प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितंबर 2017
अंक -31

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

यात्रा-वृत्तांत

 झाडोल की ओट में 

 

२१ जुलाई २०१६ को सुबह ७ बजे अपनी गाड़ी से मैं और मेरे पति अहमदाबाद से झाडोल की ओर रवाना हुए | राजस्थान में उदयपुर से ५० कि.मी. पहले बाईं ओर को अंदर की तरफ कटती हुई सड़क पर गाड़ी दौड़ती रही | सड़क के दोनों ओर अरावली की हरी-भरी पहाड़ियों की सुरम्यता मनमोहिनी थी | शहर की भीड़-भाड़ से दूर प्रकृति के बेहद करीब होते जा रहे थे हम | लगभग १२ बजे हम अपने गंतव्य झाडोल की वादियों में पहुँच गए थे | वहाँ के सफारी रेसॉर्ट में पहले से ही दो दिन की बुकिंग करवाई हुई थी | घर से दो-तीन दिन दूर रहकर छुट्टियाँ बिताने की कल्पना ही मन को सुकून से भर देती है , फिर यहाँ की अनुपम व्यवस्था ने तो हमारा दिल बाग़-बाग़ ही कर दिया |

 

झील के किनारे, हरी-भरी पहाड़ियों से घिरे रेसॉर्ट में डीलक्स स्वीट न. ८ हमें दिया गया | हर तरह की सुविधाओं से सुसज्जित बेहद आरामदायक विशाल कमरा था | झील की ओर खुलती हुई बड़ी-चौड़ी बाल्कनी से जहाँ देखो बस हरी-भरी पहाड़ियाँ और उनसे घिरी और रेसॉर्ट से सटी हुई शांत झील अलौकिक शांति का अनुभव करा रही थी |सामान रखकर हमने घूम-घूमकर रेसॉर्ट में स्थित बगीचा, भीतर बने रास्ते और उनके साथ-साथ फैलती चली जा रही हरियाली, तरण-ताल और शाही रिसेप्शन देखा | उसके बाद ऊपरी मंजिल पर बने भोजनालय में जाकर राजस्थानी स्वाद का मज़ा कराता हुआ स्वादिष्ट भोजन खाया | तत्पश्चात हम अपने कमरे में चले गए | यात्रा की थकान उतारने के लिए एक झपकी ली और फिर ४:३० बजे कमरे में ही मौजूद केतली में चाय बनाकर पी | शाम ५ बजे नीचे उतर आये और फिर से यहाँ-वहाँ घूमकर समय बिताने लगे |

 

यहाँ गुमानसिंह नामक एक राजस्थानी रबारी व्यक्ति से मुलाकात हुई | जिसने झाडोल की वास्तविकता के बारे में जानकारी दी | वहाँ के एक अन्य कर्मचारी  ने राजनैतिक, सामाजिक पहलू बतलाते हुए वहाँ के स्थानीय गरीब लोगों की मजबूरियाँ बताईं | गुमानसिंह ने वहीं पली हुई मिलनसार स्वभाव वाली मादा कुक्कुर ‘बेगम’ से मिलवाया, जो थी तो ३ वर्ष की परन्तु दूर से लेटी हुई गाय के छोटे बछड़े जैसी प्रतीत होती थी | मोबाइल से उसकी काफी सारी फोटोज़ ली गयीं और फिर गुमान सिंह ने जब अगले दिन सुबह सामने की पहाड़ियों पर बसे बैणना गाँव के आदिवासी लोगों के घर ले जाने की बात कही तो हमारे मन  मन में जिज्ञासा और उत्सुकता जागने लगी |दूसरे दिन ७ बजे गुमानसिंह हमें बैणना गाँव ले गए | झील के किनारे बने रास्ते से गुज़रते हुए थोड़ी दूर पहुँचे तो वहाँ बीच में नदी के हल्के बहाव को पार करने के लिए हमें वहाँ पड़े पत्थरों पर पैर रख-रखकर रास्ता पार करना पड़ा | नया और विचित्र अनुभव रहा यह | उसके साथ ही पहाड़ी पर चढ़ाई शुरू हो गई | वहाँ एक किनारे पर पानी के पास कुछ बच्चे और एक-दो युवा पुरुष खड़े थे | वे पहाड़ी पर बने बैणना गाँव के आदिवासी ही थे |

 

पहाड़ी पर संभल-संभल कर पैर रखते हुए हम ऊँचाई की ओर जाते जा रहे थे | थोड़ी चढ़ाई चढ़ने पर मुर्गों की बांग सुनाई देने लगी | अब हम बस्ती के एकदम करीब आ गए थे | ज़्यादा बड़ी बस्ती नहीं थी यह | वहाँ शुरुआत में ही हमने कच्चे से घर के सामने मकई का बेहद छोटा सा खेत देखा | सालभर की मकई इस खेत में उगाकर इसका मालिक साल भर का अनाज अपने ड्रम में इकट्ठा कर लेता है | बाहर से ही उसके बरामदे की दीवार पर अंग्रेजी में लिखा हुआ ‘वेलकम’ का रंग-बिरंगा बोर्ड देखकर हमारे चेहरे पर मुस्कान आ गई | वहीं एक ओर की दीवार पर बने आले को उसने देवी-देवताओं के चित्रों से सजाया हुआ था | वे लोग भी हमें देखकर हैरान हो रहे थे | उन्होंने हाथ जोड़कर ‘खम्मा घणी’ कहा तो हमने भी हाथ जोड़कर नमस्कार किया | आगे गए तो १८ वर्षीया एक गर्भवती स्त्री अपने घर में खड़ी थी | छोटे से घर का बाहरी हिस्सा खुला हुआ था | वहीं दाँई ओर चूल्हा बना हुआ था और उसके सामने उसका बहुत ही मैला-कुचैला सा बीमार बच्चा सुस्त चेहरा लिए बैठा था | पूछने पर उसने बच्चे का नाम अर्जुन बताया|

 

उसके घर से थोड़ा सा ही आगे बढ़े थे कि एक घर से बाहर निकलता हुआ कुत्ता हमें देखकर जोर-जोर से भौंकने लगा | उसके साथ खड़ी स्त्री ने उसे चुप कराने की कोशिश की | उसका घर अन्य घरों की तुलना में थोड़ा बड़ा था | गुमान सिंह ने अपनी भाषा में उस स्त्री से हमारे बारे में ही शायद कुछ बात की, फिर वह स्त्री हमें अपने घर में ले गई | वह स्त्री उस गाँव में महुआ की शराब बनाकर उसे बेचने का धंधा करती थी | इसीसे उसकी कमाई होती थी | बहुत ही साफ़-सुथरा घर था | जब वह अन्दर ले गई तो वहाँ एकदम अँधेरा था | हमें बताया गया कि उनके गाँव के घरों में बिजली नहीं है | कुछ लोग सरकारी खम्भों से चोरी का कनेक्शन ले लेते हैं | गुमान सिंह ने उसे एक गिलास में थोड़ी महुआ भरकर हमें दिखाने के लिए कहा | साफ़-सुथरे स्टील के गिलास में थोड़ी महुआ निकालकर उसने दी तो उसका मन रखने के लिए इन्होनें भी एक छोटा सा घूँट चख लिया | हमने इस घटना की विडियो फ़िल्म बनाई और इस अनुभव पर हमने खूब मज़ेदार बातें भी कीं |

 

अब गुमान सिंह जी हमें चढ़ाई कराने के मूड में आ गए थे | हम चढ़ते-चढ़ते पहाड़ी के शिखर पर पहुँच गए और हमारे पीछे-पीछे पहुँचे वे बच्चे, जिन्हें हमने इस यात्रा के आरंभ में देखा था | वे हमारा पीछा कर रहे थे | बच्चों से बातें कीं और उनकी फोटो खींची | वे बच्चे मुझसे पैसे माँगने लगे तो गुमान सिंह ने उन्हें हड़काकर भगा दिया | दरअसल पहले भी वे इसी तरह लोगों के पीछे लगकर कुछ लोगों के मोबाइल उनके हाथों से छीनकर भाग चुके थे | गुमानसिंह ने बताया कि यहाँ के ज़्यादातर मर्द कुछ काम नहीं करते, बस नशा करके पड़े रहते हैं | बच्चों के लिए सरकारी स्कूल में पढ़ाई के साथ भोजन की सुविधा भी है, पर बच्चों को पढ़ने में बिलकुल रूचि नहीं है | सामान्य दुनिया से कटे इन लोगों के लिए बस इनका गाँव ही इनकी सारी दुनिया है | इसके परे उन्हें कोई जानकारी नहीं है | १२ वर्ष की आयु के भी ज़्यादातर लड़के-लड़कियाँ अपने घरों से भाग जाते हैं | यहाँ शादी जैसी व्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं है | संतोत्पत्ति के बाद एक मुर्गा अपने लोगों को खिला देते हैं, बस उसी को शादी मान लिया जाता है | दरअसल, इनकी जीवनशैली को सुधारने के लिए समाजसुधारकों की पहुँच इन आदिवासियों से अभी बहुत दूर है | इसके बाद हमने पहाड़ी से उतरना आरम्भ किया | १५ मिनट बाद हम अपने रेसॉर्ट में थे |

 

आज जीवन की विचित्र सच्चाई से सामना हुआ था हमारा | मेरे मन में भी इन आदिवासियों के लिए बहुत दया जागी तो मैंने तय किया कि अपनी लेखनी के ज़रिये इनके बारे में लोगों को जानकारी दूँगी | शायद कोई तारणहार इन लोगों तक अपनी पहुँच बना सके | रेसॉर्ट में २-३ दिन बहुत शांति में बीते | दोपहर में राजस्थानी भोजन दाल-बाटी, चूरमा के लड्डू और अन्य स्वादिष्ट व्यंजन मिले तो लगा जैसे राजस्थान आना अपने में सार्थक हो गया | दूर से आये लोगों की चहल-पहल में, झील के किनारे, प्रकृति के साथ एक दोस्ताना शाम गुज़ारी |अगले दिन १० बजे तक नाश्ता करके अपना सामान लिया और झाडोल की ओट में बिताए मधुर पलों की यादें मन में लिए वापस अपने धाम अहमदाबाद की ओर रवाना हो गए | जब निकले तो बादल घिरे हुए थे | हलकी फुहारें पड़ने लगी थीं | हम सही समय पर निकले थे | मौसम भी सुहाना हो चुका था | यदि बारिश सुबह-सुबह २-३ घंटे लगातार हो जाती तो यहाँ चारों ओर पानी का स्तर बढ़ जाने के कारण कुछ समय के लिए गाड़ियों का आना-जाना बंद हो जाता | लेकिन वास्तव में जब तक जलस्तर बढ़ा होगा, तब तक तो वहाँ से मीलों दूर हाइवे पर हमारी गाड़ी अहमदाबाद की ओर, हवा से बातें करती हुई सरपट दौड़ती हुई चली जा रही होगी |   

 

 

 


- कविता पन्त
 
रचनाकार परिचय
कविता पन्त

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यात्रा वृत्तांत / पर्यटन-स्थल (1)