प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितंबर 2017
अंक -33

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जो दिल कहे
अपने ही देश में बेगानी होती हिंदी
 
 
अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन
पै निज भाषा ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।
 
भाषा अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है अर्थात जीवन के जितने भी दैनिक कार्य व्यापार हैं, गतिविधियाँ हैं उन्हें भाषा के माध्यम से संपन्न किया जा सकता है। भाषा ही व्यक्ति को समाज और राष्ट्र को एक सूत्र में जोड़ती है। भाषा सूचना, अनुभव, राष्ट्र-दर्शन एवं जीवन-संस्कृति का सम्प्रेषण करती है। बहुभाषी समाज को राष्ट्र बनाने में भी भाषा की बड़ी भूमिका है। भाषा में उच्च और निम्न भावना ठीक नहीं है। 
स्वातंत्र्य आंदोलन के पुरोधाओं ने महसूस किया था कि भारत जैसे बहुभाषिक देश में एक ऐसी संपर्क भाषा चाहिए जो संपूर्ण भारतीयों को एकसूत्र में बाँध सके। भारत के साथ भाषाई और वैचारिक आदान-प्रदान के लिए हिंदी जरुरी है। पहले यह काम संस्कृत के जिम्मे था और बाद में इसे हिंदी ने निभाया। हिंदी देश की संपर्क भाषा बनी। संसार में सबसे अधिक बोली जाने वाली दूसरी भाषा होने के वावजूद हिंदी संयुक्त राष्ट्रसंघ की भाषा नहीं है।
 
प्रतिवर्ष 14 सितंबर को ‘हिंदी दिवस’ तो मनाया ही जाता है, साथ ही इसे विश्वभाषा के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने के लिए 10 जनवरी को ‘विश्व हिंदी दिवस’ भी मनाया जाता है। 
इसमें दो राय नहीं है कि - “हिंदी भारत की आत्मा ही नहीं, धड़कन भी है। यह भारत के व्यापक भू-भाग में फैली शिष्ट और साहित्यिक भाषा है। इसकी अनेक आंचलिक बोलियाँ हैं। 
भाषा चाहे हिंदी हो या अन्य भारतीय भाषाएँ हो या फिर विदेशी भाषाएँ, अपने समाज अथवा देश की अस्मिता की प्रतीक होती हैं। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने भी कहा है कि “राष्ट्र के एकीकरण के लिए सर्वमान्य भाषा से अधिक बलशाली कोई तत्व नहीं।” अपनी भाषा के प्रति प्रेम और गौरव की भावना न हो तो देश की अस्मिता खतरे में पड़ सकती है।
 
वैश्विक भाषाओँ पर नजर रखने वाली एक संस्थान के आंकड़ों पर नजर डालें तो शायद सभी की आँखें खुल सकती है इस रिपोर्ट के अनुसार हाल ही में अंग्रेजी भाषा में शब्दों का भण्डार 10 लाख की गिनती को पार कर गया है जबकि हिंदी में अभी तक मात्र 1 लाख 20 हजार शब्द ही हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार अंग्रेजी भाषा दस लाख शब्दों के साथ सबसे समृद्ध है जबकि कुल 8 भाषाओँ की इस सूची में हिंदी महज 1 लाख 20 हजार शब्दों के साथ सातवें क्रम पर है। दुनिया के कई गैर-अंग्रेजी भाषी देशों ने अंग्रेजी का सहारा लिए बिना विकास को संभव कर दिखाया हैं। पूरी सूची इस प्रकार है (1) अंग्रेजी– 10,00,000, (2) चीनी- 500,000, (3) जापानी– 232,000, (4) स्पेनिश– 225,000, (5) रुसी– 195,000, (6) जर्मन– 185,000, (7) हिन्दी– 120,000, (8) फ्रेंच– 100,000 शब्द। अंग्रेजी शब्दकोष का इतना बृहद होने का एक कारण यह भी है कि अंग्रेजी में उन सभी भाषाओँ के शब्द शामिल कर लिए जाते हैं जो उनकी आम बोलचाल की भाषा में आ जाते हैं, लेकिन हिंदी में ऐसा नहीं किया जाता है। आज बदलते वैश्विक परिदृश्य में हमें नये शब्दों की खोज करनी ही होगी। 
 
स्वतंत्रता के कई वर्ष गुजर गए, किन्तु आज भी हम मानसिक रूप से स्वतंत्र नहीं हो पाये। अपनी भाषा की उन्नति को नजरंदाज कर हम आज भी अंग्रेजी का झंडा उठाये चले जा रहे हैं। हिंदी का वैश्विक स्वरुप धर्मनिरपेक्ष जनतांत्रिक मूल्यों से संगठित है, जिसमे जन-जन की जुबान, लेखकों के सृजन और बुद्धिजीवियों की भाषायी उदारता का संगम भी है। भारतेंदु की अमरवाणी आज भी कितनी प्रासंगिक है–
 
निज भाषा उन्नति अहे, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय के सूल

हिंदी को सर्वाधिक शिकायत तो देशवासियों से है जो हिंदी भाषी परिवार में जन्म लेते और पलते हैं, हिंदी हमारी रगों में होती है परन्तु दीवानगी अंग्रेजी के प्रति इतनी अधिक है कि भले ही अंग्रेजी के माध्यम से आज समझने में कई गुना अधिक समय लगे परन्तु अपनाते अंग्रेजी ही हैं। न जाने हम यह क्यों भूल जाते हैं कि किसी भी राष्ट्र का सम्पूर्ण विकास अपनी भाषा में ही सम्भव है। आधुनिक युग में भी सभी कार्य हिंदी में संभव है, परन्तु देशवासियों का अंग्रेजी के प्रति मोह अपरम्पार है।
 
भाषाशास्त्रियों का यह तर्क सही है कि कुछ अंग्रेजी शब्दों को आत्मसात करने से हिंदी समृद्ध होगी किन्तु शब्द आत्मसात करने की बजाय हम तो देशी शब्दों को त्याग कर उनकी जगह अंग्रेजी शब्द को प्रतिस्थापित कर रहे हैं। अन्य भाषाओँ से नए शब्द सीखना उचित है इससे भाषा समृद्ध होती है मगर यह कौन सी भाषा “हिंग्लिश” है जो संस्कृतियों के बजाय भाषायी भोंडेपन का प्रदर्शन करती है। अंग्रेजी भाषा पर अधिकार अच्छी बात है किन्तु अधिकार की जगह हमारी इस नक़ल को देखते हुए कहीं दुनिया हमें नकलची बन्दर का ख़िताब न दे बैठे।  
 
हिंदी भाषा की मिठास के बारे में अमीर खुसरो की एक पंक्ति हमें जेहन में रखनी चाहिए "अगर आप सच पूछें तो मैं हिन्दुस्तान का तोता हूँ; अगर आप मिठास के साथ बात करना चाहें तो ‘हिंदवी’ में मुझसे बात कीजिये"।
हिंदी और भारतीय भाषाओं के विद्वानों, लेखकों, कम्पयूटर विशेषज्ञों, तकनीकी विशेषज्ञों को संयुक्त रूप से अपनी भाषाओं के हित में काम करना होगा। हिंदी भाषा को रोजगार से जोड़ना होगा। चीन और जापान जैसे मुल्कों ने अंग्रेजी भाषा से तकनीकी एवं प्रोद्योगिक शब्दों को लेकर अपनी मातृभाषा में अपने सुविधानुसार शब्दों को गढ़ा है। इसके लिए हमें विदेशी शब्दों के साथ साथ भारतीय देशज शब्द अर्थात विभिन्न भारतीय भाषाओँ के सुन्दर मीठे शब्द और वर्ण भी अपना सकते हैं। 
 
हिंदी का हित भारतीय भाषाओं से अलग नहीं है। वैश्वीकरण और सूचनाक्रांति के दौर में हिंदी के साथ अन्य भारतीय भाषाएँ भी पिछड़ रही हैं। आज हिंदी भाषा के सामने संकट यह है कि लोगों में लेखन की प्रवृति कम हो रही है। हिंदी आज अभिव्यक्ति की भाषा से हट कर विडम्बना की भाषा बनकर रह गयी है। अंग्रेजी का वर्चस्व सब को दबा रहा है इसलिए सब भारतीय भाषाओं के हितैषियों को एकजुट होकर अंग्रेजी के वर्चस्व को चुनौती देनी चाहिए और सब को मिलकर हिंदी भाषा कि दुर्दशा पर चिंतन करना ही होगा कि अपने ही देश में बेगानी होती हिंदी को वह सम्मान कैसे दिलाएं जिसकी वह हकदार है।
 
कौन कहता हमारी वाणी तुच्छ क्षुद्र है?
तुलना में उसकी हिमालय या समुद्र है।
कहीं पास ही खड़े हो 
बोल रहे हैं व्यास!
जय हिंदी! जय नागरी!
भारत न हो उदास।

- नीरज कृष्ण