प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितंबर 2017
अंक -31

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

व्यंग्य

अखिल भारतीय आश्रम भक्त टैक्स- अपराजिता अनामिका श्रीवास्तव


दिन भर की अनावश्यक बहसों और निरर्थक फैसलों से उकताई न्याय की देवी को ज़रा-सी झपकी लगी थी कि अचानक खट की आवाज़ पर उनकी आँखें खुल गयीं। ब्रह्म मुहूर्त था सो अभी उजास फैला न था। इसलिए मध्यम रौशनी के बल्बों को तकलीफ दी गयी थी क्योंकि शायद अधिक रौशनी से आने वालों के किरदार एक-दूसरे को स्पष्ट हो जाते।
हालांकि देवी की आँखों पर पट्टी बँधी थी मगर जूतों और बूटों की देशी-विदेशी चाल तथा फटी चप्पलों के घिसटने के अंदाज़ से वो समझ जातीं कि फरियादी किस वर्ग विशेष का है। और रही समय की बात तो अचानक ही अच्छे दिन आ गये थे कि कोई भी फरियादी जब चाहे न्याय कि घंटा बजा दे और न्यायपालिका हाज़िर....हाँ, न्याय की बात पर गौरतलब  ये था कि सभी लगभग प्रायोजित हुआ करते थे।


खैर! मद्यम रौशनी में अपने काजली वजूद को यथासंभव ढंकते पुलिस, प्रशासन, सरकार और न्यायसदर बैठे मंत्रणा में लग चुके थे। न्यायसदर इन तीनों अमलों को गौर से सुनते, सहमति जताते, सर हिला कर अपनी सहमती देते दिखे पर उनकी पेशानी पर छलक उट्ठी बूंदें जता रही थीं कि उनकी बातों और सलाहों को अमली जामा पहनाना आसान नहीं।
सुबह होते-होते प्रजातंत्र का पांचवा पायदान सक्रिय हो चुका था। अलाना-फलाना-ढ़िमका समाचार चैनलों के योद्धा गला फाड़ आवाज़ मे उद्धघोषणा करते दिखे, वहीं समाचार-पत्र वाले खिसयानी बिल्ली बने अपने बाल नोंच यहे थे क्योंकि ब्रह्म मुहूर्त के इस फैसले के पहले ही उनके अखबार बिकने निकल चुके थे। अब बासी खबर छाप कर क्या खा़क टीआरपी मिलती। हाँ, सुबह-शाम को दो पन्नों मे भड़ास निकालने वाले अखबारों के संवाददाता ज़रूर खुश थे कि आज तो बस उनकी ही बारी।


आम जनता भी सभी काम छोड़कर अपनी आँखों और अंगुलियों को दौड़ाते दो खेमों मे बँट वाद-विवाद में लग चुकी थी। दावानल की तरह खबर फैल गयी कि आज अल-सुबह न्यायपालिका ने तमाम बाबाओं पर अभाआभ टैक्स लागू कर दिया है, जिसके अनुसार-

1- बाबाओं को न्यायालय में अपना वीजा, पासपोर्ट और किस विधा मे प्रकांड हैं, उसका सर्टिफिकेट जमा करना होगा।
2- सभी बाबाओं के चेले-चपाटियों की संख्या अब निर्धारित होगी।
3- चेलियों की उम्र 60 साल से कम नहीं होनी चाहिए और विदेशी चेलियाँ निषेध हैं क्योंकि इससे देश की चेलियों के साथ पक्षपात का खतरा है।
4- चेलों की उम्र भी 45 पार ही होनी चाहिए ताकि गृहस्थ के तमाम कस-बल ढ़ीले हो चुके हों और वो डंडा उठाने तो क्या देखते ही भागने का अभ्यस्त हो।
5- बाबाओं के आश्रम सिर्फ फूस और बाँस से बनें इकोफ्रेंडली हों ताकि आगजनी से सिर्फ देश की सम्पत्ति ही नहीं खुद वो भी ख़ाक हो जाएं।
6- देश में आवागमन के लिए सिर्फ बैलगाड़ी या घोड़ागाड़ी ही मान्य होगी। हाँ, विदेश यात्रा भले चार्टर्ड से कर सकते हैं।
7- एक हजार से अधिक चेला-चपाटी पर प्रत्येक चेला दस हजार का मुचलका कोर्ट मे जमा करना होगा और अवमानना होने पर जेल सात साल बा-मश्क्कत
8- बाबाओं को हर महीने अपने यहाँ आने वाले/वालियों का मेडिकल जमा करना होगा कि वो आये तो किस हाल में और गये तो कैसे।

यदि इन तमाम नियमों मे उल्लंघन पाया गया तो अभाआभ टैक्स मतलब अखिल भारतीय आश्रम भक्त टैक्स सख्ती से न सिर्फ लागू होगा बल्कि बाबागिरी भी छीन ली जाएगी।


फिलहाल तो पुलिस,  प्रशासन,  सरकार ने न्यायपालिका से गठजोड़ कर इन बाबाओं द्वारा अपने नाक के नीचे बार-बार बोई जा रही धनिया और पब्लिक के जूतम-पैजार से मुक्ति का जश्न मनाती दिख रही है।

सिद्ध बाबाओं के यहाँ कोहराम मचा है। अपने-अपने कालेधन (चेला/ चेली) को नये और झोला-छाप बाबाओं के नाम पर ट्रांसफर और उनके नये आयु सर्टिफिकेट बनवाये जा रहे हैं।
कंक्रीट के महलों और हेलिपैड खुदवाने की पहल शुरू हो चुकी है। सभी अपने-अपने कार्यों के दस्तावेज़ बनवाने मे लगे हैं। अजीब-सी अफरा-तफरी मची है। अवाम, नारीमोर्चा, कथित बुद्धिजीवी, पाँचों तंत्र सभी इसे जीत समझकर मुस्कुरा रहे, फटाखे फोड़ रहे और बधाइयाँ बाँट रहें हैं।


पर आँखों पर पट्टी बाँधे महज़ कानों से आभासती न्याय की देवी जानती है कि ये भी एक प्रायोजित न्याय है, जो राजनीतिक दल और सत्तारूढ़ दल इन बाबाओं की कमाई में सेंध लगाने और अपना फंड बढ़ाने के लिए एक दूरदर्शी नीति के तहत लिया गया निर्णय है, जिसे यूँ भी समझा जा सकता है कि अब तक इन बाबाओं को चंदा देती और हिफाज़त करती सरकारें अब इनकी ही कमाई पर ख़ुद के चेले-चपाटी पालेंगी और बराबर का हिस्सा मिलेगा पुलिस और प्रशासन को।

हाँ एक खड़ी बात की ...अवाम तो कल भी मूर्ख थी, अवाम कल भी मूर्ख ही रहेगी।


- अपराजिता अनामिका श्रीवास्तव
 
रचनाकार परिचय
अपराजिता अनामिका श्रीवास्तव

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