प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितंबर 2017
अंक -33

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संस्मरण

बतखों की परवरिश

 

     

 

     

 

आज फिर एक बार सरफ़राज मलिक जी से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ। एक समय उनकी पहचान एक शिकारी की थी। वे बाज़, चील, गरुड़, गिद्ध जैसे शिकारी पक्षियों को शिकार की शिक्षा भी देते थे। अब वे अहमदाबाद स्थित वन्यजीव पुनर्वसन केन्द्र में कार्य कर रहे हैं। बैठक खंड में प्रवेश करते ही एक कोने में रखी टोकरी के अन्दर कोई पक्षी के चूज़ों की आवाजें सुनाई दी। मैंने बड़ी उत्सुकता से टोकरी में झाँका, ‘ओह! क्या ये ‘नकटा’ बतख के चुजें हैं?’ मन में एक विलक्षण अनुभूति हो रही थी। हालांकि पक्षियों के पुनर्वसन में मेरी पत्नी आकांक्षा को विशेष रुचि है और मुझे सरीसृपों के, पर अब हम एक दूसरे के कार्यक्षेत्र में दखलंदाजी करते हैं, निश्चित ही मदद के लिए। ‘हाँ, लेकिन इन की परवरिश बड़ी मुश्किल होती है।’ सरफ़राज भाई ने कहा। ‘हम कोशिश करें?’ मैंने और आकांक्षा ने एक–दूसरे की ओर देखा। बिना कुछ कहे, ऐसा त्वरित निर्णय शायद हमने पहले कभी नहीं लिया! ‘बहुत अच्छी बात है।’ सरफ़राज भाई  ख़ुशी से उछल पड़े क्योंकि  चूज़ों का पहला  समूह  जो उनके पास आया था, उन सभी की एक सप्ताह की अवधि में मृत्यु हो गई थी। यह दूसरा समूह   पिछले दिन आया था  और  नौ चूज़ों में से दो की कल रात को ही मृत्यु  हो गई थी,  इसीलिए सरफ़राज भाई चिंतित थे।

 

‘तुम लोग अगर इनकी परवरिश करना चाहते हो तो बेशक मैं मदद करूँगा।’ सरफ़राज भाई  बोले। हम ने सहमति तो जता दी पर यह हमारा पहला अनुभव था। बतख एनाटीडे प्रजातियों के पक्षियों का आम नाम है जिसमें हँस और कलहंस भी शामिल है। यह ‘नकटा’ प्रजाति के बतख, कलगी बतख के रूप में भी जाने जाते हैं। उनमें से कुछ अभी भी शहरों में जहाँ भी तालाब या जलाशय अस्तित्व में हैं उसीके आस-पास अपना घोंसला बनाते हैं। मैंने बतखों के चूज़ों को देखा तो था, अपनी माँ के पंखों में छुपकर रहते हुए। उन्हें गरमी की जरूरत होती होगी। हमने हमारे कमरे में फ़र्श पर इन चूज़ों के लिए सूखी घास बिछाकर घोंसलेनुमा एक घर बनाया। उन्हें गर्मी मिल सके इसलिए ठीक उपर एक बल्ब जलाया, 34 डिग्री सेल्सियस पर उन्हें रखा। यह नुस्खा काम कर गया, क्योंकि उस रात कोई चूजा नहीं मरा। दूसरी मुश्किल हमारे सामने उनके खाने के जुगाड़ की थी। सरफ़राज़ भाई ने कहा, ‘आप खिचड़ी ट्राय कर सकते हैं, उसमें कुछ विटामिन और खनिज की खुराक जोड़ सकते हैं।’ हमने  हामी भरी। शुरू में तो वे खा नहीं पा रहे थे। मैंने इन बतखों को जल निकायों के क़रीब पानी की सतह से खाना ढूंढते हुए देखा था। हमने एक थाली में थोडा पानी रखा फिर उसमें उनका खाना डाल दिया। अदभुत! वे पानी में अपनी चोंच डुबोकर खिचड़ी खाने लगे। हमने उनके आहार में उच्च प्रोटीनयुक्त खाना मिलाया जो उनके लिए उत्तम आहार साबित हुआ। हमने पहले  दो  सप्ताह तक दिन-रात  बल्ब  जलाए रखा  और अगले तीन-चार सप्ताह  तक सिर्फ़ रात में ही बल्ब को जलाए रखा। बारी-बारी से हमने चार समूहों में इन चूज़ों की परवरिश की। हर समूह में छह से दस तक चूज़े आ रहे थे। क़रीब छह सप्ताह के भीतर उन्हें पुनर्वास केन्द्र में भेज दिया जाता था। कभी-कभी तो एक समूह के रहते दूसरा समूह आ जाता था। यह बड़ा चुनौतीपूर्ण कार्य था जिसका इस तसवीर से अंदाजा लगाया जा सकता है।

 

इनके साथ हर दिन एक मस्ती भरा दिन होता था। पाँचवा बैच जब आया तब एक मज़ेदार घटना हुई। उन्हीं  के साथ दो मोर के चूज़े भी आ गए। एक मीठी-सी उलझन थी। सभी को हम ने साथ साथ एक ही कमरे में और एक ही आवास मे रखा। वे सभी आधे बतख और आधे मोर के रूप में बड़े हो रहे थे। उस वक़्त पहली मंज़िल पर सिर्फ़ हमारा ही कमरा था, बाकी की जगह खुली थी। कमरे का दरवाजा खुला रखकर मैं उन्हें छत की खुली जगह में छोडता। जैसे ही कोई  खतरा महसूस होता वे दौड़कर कमरे में आ जाते। चील, कौए, लंगूर की आवाज़ सुनते ही वे सतर्क हो जाते। कभी-कभी मैं भी उन्हें डराता। कितने सुनहरे दिन थे, हमारे  कमरे की बदबू को छोड़कर !

 

कुछ ही दिनों में मोर के चूज़ों ने छोटी-छोटी उड़ान भरनी शुरू कर दी। क़रीब पाँच सप्ताह के बाद उन्हें पुनर्वास केन्द्र में स्थानांतरित किया गया। वे पहले ही दिन से बाहर घूमने की हिम्मत दिखाने लगे।  अदभुत! बतख के चूज़ों का व्यवहार बिलकुल मोर के चूज़े जैसा था। साथ-साथ रहने के कारण दोनों प्रजातियाँ    एक-दूसरे का अनुसरण कर रहे थी। मोर सर्वभक्षी होते है और बीज, कीड़े, फल, छोटे स्तनपायी और सरीसृप खाते हैं। मोर के चूज़े जब कीड़ो की तलाश में जमीं खोदने लगे तब बतख के चूज़े भी उनका अनुकरण करने लगे लेकिन वे इस कार्य में माहिर नहीं हो पाए। कभी कभी वे इस कार्य को करते हुए कुछ देर के लिए रुक जाते। ऐसा लगता कि सोच रहे हैं- ‘हम यह काम क्यों कर रहे हैं?’- ऐसा ही हुआ जब बतख के चूज़े पुनर्वास केन्द्र के उस तालाब में कूद गए और मोर के चुजें भी उनका अनुकरण करते हुए पानी में कूद गए। हम जानते हैं कि बतख बड़े अच्छे तैराक हैं, पर मोर को कहाँ तैरना आता है? वही हुआ जो मैंने सोचा, वे तुरंत ही पानी में डूबने लगें। मैंने तुरंत आकांक्षा को आवाज दी, ‘जल्दी आओ, लगता है मोर के चूज़ों ने पानी में तैरने का मन बनाया है।’ हमने तुरंत ही पानी में जाकर उन्हें बाहर निकाला। वे कुछ पानी भी पी गए थे। कुछ प्रयासों के बाद उन्होंने यह कार्य छोड़ दिया।

 

अब हमें उन्हें कौओं से बचाना था। कौए अपने शिकार पर हमला करने का एक भी अवसर छोड़ते नहीं है। यह एक विशेष समूह था क्योंकि बतख और मोर साथ-साथ थे। वैसे हमें उनसे कोई समस्या नहीं थी, पर रसप्रद बात यह थी कि मोर के चूज़े बतख के चूज़ों से बहुत तेजी से आकार प्राप्त कर रहे थे। उन्हों ने बतख के चूज़ों की सुरक्षा की  ज़िम्मेदारी भी ले ली। यह एक अदभुत बोन्डिंग था। कोई  भी कौआ बतख के चूज़ों के  करीब  नहीं आ पाता था। कौए को देखते ही वे बाड़ और छत पर चढ़कर पीछा करते। कभी-कभी तो हवा में  कुंग-फू स्टाइल में उछलते। एक बंदा तो इतना प्रभावशाली था कि हम ने उसका नाम ही ‘चौकीदार’ रख दिया। हमारी दूसरी भरोसेमंद सुरक्षा कर्मी डेशुंड ( Dachshund ) प्रजाति की कुतिया जूली थी, जो आकांक्षा को बड़ी प्यारी थी।

 

दिन बीतते चले। पहली खेप में आए चूज़े अब उड़ने योग्य हो गए थे। वे अपने पंख फैलाकर हमें यह जता भी रहे थे। हमने उनकी परवरिश सही तरीके से की थी। उनकी  रिहाई का वक्त आ गया था। हमें पता था, वे बतख  हैं। उन्हें एक तालाब की जरूरत  थी।  वैसे भी हम बाड़े के बाहर खुले क्षेत्र में दो तालाबों का निर्माण कर चुके थे, जो उन्हें बहुत पसंद थे। वे ज्यादातर समय उन तालाबों के अन्दर या उनके आस-पास बिताते। यह तालाब उनके लिए एक सुरक्षित आश्रयस्थल बन गया था।

 

सरफ़राज भाई ने एक दिन घोषणा की, ‘चलो, इन्हें  उड़ान का अभ्यास कराएँ।’ ‘बेशक!’ मैं  तैयार था। हमने देखा कि वे अपने पंखों के फैलाव के लिए पंख फड़फड़ाते रहते  थे। पर यह शायद  पर्याप्त  नहीं था।  वे जमीं से ज्यादा ऊँचाई तक उड़ नहीं  पा रहे थे। उनका हौसला बढ़ाने के लिए क्या किया जाए?  पता नहीं कुछ देर तक मैंने क्या सोचा, जोर से ताली बजाते हुए मैं उनकी तरफ़ बढ़ा। पूरे समूह  ने उड़ान भरी! वे तालाब के दूसरे छोर पर उतरे। यह जल्द ही उनकी दिनचर्या बन गई।  दिन में कई बार वे इसे दोहराते। धीरे धीरे उनकी  उड़ान का क्षेत्र बढ़ा। एक दिन उड़ते हुए वे पुनर्वास केंद्र से बाहर चले गए, छोटा सा चक्कर पूरा  कर  लिया, वापस  आए और सीधे तालाब  के अंदर उतरे!

 

छोटी उड़ानें अब बड़ी होने लगी। अब उन्होंने पुख्त  बतख  का रूप धारण कर लिया था। वे बहुत सुंदर लग रहे  थे! एक सुबह दो बतखों ने एक सीधी रेखा में साथ में उड़ान भरी। धीरे-धीरे उनका आकार छोटे से छोटा बनता गया और  कुछ ही देर में मेरी नज़रों से ओझल हो गए! ‘ ओह!’ मेरे मुँह से यही शब्द निकले! यह ख़ुशी का पल था या ग़म का मैं समझ नहीं पा रहा था। मैं  इंतज़ार  करता रहा उनके लौटने का, पर वे नहीं लौटे। मैंने आकांक्षा से कहा, ‘ दो बतखों ने  नदी की ओर उड़ान भरी  है और अभी तक नहीं लौटे हैं।’ आकांक्षा  ने कहा, ‘नदी की ओर?  एक मिनट रुको! वन्य नकटा बतखें  नदी में आहार की खोज में आते हैं। ये शायद वहीँ पहुँचे हैं।’ यही सोचते हुए हम पुनर्वास केंद्र  के पीछे से बह रही साबरमती नदी के किनारे पहुंचे। हमने देखा  क़रीब तीस नकटा बतखें  वहाँ अपना आहार ढूंढने में व्यस्त थे। हम  हैरान थे, वे सभी एक जैसे ही लग रहे थे! हमारे बतखों को पहचानने का कोई उपाय ही नहीं था। कुछ देर रुककर हम सब उनके अच्छे भविष्य की कामना करते हुए  वापस आए। अब शाम होनेको थी। बाकी बतखों को बाड़े में बंद करने का समय हो गया था। उन दो बतखों के लौटने की आस लिए मेरी निगाहें अब भी क्षितिज पर टिकी थी ! मुझे विश्वास नहीं हो रहा था की अब ये चूज़े नहीं थे पर बतख में परिवर्तित हो चुके थे। हमारे केन्द्र के तालाब में उन्हें तैरते हुए देख मैंने यह तय किया कि उनके पाँव में प्लास्टिक के छल्ले पहनाए जाए ताकि जब वे नदी की ओर उड़ जाए, हम उन्हें पहचान सकें।

 

दूसरी सुबह बाकी सातों बतखों को छल्ले पहना दिए गए और बाड़े से उन्हें मुक्त किया गया। इस बार सात में से चार बतखों ने उडान भरी।  साथ-साथ हम भी चलते हुए नदी की ओर आगे बढ़े। वहाँ पहुँचकर जब हमने उन चारों बतखों को अन्य जंगली बतखों के साथ मिलकर  पानी में तैरते हुए देखा, हमारी ख़ुशी का ठिकाना न रहा! उनकी  परवरिश एवं पुनर्वास में हमें बड़ी सफलता मिली थी। हम आशान्वित थे कि बाकी के बतख भी धीरे-धीरे यहाँ आना शुरू करेंगे और इसी काफ़िले के साथ समय आने पर यहाँ से स्थानांतरित हो जाएँगे।

 

शाम को वे चारों  बाड़े में लौट आए। एक ही सप्ताह के भीतर सातों बतखों ने नदी तक जाना सीख लिया। वे सारा दिन नदी के आसपास अपना समय व्यतीत करते पर शाम होते ही लौटकर आ जाते। एक दिन ऐसा हुआ कि शाम को चार ही बतख लौटे। हमने ख़ुद को तसल्ली दी कि बाकी के तीन उन जंगली बतखों के काफ़िले के साथ चले गए होंगे। हमारा शक सही था, दूसरी शाम सातों लौट आए। पर धीरे-धीरे उनका  लौटकर आना अनियमित हो गया। कभी सभी सब आ जाते, कभी दो या तीन ही लौटकर आते। उन के लौटने में दिन का अंतर भी बढने लगा, कभी दो दिन बाद आते, कभी तीन दिन बाद। आख़िर हमारा उद्देश्य भी तो यही था, उन्हें अपनी दुनिया में आज़ाद करना! करीब एक महीने के बाद ऐसा हुआ कि एक सप्ताह तक एक भी बतख नहीं लौटा। हम नदी की ओर गए हमे वहाँ एक भी बतख नही दीखा। हमने सोचा, वे सभी जंगली बतखों के साथ अन्य स्थान के लिए रवाना हो गए हैं। कभी-कभी कुछेक बतख दिखाई देते। कुछ दिनों के बाद हम नदी के किनारे कुछ आगे तक गए इस उम्मीद से कि उन्होंने अपना आहार ढूँढने का स्थान बदला हो और हमें वे दिख जाए। ओह! कुछ आगे जाकर हमें कुछ पुख्त बतखें दिखी और उनके पाँव  में वही रींग भी जो हमने लगाई थी। हमने सभी समूह के लिए यही उपाय अपनाया। उन्हें प्रकृति की गोद में मुक्त करते समय  उनके पाँव में प्लास्टिक के लाल रंग के छल्ले पहना देते। उन का मौसम खत्म हुआ। वे अन्य  स्थान के लिए रवाना हो गए। वन्यजीवन पुनर्वसन केन्द्र में काम करते हुए पता ही न चला कब एक वर्ष समाप्त हो गया।

 

एक सुबह हमने देखा कि  सुंदर वयस्क चार ‘नकटा’ बतखें हमारे पुनर्वसन केन्द्र स्थित तालाब के किनारे बैठे हैं। जिस में एक मादा और तीन नर थे। मेरी नज़र तुरन्त उनके पाँवों पर गई। वह छल्ले नहीं दिख रहे थे जो पिछले वर्ष हमने उनके पाँवों में लगाये थे। आकांक्षा ने कहा, ‘हो सकता है सालभर में उन्होंने वह छल्ले अपने पाँव में से निकाल दिए हो या टूटकर  निकल गए हो क्योंकि  नर्म प्लास्टिक के ही तो थे।’ अचानक आकांक्षा की आँखों में चमक दिखी। मुस्काते हुए उसने कहा, ‘एक काम करते हैं, उनके सामने हम उनके आहार की एक कटोरी, जिस में हम उन्हें  खाना देते थे, उसी में थोडा खाना रखते हैं, फिर देखते हैं। कोई भी जंगली बतख इस कटोरी से खाना नहीं खाएगा।’ हम दस फुट की  दूरी पर खड़े रहे। अहो आश्चर्य! चारों ने आकर उस कटोरे में से खाना शुरु किया, बिलकुल पहले की तरह! यह पल हमारे जीवन का अनमोल पल था। उन नकटा बतखों से हम एक ऐसे रिश्ते में हम बंध गए थे जो हमारे जीवन में खुशियाँ की बौछार लेकर आए। इस के लिए हम सरफ़राज भाई के ऋणी हैं जो इस पुनर्वसन केन्द्र की मुलाकात लेने वाले हर किसी से बड़े गर्व से यह कहते, ‘आकांक्षा और सोहम ने शानदार  ढंग से इन बत्तखों की परवरिश की है जो शायद मैं भी नहीं कर सकता था।’ सरफ़राज  भाई  से हर बार यह सुनकर हमें भी अपने काम पर गर्व महसूस होता और इस दिशा में कार्य करने का हौसला बढ़ता। वे हमेशा अच्छे काम की सराहना करते हैं और उसका श्रेय भी उसी व्यक्ति को देते हैं। यही कारण है, मेरे दिल में उनका एक विशिष्ट स्थान है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 


- सोहम मुखर्जी
 
रचनाकार परिचय
सोहम मुखर्जी

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