति से जुड़ी महत्वपूर्ण ख़बरों के लिए है और छठा एवं सातवां सम्पादकीय, आलेखों और लोक-सभा तथा राज्य-सभा की कारवाई संबंधी जानकारी से संबधित और फिर आता है आठवां पन्ना जहाँ अक्सर महत्वहीन या जैसे फिजूल की ख़बरें जैसे पेज भरने के लिए ही लिखी गई हो, नौवा और दसवां पन्ना अर्थ जगत से जुड़ी ख़बरों के लिए और ग्यारहवां खेल संबंधी, आख़िरी पन्ना मशहूर हस्तियों की तस्वीरों और गॉसिप न्यूज़ के लिए होता है।

तो कहीं और न जाते हुए वापिस पेज आठ पर आईए, जहाँ ऊपर के दाहिने कोने में आपको इस हठ-योगी से जुड़ी एक ख़बर दिखेगी, जिसने तीस सालों से अपनी बाँह ऊपर की तरफ सीधी रखी है।
तीस साल! मैंने सोचा, कि जैसे ये तीस घण्टों की बात हो रही हो।
"तुमने ये पढ़ा?" मैंने अपने भाई से पूछा।
"हाँ" वो बोला।
कितना तकलीफ़देह होगा ये सब, मैंने सोचा।
ख़ुद योगी के शब्दो में, "शुरू में बहुत मुश्किल था फिर स्वयं भगवान ने मुझे शक्ति दी और मैं ये कर पाया।
"तुम क्या सोचते हो?" मैंने पूछा।
"बकवास", वो बोला, "देखो तस्वीर को, उसकी बाँह को देखो! कितनी पतली और बेजान लग रही है। ऐसा लगता है जैसे सारे लिगामैंट्ज़ मर गए हों। अब ये बाँह मृत हो चुकी है। ये बाँह अब कभी अपनी पूर्ववत हालत में नहीं आ सकती। ये अब मृत है और सवाल ये है कि ऐसा करके उस योगी ने क्या पाया, कुछ भी नहीं।"


मैंने अपने पिताजी की तरफ देखा, उनका विचार भी कुछ ऐसा ही था।
"ये अंध-भक्ति है और कुछ नहीं। इस तरह से कुछ हासिल नहीं किया जा सकता, ये व्यर्थ ही है।"
"नहीं।" मैंने विरोध में कहा, "हम यह नहीं कह सकते कि ऐसा करके उसने क्या पाया, वो भी इतने सालों से लगातार और फिर अगर इस तरह से किसी की प्राप्तियों को तय किया जाए तो कोई ये भी पूछ सकता है कि बिल गेट्स ने दुनिया के सबसे अमीर व्यक्तियों में शुमार होकर भी क्या हासिल किया। क्या प्राप्तियाँ सिर्फ भौतिक ही हैं? नहीं, और भी बहुत कुछ है ज़िंदगी में, ये फैसला सिर्फ वो योगी ही ले सकता है कि उसने क्या पाया है और क्या नहीं।"
मेरी बहसशील प्रवृति को देखते हुए उन्होंने चुप रहना ही बेहतर समझा और अपने-अपने काम में व्यस्त हो गए।


तीस साल! कितनी हैरानी की बात है, मैं अब 36 साल का हो गया हूँ। मैंने ज़िंदगी में क्या हासिल किया? मैं ख़ुद से पूछ सकता हूँ, हांलाकि मेरे पास अभी इस सवाल का कोई जवाब नहीं है, शायद कभी वक्त जवाब देगा।
यकायक याद आया कि ठीक 30 साल पहले ही हम दिल्ली से पंजाब आए थे। 1984 के सिख विरोधी दंगों में जान बचने के बाद, ये दंगे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के अंग-रक्षकों द्वारा उनकी हत्या के बाद दिल्ली सहित पूरे उत्तर भारत में हुए थे।


करीब 3000 सिक्खों को दिल्ली में (8000 और को बाकी भारत में) क़त्ल किया गया, ज़िन्दा जला दिया गया। उनके घर-कारोबार सब भीड़ ने सरेआम लूट लिए। भीड़, जिसे पूर्ण सहयोग हासिल था दिल्ली पुलिस का भी और कांग्रेस पार्टी के बड़े और ताकतवर नेताओं का भी।
"जब बड़ा पेड़ गिरता है, तब धरती हिलती है।" नये प्रधानमंत्री ने कहा।
बस यही बयान ही एकमात्र कारवाई थी सरकार की तरफ से इतने हज़ार लोगों के नरसंहार के इंसाफ के लिए। जैसे ये किसी ख़ास तबके की सरकार हो और प्रधानमंत्री किसी विशेष समुदाय के प्रधानमंत्री हों न कि पूरे भारत के।
इसके बाद ये मुद्दा हर बार इलैक्शन के वक्त कानो में गूंज उठता।
"हम 84 के पीड़ितों के लिए इंसाफ चाहते हैं।" विपक्षी दल चिल्ला उठते। "ये राष्ट्रीय शर्म का विषय है आदि-आदि।
पर चुनाव के बाद वो इस राष्ट्रीय शर्म को भूल जाते। पूरे पाँच वर्ष के लिए, अगले चुनावों के वक्त तक।
कई बार मुझे ऐसा लगता कि ये मुद्दा कोई मुद्दा न होकर एक ठंडे खून वाला कोई जानवर हो, जो पाँच साल के लिए शीत-निद्रा में चला जाता है और तभी जागता है जब चुनाव रूपी गर्मियाँ आती हैं।
जसविंदर का फोन आया उस दिन, जब कोर्ट ने गुजरात दंगों के कुछ दोषियों को सजा सुनाई। आख़िर इंसाफ हुआ, हो सकता है कि किसी दिन 84 के पीड़ितों को भी इंसाफ मिले।


पर ये उम्मीदें अब धुंधली हो रही हैं, क्योंकि तीस बरस से ज्यादा वक्त बीत चला और किसी एक गुनाहगार को भी सज़ा नहीं हुई, हालांकि ये सब को पता है कि किस तरह एक पार्टी के नेता और सीनियर पुलिस ऑफिसर इसमें शामिल थे।
मेरे विचारों की तंद्रा को सतनाम सिंह के स्कूटर के हॉर्न ने तोड़ दिया।
"कोई ख़बर?"
"कोई नहीं अंकल।" मैंने कहा।
"मैं पुडा (पंजाब अर्बन डिवेलपमैंट अथारिटी) के ऑफिस.....!"


वो पुडा ऑफिस में जो बात हुई उसका ब्यौरा देने लगे, जहाँ वो दंगा-पीड़ित परिवारों के पुनर्वास के लिए अलॉट होने वाले प्लाट या फ्लैटों की जानकारी लेने के लिए गऐ थे। सतनाम सिंह भी उन हज़ारों दंगा पीड़ित परिवारों में से एक परिवार से हैं। वो उन चंद लोगों में से है, जो अब भी पीड़ित परिवारों के पुनर्वास के लिए संघर्षरत हैं, जिन्हें अभी तक पंजाब सरकार से किसी तरह की सहायता नहीं मिली।
कई बार हैरानी होती है कि हाईकोर्ट की फटकार के बाद भी पंजाब सरकार सभी दंगा पीड़ित परिवारों को एक समान सहायता नहीं दे पाई और पता नहीं दे पाएगी भी या नहीं!


मुझे अब भी याद है वो दिन जब सी.बी.आई. ने एक बड़े नेता के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। सतनाम सिंह ने ही हमें सूचना दी।
"और बाकी के दोनों नेता?" मैंने पूछा।
"देखो क्या होता है।" वो बोले।
"कुछ नहीं होगा अंकल, इतने साल बीत गए, क्या कहीं इंसाफ हुआ? एक भी गुनाहगार को सज़ा नहीं मिली। अब कोई उम्मीद नहीं।" मैंने हताशा में कहा।
"हाँ, हम सबको पता है कि कोई न्याय नहीं हुआ और शायद ही हम न्याय होता देख सकेंगे। दो और पीढियां इस दौरान पैदा हो गई। हमारी पीढ़ी जो तब जवान थी, अब बूढ़ी हो गई। पर फिर भी उम्मीद के बारे में कुछ मत कहो मेरे बच्चे, उम्मीद ही ज़िन्दगी है और न्याय के लिए हमारी उम्मीद कभी मरेगी नहीं। हमारा ये संघर्ष व्यर्थ नहीं है।"
मैं निशब्द हो गया।
मेरे दिल उनके लिए और उन तमाम पीड़ितों के लिए सम्मान से भर गया, जो बिना न्याय मिलने की उम्मीद के ही न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
उनकी आवाज़ें गूंगी नहीं हैं। वो आवाज़ें मृत नहीं हैं।


मैंने अख़बार की तरफ दोबारा देखा, फिर से उस हठ-योगी की ऊपर ऊठी हुई बाँह को देखा। ये सच में मुझे बेहद पतली बेहद कमज़ोर नज़र आई, पर ये मृत नहीं लगी। ये बिल्कुल ज़िन्दा है। मुझे लगा जैसे ये बाँह एक अकेली बाँह नहीं, ऐसे उन तमाम लोगों की उठी हुई बाँह है जो दुनिया में न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं, चाहे उनका संघर्ष कुछ भी हो, चाहे वो किसी भी धर्म या जाति के हों, वो दुनिया के किसी भी कोने में हों, और उनकी न्याय मांगती आवाज़ें कितनी ही क्षीण कितनी ही मंद पड़ती सुनाई दे, पर वो आवाज़ें मृत नहीं हैं, जैसे इस हठ-योगी की बाँह मृत नहीं है।


- हरदीप सबरवाल
 
रचनाकार परिचय
हरदीप सबरवाल

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