प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितंबर 2017
अंक -33

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

बाल-वाटिका

बाल कहानी- बुद्धू चिड़िया

बाजरे के खेत के किनारे ही एक पेड़ पर चिड़िया ने घोंसला बनाया। उसने उसमें दो अंडे दिये और जब तक बाजरे में दाने आयें, अंडों से बच्चे निकल
कर चूँ-चूँ करने लगे।
अब चिड़िया दूर जाकर खाना लाने में कतराने लगी कि पीछे न जाने कौन उसके बच्चों ले जाए। वह बस आस-पास से ही कुछ कीड़ों आदि से बच्चों
का पेट भरने लगी पर ख़ुद भूखी रह जाती। फिर उसने सोचा चलो दो-चार दिन में बाजरे के दाने ज़रा कड़े हो जायेंगे, तो वह बाजरे के खेत से ख़ुद भी
पेट भर खायेगी और बच्चों को भी खिलाएगी।
लेकिन अगले रोज ही किसान ने बाजरे के खेत में दो बाँस आड़े तिरछे बाँध कर एक बिजूका ( पुतला) खड़ा कर दिया। उसने उसको दो-तीन रंग के
कपड़े पहना दिए। उसके सिर पर एक हाँड़ी रखकर, हाँड़ी पर कोयले से आँख, कान, नाक, मुँह आदि भी बना दिए। ऊपर से एक टोपी भी लगा दी। बिजूका तो ऐसा लगता था जैसे खेत में सचमुच कोई आदमी खड़ा हो।

चिड़िया ने देखा कि खेत में न जाने कैसा आदमी आकर खड़ा हो गया है, जो वहाँ से हिलने का नाम ही नहीं लेता। जब तक वह आदमी हटेगा नहीं, वह
कैसे बाजरा खा सकेगी! बाजरे के दाने तो कड़े हो गए थे।
चिड़िया का मन बाजरा खाने का होता पर बिजूका के डर से वह बाजरे तक जा नहीं पा रही थी। सवेरे उठकर वह गाना गाने लगी।


छोटा मोटा बाजरा, बाजरा मैं खाऊँ
पर उस आदमी को कैसे भगाऊँ
कितने अच्छे बाजरे के दाने
पर वह मुझको देता न खाने


गा-गाकर वह चुप होकर बैठ जाती पर हिम्मत नहीं जुटा पाती कि बाजरे के खेत से बाजरा ले आए। उसी पेड पर एक बंदर भी रहता था, वह चिडिया का रोज़ ऐसा गाना सुनता रहता। फिर चिड़िया दिन में कई बार वह गाना गाने लगी। उसका ऐसा गाना सुन-सुनकर बंदर परेशान-सा हो गया। उसने चिड़िया को समझाया कि वह सचमुच का आदमी नहीं है, वह तो एक बे-जान पुतला है, जो हिल-डुल भी नहीं सकता, तू जाकर आराम से बाजरा खा और अपने बच्चों को भी खिला। पर चिडिया के मन में समाया डर हटता ही नहीं था।
आख़िर बंदर के इस तरह से हिम्मत दिलाने पर, जैसे ही वह बाजरे के खेत में गई कि हवा के झोंके से बिजूका के कपड़े हिलने लगे। वह डर कर वापस घोंसले में आ गई, और गाने लगी-


छोटा मोटा बाजरा, बाजरा मैं खाऊँ
पर उस आदमी को कैसे भगाऊँ
कितने अच्छे बाजरे के दाने
पर वह कपड़े लगा हिलाने


बंदर ने फिर उसे समझाया, "बुद्धू चिड़िया, वह तो केवल पुतला है, जिसे आदमी के कपड़े पहना दिये गये हैं। बस ज़रा हवा से कपड़े हिले और तू डर कर वापस आ गई। वह तो खुद हिल भी नहीं सकता, तुझे क्या मारेगा! तू बे-फ़िक्र होकर जा और बाजरा खा।"
चिड़िया ने फिर हिम्मत जुटाई और खेत के ऊपर चक्कर काट कर नीचे उतरने को ही थी कि तेज हवा के झोंके से बिजूका की टोपी नीचे गिर गई। वह फिर डर
कर वापस घोंसले पर आ गई और फिर गाना गाने लगी,


छोटा मोटा बाजरा, बाजरा मैं खाऊँ
पर उस आदमी को कैसे भगाऊँ
कितने अच्छे बाजरे के दाने
पर वह टोपी लगा गिराने


तब तक शाम हो गई थी। बंदर सोने चल दिया। चिड़िया भी बच्चों के साथ सो गई। पर सवेरे जब उसकी नज़र फिर बाजरे के खेत में खड़े बिजूका पर गई तो वह फिर गाने लगी-

छोटा मोटा बाजरा, बाजरा मैं खाऊँ
पर उस आदमी को कैसे भगाऊँ
कितने अच्छे बाजरे के दाने
पर वह मुझको देता न खाने


बंदर को चिड़िया के भोलेपन पर हँसी भी आ रही थी और उसके बार-बार वैसा गाने पर खीज भी हो रही थी। उसने चिड़िया से कहा, "चल मैं भी तेरे साथ चलता हूँ, देखना कैसे मैं बिजूका के सिर पर चढ़कर उसके सिर पर ढपली बजाऊँगा। अगर वह ज़िन्दा आदमी हुआ तो भला वह मुझे ऐसा क्यों करने देगा!"
"ठीक है।" चिड़िया बोली, "पर मैं तुम्हारे पीछे-पीछे आऊँगी और जब तुम उसकी खोपड़ी पर ढपली बजाओगे तभी खेत में घुसूँगी।"
बंदर के पीछे-पीछे चिड़िया भी उड़ चली। बंदर बिजूका के पास पहुँच गया, चिड़िया दूर से देखती रही। बंदर ने यह देखने के लिए कि बाँस ठीक से
गड़ा है कि नहीं, जैसे ही बाँस को हिलाया, चिड़िया बिजूका को हिलता हुआ देखकर डर के कारण  फिर अपने घोंसले में आ गई।
बंदर ने तब तक देख लिया था कि बाँस अच्छी तरह ज़मीन में गाड़ा गया था। वह उस पर चढ़ गया और उसके सिर पर बैठ गया। चिड़िया आश्चर्य से अपने
घोंसले से उसे देखती रही। फिर बंदर उस हाँड़ी पर ज़ोर-ज़ोर से ढपली बजाने लगा। यह देखकर चिड़िया को बहुत दिनों बाद हँसी आई। वह ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी।

अब उसमें हिम्मत आ गई थी। वह झटपट बिजूका से दूर एक बाजरे की बाली से कुछ दाने खाकर तथा कुछ अपने बच्चों के लिए ले आई। अब वह गाने
लगी-


छोटा मोटा बाजरा, बाजरा मैं खाऊँ
बंदर भैया का शुक्र मनाऊँ
कितने अच्छे बाजरे के दाने
अब तो मुझको मजे से खाने


यह सुनकर बंदर मुस्कुरा दिया। फिर तो वह रोज़ ही उस बाली से कुछ दाने खाकर कुछ बच्चों के लिए ले जाने लगी और रोज़ बंदर भैया वाला गाना गाने लगी। बंदर को भी यह गाना अच्छा लगा और वह भी पेड़ के तने पर ढपली बजाकर उसका साथ देने लगा।

बाजरा पक गया था। जब किसान बाजरा काटने आया तब तक चिडिया ने बाजरे की एक बाली पूरी ख़त्म कर दी थी तथा दूसरी भी आधी खा ली थी। किसान
को बाजरा काटते देखकर वह फिर गाने लगी-


छोटा मोटा बाजरा, बाजरा मैं खाऊँ
इस किसान का शुक्र मनाऊँ
कितने अच्छे बाजरे के दाने
पर पुतले से लगा डराने


किसान ने चिड़िया का वह गाना सुना तो वह भी ख़ुश हो गया, उसने बाजरे के खेत से चार-पाँच बालियाँ काटकर उसी पेड़ की कोटर में रख दीं, जिस पर
चिड़िया ने घोंसला बनाया था कि बाद में चिड़िया और उसके बच्चे खाते रहें। फिर उसने बिजूका भी तोड़ दिया। इसके बाद उसने खेत में बिजूका नहीं लगाने
का निश्चय किया। उसने सोचा कि प्रकृति माँ तो खेत में इतना अनाज पैदा करती है वह केवल उसके लिए ही नही है, उस पर थोड़ा बहुत और जीवों का भी
हक बनता है।


- लक्ष्मी खन्ना सुमन
 
रचनाकार परिचय
लक्ष्मी खन्ना सुमन

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