प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितंबर 2017
अंक -33

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

छंद-संसार

प्रेम-पचीसी (दोहे)

मन तो साजन ले गए, तन है मेरे पास।
माटी का ये दीवला, कैसे करे उजास।।1।।


खोकर तेरी याद में, पाई सहज समाधि।
योग कहूँ मैं प्रेम को, लोग कहे हैं व्याधि।।2।।


रग-रग में दौड़े अगन, काँप रही है देह।
सुध-बुध मन की पी गई, पीकर तेरा नेह।।3।।


देखूँ तुझको हर जगह, फिर भी तेरी आस।
डूब गई दरियाव में, बुझी न लेकिन प्यास।।4।।


मन के सुन्दर चौक में, साजन तेरा प्यार।
रंग-बिरंगा माँडणा, निरख रहा संसार।।5।।


मन मेरा दीपक भया, प्यार तिहारा जोत।
मैं तो अंधी हो गई, जग उजियारा होत।।6।।


साजन तुम आकाश हो, मैं धरती की धूल।
अंग लगाऊँ किस तरह, उठत जिया में सूल।।7।।


साजन नैणां आँज लूँ, फिर देखूँ मैं काँच।
मर जाऊँ मैं लाज से, लाज नज़र में बाँच।।8।।


साजन-साजन रट लगी, आती-जाती साँस।
बनी सुरीली बाँसुरी, सूखा तन का बाँस।।9।।


साजन तुमको खोय कर, ख़ाक बचाऊँ लाज।
लाज गँवाकर पाय लूँ, मैं अपना सरताज।।10।।


साजन तुम हो चंद्रमा, मैं कंकर की जात।
छाया छूकर आपकी, चमका मेरा गात।।11।।


रात गड़े है फाँस सी, दिन चुभता है शूल।
हर पल मुझको काटता, बेली कटी समूल।।12।।


साजन तुझमें डूबकर, घुलती हूँ दिन-रात।
आस यही है एक हो, तेरी मेरी जात।।13।।


तेरी संगत पाइके, रंगत अपनी खोइ।
जाने तेरे नाम से, मुझको अब हर कोइ।।14।।


साजन शीतल छाँव तुम, मैं हूँ थक कर चूर।
गोद तुम्हारी जो मिले, आँख लगे भरपूर।।15।।


प्रेम छुपाता कुछ नहीं, ज़ाहिर करता हाल।
गाते मेरा रतजगा, मेरे नैना लाल।।16।।


साजन मेरे जीव की, तुम क्या जानो पीर।
हार गए हैं वैद सब, रोग लगा गंभीर।।17।।


अपने मुख से क्या कहूँ, अपने जी का हाल।
लोग मुझे पागल कहे, कर लो ख़ुद पड़ताल।।18।।


साजन गहरी झील तुम, चकवा मेरे नैन।
पीऊँ कैसे चौंच भर, प्यासी हूँ बेचैन।।19।।


जीवन अब चरखा भया, तेरा प्रेम कपास।
कातूँ डोरा नाम का, ओढूँ तेरी आस।।20।।


जी भर तुझको देख लूँ, बैठ घड़ी भर पास।
पल भर मैं कैसे बुझे, जन्म-जन्म की प्यास।।21।।


मैं साजन को पी गई, सुध-बुध खोई आज।
निगलूँ कैसे मन जले, उगलें जावे लाज।।22।।


आज पराए हो गए, साजन मन के मीत।
फूल हुए गुलदान के, गंध भ्रमर की प्रीत।।23।।


साजन तुम तो बाग़ हो, मैं तितली नादान।
उड़ती-फिरती ही फिरूँ, तुझको अपना मान।।24।।


मैंने पारा पी लिया, बढ़ा बदन का ताप।
गीली पट्टी-सा लगे, साजन-साजन जाप।।25।।


- ख़ुर्शीद खैराड़ी