प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितंबर 2017
अंक -31

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गंगा

ग़ज़ल-

अब वो बच्चे को भी बच्चा नहीं रहने देती
ये हवा अच्छों को अच्छा नहीं रहने देती

तुम हो मसरूफ़ तो मुझको भी कहाँ फुर्सत है
शाम-ए-तन्हा, मुझे तन्हा नहीं रहने देती

छाँव से यूँ तो नहीं मेरी अदावत लेकिन
साथ मेरे मेरा साया नहीं रहने देती

मेरी क़िस्मत ने कभी चाँद-सितारे न दिये
हाँ, मगर कोशिशें ज़ाया नहीं रहने देती

ये ग़रीबी भी अजब चीज़ है जो अपनों का
हों कड़े वक़्त तो कांधा नहीं रहने देती

हम तो खामोशियाँ ओढ़े थे मगर आपकी बात
गुफ़्तगू का भी सलीका नहीं रहने देती

तेरे परवाज़ की चाहत भी न रह जाय धरी
अब फ़ज़ा ज़िन्दा परिन्दा नहीं रहने देती

गर तू ज़िन्दा है मेरे यार, यही पल जी ले
मौत आती है तो ज़िन्दा नहीं रहने देती


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ग़ज़ल-

ये रिश्ते भी न बदतर होके लौटें
तेरी ईंटें, न पत्थर हो के लौटें

ये चट्टानें, न ऐसा हो कि इक दिन
मैं टकराऊँ तो कंकर हो के लौटें

इसी उम्मीद में कूदा भँवर में
मेरे ये डर शनावर हो के लौंटें

बनाएँ खिड़कियाँ दीवार में जब
दुआ करना कि वो दर हो के लौटें

दिवारो-दर, ज़रा-सी छत औ खिड़की
मैं छोड़ आया कि वो घर हो के लौटें

कुछ इक सूखी निगाहें ऐ ख़ुदा, मैं
रखूँ उम्मीद क्या, तर हो के लौटें?

नहीं कुछ भी यक़ीं पर भेजता हूँ
मेरे ये मसअले सर हो के लौटें


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ग़ज़ल-

ग़म और ख़ुशी में चाहिये जो फ़ासला, न था
पर वक़्त को कहें बुरा, ऐसा बुरा न था

जिस आइने पे कर के यक़ीं सामने गये
कुछ पत्थरों ने ये कहा वो आइना न था

तुम भी न आ सकोगे बुलाने से एक रोज़
मुझको गुमां ये, ख़्वाब में भी, हमनवा न था

काई-सी फट के भीड़ रफ़ीकों की छँट गई
शाहिद मेरा बचाव में मेरे सिवा न था

फिर चश्मदीद मिल गये उस वाक़िये के आज
जो वाक़िया कहीं भी ज़मीं पर हुआ न था

तुम फ़र्क अगर न कर सके ये बात तो नहीं?
चुल्लू भर आब जब लिया सागर घटा न था

ऐसा न था कि बात ग़लत की थी उसने कल
पर बज़्म गौर से सुने, वो मर्तबा न था

शेर-ओ-सुख़न है ज़िन्दगी, तालिब हूँ आज भी
राह-ए-सुख़न में आना मेरा, हादसा न था


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ग़ज़ल-

ये कैसी महफिल में आ गया हूँ, हरेक सहमा, डरा हुआ है
सभी की आँखों में पट्टियाँ हैं, ज़बां पे ताला जड़ा हुआ है

कहीं पे चीखें सुनाई देतीं, कहीं पे जलसा सजा हुआ है
कहीं पे रौशन है रात दिन-सा, कहीं अँधेरा अड़ा हुआ है

ये आँधियाँ भी बड़ी ग़ज़ब थीं, तमाम बस्ती उजड़ गई पर
दरे-ख़ुदा में झुका जो तिनका, वो देखो अब भी बचा हुआ है

यहाँ की मिट्टी की है जो खुश्बू, मुझे लगे है मेरे वतन की
लगे है ऐसा कि इस ज़मी से, भी मेरा माजी जुड़ा हुआ है

जहाँ पे मुद्दत की प्यास चुप है, वहाँ बग़ावत सुलग न जाये
के अब हथेली बने न मुठ्ठी, डर एक उनको बना हुआ है

अजब अँधेरे में इस फ़ज़ा के, ये रोशनी-सी कहाँ से आई
ये रूह किसकी हुई है रोशन, चराग़ किसका जला हुआ है


- गिरिराज भंडारी
 
रचनाकार परिचय
गिरिराज भंडारी

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ग़ज़ल-गाँव (1)