प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2017
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
कहानी - चुनाव
 
चुनाव लड़ने के लिए मुख्य तौर पर दो चीज़ों की जरूरी होती है। एक लोकप्रिय चेहरा और दूसरा भाषण देनी की कला। लेकिन जीतने के लिए केवल एक की, और वह है- धन। 
खम्मन नगर की आबादी कमोबेश एक लाख थी। वैसे तो यह मुख्य रूप से जैन बहुल नगर था लेकिन यहां मुस्लिमों और हिंदूओं की भी एक बड़ी आबादी बसती थी। इसलिए जब यहां चुनाव होते तो वह बहुत हंगामेदार और मनोरंजक होते। हर बार इनमें बहुत सी घटनाएं, इत्तेफाकात औह हादसे होते। इन्ही घटनाओं की वजह से हर पाँच साल बाद होने वाले ये चुनाव पिछले चुनाव से ज्यादा दिलचस्प और रोचक होते। इन चुनावों में कई तरह के सामाजिक, धार्मिक और जातिगत समीकरण बनते और बिगडते। अनेक प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरते। जिनमें से अधिकतर वोट कटवा होते है। वैसे तो हर प्रत्याशी अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए हर धर्म के लोगों से अपने गठजोड़ करता। लेकिन जीतता वही जिसका गठजोड़ सबसे मजबूत और प्रभावशाली होता। हालांकि प्रचार के अंतिम दिनों में जब किसी प्रत्याशी की जीत निश्चित लगने लगती तो बाकी के प्रत्याशी खुद जीतने के बजाय उसे हराने में मसरूफ़ हो जाते। इसके लिए वह साम, दाम, दंड, भेद हर तरह की रणनीति का प्रयोग करते। ऐसा ही इस बार भी हुआ।
 
विधानसभा चुनाव से पहले जब राज्य में नगर-पालिका चुनाव की घोषणा हुई तो, देखते ही देखते चंद ही दिनों में पूरा नगर चुनावमय हो गया। हर बार की तरह इस बार भी कई प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरे। लेकिन मुख्य मुकाबला तीन प्रत्याशियों में ही था। पहला प्रत्याशी जैन समुदाय का धीरेंद्र जैन था, जो नगर में बहुसंख्यक थें। दूसरा प्रत्याशी मुस्लिम समुदाय का अलीम चौधरी था, जिनकी आबादी नगर में दूसरे नंबर पर थी। तीसरा प्रत्याशी हिंदू का सतपाल मलिक था। वैसे तो उनकी आबादी नगर में तीसरे स्थान थी, पर वह जैनियों और कुछ मुस्लिम तबकों में भी असर रखता था। इसीलिए पिछली दो योजनाओं में उसकी धर्मपत्नी सविता देवी नगर-पालिका अध्यक्ष रह चुकी थी और अब तीसरी बार वह खुद चुनाव मैदान में था।
    
सतपाल मलिक को उम्मीद थी कि उसका हिंदू, जैन और मुस्लिम गठजोड़ इस बार भी प्रभावी रहेगा। और उनकी जीत में मुख्य भूमिका निभाएगा। रामनवमी को अपने घर पर, जो शहर की पूर्वी दिशा में पंचवटी मंदिर के ठीक पीछे था राम-कथा करवा कर उसने इस बात के संकेत भी दे दिए थे। इसके बाद वह निर्वाण दिवस पर अपनी पत्नि की जगह मुख्त-अतिथि था और उसने दिगम्बर महाराज का आर्शीवाद भी लिया था। फिर नवंबर महीने के आखिर में शहर-ए-काजी की बेटी की शादी में शरीक होकर और वहां सबसे ज्यादा कन्या दान कर, उसने अपने इस गठजोड़ की आखिरी ईट को भी मजबूत से अपने साथ जोड़ लिया था।
 
उसके इन कार्यक्रमों और शिकरतों का प्रभाव भी जल्द ही नज़र आ गया, जब पर्चा दाखिल करने के दिन उसके साथ पाँच-हजार लोगों की भीड़ तहसील तक गई थी। सभी प्रत्याशियों में उसने दूसरे नंबर पर अपना नामांकन दाखिल किया था। इससे पहले जैन प्रत्याशी एक हजार लोगों की भीड़ के साथ अपना पर्चा दाखिल कर चुका था। अपने साथ धरेंद्र से पाँच-गुना ज्यादा भीड़ को देखकर सतपाल मलिक गदगद हो गया था। इस भीड़ में उसे अपनी जीत दिखाई दी थी। इसलिए पर्चा दाखिल करने के बाद से ही वह अपने प्रचार नीति बनाने में जुट गया था। कई समर्पित कार्यकर्ताओं और कुछ विशेषज्ञों को लेकर उसने एक आक्रमक प्रचार शैली बनाई थी और उसके क्रियान्वन की रूपरेखा भी तैयार कर ली थी। अब उसे बस इंतज़ार था तो अलीम के पर्चा दाखिल करने का। उसे यकीन था कि उसके साथ भी जैन जितने ही लोग होंगे। लेकिन बिना देखे तसल्ली नहीं हो रही थी। कुछ चुनिंदा लोगों के साथ अपने प्रचार रूम में बैठा वह इस मसले पर गुफ्तगू कर रहा था।
 
“अब बस देखना यह है कि अलीम के साथ कितने लोग है?”
“कितने क्या? होंगे वही हजार दो हजार। इससे ज्यादा तो नहीं। अब वह आपका मुकाबला करने से तो रहा?”, उनमे से एक ने कहा।
“हाँ, ये तो मुझे भी पता। लेकिन फिर भी एक बार देख लेंगे तो अंदाज़ा तो हो ही जाएगा”, मलिक ने कहा।
“आप खामखा टेंशन ले रहे हैं। उसके साथ भी जैनी से ज्यादा लोग नहीं होंगे... आप फिक्र न करे, जीत आपकी ही होगी।”
“हाँ..., मुस्कुराते हुए, वो तो मैं जानता हूँ। लेकिन ये सब तुम लोगों की मेहनत से ही होगा।”
“मेहनत की आप परवाह न करे। हमारे लड़के दिन-रात शहर की गलियों की खाक छान रहे हैं।”
“मैंने सुना है कि वहीद उसका समर्थन कर रहा है?”, उनमें से दूसरे ने कहा। जो मलिक का सबसे खास था और इस वक्त ठीक उसके सामने सोफे पर बैठा हुआ था, “ओर उसने बाकी तीनों मुस्लिम मोहल्ले के प्रभावशाली लोगों को भी अपने साथ मिला लिया है...।”
 
“वहीद?”, आश्चर्य और कुछ चिंता के मिले-जुले भावों के साथ माथे पर बल डालते हुए मलिक ने पूछा, “वहीद उसे समर्थन कर रहा... लेकिन क्यों? ओर बाकी लोग कौन है?”
“वही, पठानकोट से हाजी इसाक, हाजी कल्लू और अय्यूब कपड़े वाला, सोरगिरान से नफीस अहमद, पुन्नू खान, जमील मलिक और अबरार और कसईय्यों वाले मोहल्ले में मुन्नू सब्जी वाला, हाजी काले और खलील मिस्त्री...।”
“अच्छा...”, मलिक ने गहरी सोचते में डूबते हुए कहा, “तो अलीम के पीछे वहीद है... उसने ही बाकी सबको इक्ट्ठा किया होगा। चलो कल देखते है... जब वह पर्चा भरने जाता है... उसकी ताकत को।”
“ठीक है... लेकिन वहीद के बारे में आप लोग जानते है”, दूसरे वाले ने जवाब देते हुए कहा, “लोग उसे कैसे मसीहा की तरह पूजते हैं।” 
“कह तो सही रहे तो तुम”, मलिक ने कुछ सोचते हुए कहा, “लोग उसे मानते है... लेकिन यह सारी मान्यता केवल मुफ्त में सेवा कराने के लिए ही है। वोट दिलवाने के लिए नहीं। वह खुद को भीकमंगो का मसीहा समझता है। लेकिन वे ज़ाहिल लोग उसके कहे पर कभी भी वोट नहीं करेंगे। वोट वे वहीं देंगे जिधर बहुमत का रूझान होगा। इसलिए उसके समर्थन करने या न करने से हमें कोई फर्क नहीं पड़ेगा।”
 
इसके बाद उन्होंने कुछ देर और इसी तरह की बातें की और फिर मीटिंग खत्म कर दी गई।
वहीद सरकारी स्कूल का एक रिटायर अध्यापक था। सेवानिवृत्ति के बाद उसने खुद को समाज सेवा में लगा दिया था। इससे कुछ ही सालों में उसकी एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में पहचान बन गई थी। उसने समाज और लोगों के भलाई के लिए बहुत से काम किए। उसने नगर में सफाई अभियान और शिक्षा अभियान जैसे कार्यक्रम चलाएं। कस्बे की गरीब बस्तियों में समय-समय पर स्वास्थ्य और रक्त दान शिविरों लगवाएं। वहां राशन डीलर की दुकान खुलवाई। अगर कोई डीलर राशन देने में आना-कानी करता या समय पर राशन न देता तो वही सबसे पहले तहसीय में या डीएम से उसकी शिकायत करता। उसने कई गरीब लड़कियों के सामूहिक विवाह आयोजित कराए और उसके ही अथक प्रयासों से नगर के पठानकोट, अंबेडकर नगर और सोरगिरान जैसे मोहल्लों में सरकारी प्राइमरी स्कूल खुले थें। उन स्कूलों के खुलने से ही कूड़ा बीनने और ढाबों पर झूठे बर्तन साफ करने वाले नौनिहालों भी अक्षर पहचाना सीखने लगे थें। अपने ऐसे ही ओर बहुत से महत्वहीन और फालतू कामों के चलते वह नगर में काफी लोकप्रिय हो गया था।
 
एक साथ दो मुस्लिम और एक दलित मोहल्ले में स्कूल खुलवाने से वहां रहने वाले अमीर और कारोबारी लोगों ने भी उसकी भूरी-भूरी प्रशंसा की थी। वह लोग भी बंद मुट्ठी से उसकी सहायता करने लगे थे और कई कामों में उसकी सलाह भी लेने लगे थें। इससे आम लोगों पर भी उसके  प्रभाव में इज़ाफा हुआ था। लोग उसका बहुत-बहुत सम्मान करने लगे थें। उन्हें अगर कोई भी काम या परेशानी होती तो वह उसे फट से बता देते और वह झट से उसका हल कर देता। 
अलीम के चुनाव लड़ने की घोषणा करने के साथ ही लोगों ने भविष्यवाणी करनी शुरु कर दी थी जैसा पहले के चुनावों में मुस्लिम प्रत्याशियों का हाल हुआ था वही उसका भी होगा। उसे भी दो-चार हजार वोटों से ज्यादा कुछ नहीं मिलेगा। और इस बार तो शायद वह भी न मिले। क्योंकि जैनियों के तरफ से भी अपना उम्मीदवार मैदान में है। 
लेकिन लोगों की ये सभी भविष्यवाणियाँ और अंदाज़े उस वक्त गलत साबित हो गए जब उसने दस हजार लोगों की भीड़ के साथ पर्चा दाखिला किया। एक अदना से प्रत्याशी के पीछे इतने लोगों को देखकर अच्छो-अच्छों के होश उड़ गए थे। नगर के चुनावी इतिहास में यह पहली बार था कि किसी प्रत्याशी के नामांकन में इतने लोग जमा हुए हो। बाजार में पूरे तीन घंटे जाम लगा रहा था। और हैरत की बात तो यह थी कि इन लोगों में सबसे ज्यादा वही लोग दिखाई दे रहे थे जो दो दिन पहले ही सतपाल मलिक के साथ नामांकन करवाने गए थे।
 
रैली में सबसे आगे एक खुली जीप चल रही थी। उसमें नगर के कई गणमान्य लोगों के साथ वह सभी मुस्लिम नेता भी खड़े थें जिनके नाम मलिक के सामने उसके सबसे खास आदमी ने लिए थे। इसके ठीक पीछे वाली गाड़ी में अलीम और वहीद साथ खड़े थें। अलीम लोगों की अपार भीड़ को देखकर खुश होता हुआ हाथ जोड़े बार-बार सिर झुका रहा था। वहीं सफेद कुर्ता पायजामा पहने और सिर पर गांधी टोपी रखे खड़ा वहीद लोगों का हाथ हिला-हिलाकर ऐसी गर्मजोशी से अभिवादन कर रहा था जैसे चुनाव अलीम नहीं वह खुद लड़ रहा हो। इस गाड़ी के पीछे और भी कई गाड़ियां थी। और ये सभी गाड़ियां लोगों की उस भीड़ में कीड़े की तरह धीरे-धीरे रेंगकर आगे बढ़ रही थी। 
पर्चा दाखिल होने के साथ ही प्रचार का दौर शुरु हो गया था। पूरा नगर चुनाव के रंग में रंग गया था। हर गली-चौराहे पर, मौहल्ले की गलियों और सड़के के मोड़ों पर सब जगह प्रत्याशियों के होर्डिंग, पोस्टर और बैनर लगे हुए थें। अलीम की ओर से वहीद मुख्य प्रचारक था और वह पूरे जी-जान से प्रचार में जुटा हुआ था। उसने पूरे नगर को चार हिस्सों में बांट लिया। तीन हिस्से मुसलमानों के और चौथा हिस्सा जैनियों और हिंदुओं का।
 
मुसलमानों के हिस्से उसने अपने उन्हीं खास सिपहसालारों को सौंप दिए। पठानकोट में हाजी इसाक, हाजी कल्लू और अय्यूब कपड़े वाला ने प्रचार की कमान संभाली तो सोरगिरान से नफीस अहमद, पुन्नू खान, जमील मलिक और अबरार अलीम के प्रचारक बन गए। वहीं कसईय्यों वाले मोहल्ले में मुन्नू सब्जी वाला, हाजी काले और खलील मिस्त्री... ने पूरी मोहल्ले को अलीम के पोस्टरों से पटवा दिया। चौथा हिस्सा उसने खुद संभाल लिया।
वहीद अपने इलाके में घुम-घुमकर प्रचार करने लगा। साथ ही अपने साथियों के इलाकों में भी। वह गली-मोहल्ले में छोटी-छोटी सभाएं करता। दस-दस, बीस-बीस लोगों के समूह के बीच खड़ा होकर वह नगर के हालात और उसमें कैसे बदलाव हो सकते हैं, इसके बारे में उन्हें बताता और समझाता।
 
वह लोगों से सीधा-सरल भाषा में बात करता। इतनी सरल की वह उनकी दिमाग में आसानी से फिट हो जाती। वह कहता, “चुनाव बदलवा के लिए होते हैं। अच्छे के लिए होते हैं। विकास के लिए होते हैं। समास्याओं के समाधान के लिए होते हैं। न कि समस्याओं को बढ़ाने के लिए। लेकिन आप लोग जानते हैं कि पिछले दस सालों से कौन अध्यक्ष बना हुआ है? जिन्होंने आम आदमी की समस्याओं को खत्म करने के बजाय उन्हें बढ़ाया है। और अब उनके शौहर मैदान में है। वह कहते हैं कि हमने काम किया है। लेकिन काम है कहां? सड़के साफ नहीं है, नाले कूड़े के ढ़ेर से पटे पड़े है और नालियों का पानी गलियों में भर जाता। बाजार में सारा दिन जाम लगा रहता है। दुकानदारों ने सड़कों पर आतिक्रमण कर लिया है। इससे सड़कों पर पैदल चलने तक की जगह नहीं बची है। बच्चों के पढ़ने के लिए स्कूल नहीं है और जो स्कूल है उनमें किताब नहीं। आखिर वह विकास है कहां? कहीं भी तो नहीं। इसलिए अब वक्त आ गया है कि हमें बदलाव करना होगा। काम करने वालों को लाना होगा। उसे लाना होगा जो हमारे दुख को दुख समझे और हमारी परेशानियों को खत्म करे। इसलिए इस बार आपको कार पर मोहर लगानी है और अलीम को जीताना है।” 
लोग उसकी बातों को ध्यान से सुनते। उन पर ताली बजाते, और अलीम को वोट देने का वादा करते। उसने पहले ऐसी कई छोटी-छोटी सभाएं मुसलिम मोहल्लों में की और फिर अपने अमीर साथियों की मदद से हर मोहल्ले में अलीम की एक-एक बड़ी सभा भी करवा दी। जिनमें हजारों लोग शामिल होतें। अलीम की सभा में जुटे लोगों और उसके भाषण से उन पर पड़े प्रभाव ने अलीम के हौसले को आसमान पर पहुंचा दिया था। उसे अपने जीत पक्की लगती और वह खुद को नगर का आगामी सरबरा (अध्यक्ष) समझने लगता।
 
मुस्लिम मोहल्लों की तरह ही वहीद ने जैनियों और हिंदुओं के चौथे इलाके में भी प्रचार किया। वह उनके गली-मोहल्लों में जाता और उनसे हाथ मिलाता, उनकी खैरियत पूछता, किसी-किसी को गले लगा लेता है और हँसते हुए कहता, “अगर हम अपने-अपने प्रत्याशियों का प्रचार कर रहे है तो इसमें बुरा क्या है? सभी को अपने पसंद के उम्मीदवार को वोट देने का पूरा हक है... ओर उसे कोई छीन सकता है... हां, अगर बदलाव की उम्मीद पर वोट दिया जाए तो प्रत्याशी का चिन्ह जरूर बदला जा सकता है। जैसे पैन (धरेंद्र) से कंघी और कंघी (सतपाल मलिक) से कार (अलीम)...! कुछ भी... कुछ भी हो सकता है।” 
ओर जब उसे लगता कि सभा में खड़े कुछ लोग उसे घूर रहे है या वह उसका अपने आने से बुरा मान रहे है तो वह उनसे मुखातिब होकर कहता, “अरे, चुनाव है तो क्या हुआ? है तो हम भाई ही। एक नगर के निवासी। क्या ये चुनाव हमारे मिलना-जुलना बंद करवा देंगे? चुवान तो दो दिन के है, लेकिन हमें तो मौत तक साथ रहना। अब इन चुनावों के समय हम क्यों एक दूसरे मुँह मोड़े? क्यों एक दूसरे से घृणा करें? हम सब भाई हैं, पड़ोसी हैं। और अब भी उसी तरह रहेंगे जैसा अब तक रहते आए हैं। इसमें गुसा-नाराज़ होने वाली तो कोई बात ही नहीं है।”
 
लोग उसकी इस तरह की बातों को सुनकर मुस्कुरा देते। बात खत्म होने पर तालियां भी बजा देते। क्योंकि हर कोई उसके मिलनसार स्वभाव से परिचित था। इसलिए वह उससे अच्छे से मिलते। वह इन बातों को ऐसे हँसते-मुस्कुराते हुए कहता कि सुनने वाला मुग्ध हो जाता। उसकी इन मुलाकातों का फायदा भी हुआ। जब उसने अलीम की एक सभा बड़े जैन मंदिर के बिल्कुल बगल में करवा दी और वहां उसे सुनने के लिए एक हज़ार लोगों की भीड़ जमा हो गई।
 
जैसे-जैसे मतदान का दिन करीब आता गया, वैसे चुनाव का शोर भी बढ़ता गया। हर रोज, कहीं न कहीं, किसी न किसी प्रत्याशी की रैली, चुनावी सभा या जुलूस होता। कस्बे के हर मकान, हर दुकान, हर इमारत पर प्रत्याशियों के इश्तेहार चस्पा थे। लेकिन मुख्य मुकाबला सतपाल मलिक और अलीम के बीच ही थी। वहीद की छोटी-छोटी सभाओं और और सतपाल मलिक के धुंआधार प्रचार के बीच जैन प्रत्याशी मानो चुनावी परिदृश्य से पूरी तरह गायब ही हो गया था। सतपाल मलिक के कार्यकर्या जहां सड़कों, बाजारों और रोड़ पर कार में बैठकर प्रचार करते या बाईक रैली निकालते तो वहीं वहीद रिक्शा में बैठकर या कुछ लोगों की टोली बनाकर गली-गली, मौहल्ले-मौहल्ले में घूमता और लोगों से अलीम को वोट देने की अपील करता। और जब दोनों पार्टी अपने प्रत्याशी की बड़ी सभा करवाते तो जहां एक ओर सतपाल मलिक की रैली में हजार दो हजार लोग होते तो वहीं अलीम की रैली में इससे दोगुने लोग पहुंचते। रैलियों में जुटने वाली भीड़ ने प्रचार के आखिर तक आते-आते इस बात को लगभग सुनिश्चित कर दिया कि इस बार कौन जीत रहा है?
 
मतदान से एक दिन पहले नगर में आचार संहिता लागू कर दी गई। प्रचार का शोर भी थम गया। अब बारी है अगली सुबह मतदान की। रात के बारह बजे हुए है। लगभग पूरा कस्बा नींद की चादर ओढ़े हुए पड़ा है। सतपाल मलिक अपने प्रचार रूम में अकेला बैठा हुआ है। हालांकि कुछ देर पहले ही वह लोगों से घिरा हुआ बैठा था। लेकिन उसने अगले दिन सुबह जल्दी उठने का कहकर सभी को विदा कर दिया और खुद किसी गहरी सोच में डूबा हुआ वहीं बैठा रहा। 
कमरा पूरी तरह खामोश है। इतना खामोश की वहां अगर सुई गिर जाए तो उसकी आवाज़ को भी सुना जा सकता है। उसकी इस खामोश को बस घड़ी की टिक-टिक ही तोड़ रही है। सतपाल मलिक ने अपने नज़रों को उठाया और घड़ी को देखा। वह सवा बारह बजा रही है। उसने पंद्रह मिनट और इंतज़ार किया। जैसे ही घड़ी ने साढ़े बारह बजाये उसने अपना फोन उठाया और तीन अलग-अलग नंबरों पर फोन मिलाया। 
फोन करने के कुछ देर बाद ही तीन गाड़ियों उसके दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गई। वह बाहर निकला और बारी-बारी से तीनों गाड़ियों के पास गया। फिर वह उनसे अलग हटकर खड़ा हो गया। तीनों गाड़ियां पहले तो एक ही रास्ते पर चलती रही। फिर वह आगे जाकर तीन अलग-अलग रास्तों पर चली गई। उनमें एक रास्ता थाने के पीछे कस्सईयों वाले मोहल्ले में जाता था। दूसरा सोरगिरान में और तीसरा पठानकोट में।
 
अपने अपने गंतव्य पर पहुंचने के बाद गाड़ियों की लाइट बंद हो गई और उनकी चाल भी एकदम धीमी हो गई। वह एक घर से अगल घर तक ऐसे सरकती जैसे उसे धक्का मार कर धिकाया जा रहा हो। ओर इस तरह धिकयाते-धिकयाते तीनों गाड़ियां सुबह चार बजे तक वापस अपने ठिकाने पर आ गई।
अगले दिन भारी मतदान हुआ। मतदान केंद्रों पर पोपले मुंह के बुढ़ों, ज़िंदगी की भाग-दौड़ में थके अधेड़ों, बेफिक्री का जीवन जीते चहकते नवयुवकों और युवतियों ने अपने मताधिकार का सफल प्रयोग किया। मतदान के सारे दिन तीन प्रत्याशी अपने-अपने समर्थकों के साथ अलग-अलग मतदान केंद्रों पर घूमते रहे और वहां लाइन में लगे लोगों से वोट देने की अपील करते रहे।
 
अगले सुबह चुनाव का रिजल्ट जानने के लिए लोग अखबारों की ओर दौड़े। जिनके घर अखबार नहीं आते थे वह पड़ोसियों के घर पढ़ने के लिए गए। जिनके पड़ोसियों के भी अखबार नहीं आता था परचून की दुकानों और चाय के खोकों पर कहीं बैठकर तो कहीं खड़े होकर अखबार देखने लगे। अखबार की पहली सुर्खी थी- “भारी मतों से नगर पालिका के अध्यक्ष चुने गए सतपाल मलिक।” इस खबर के साथ सतपाल मलिक की मुस्कुराते हुए की एक बड़ी सी तस्वीर भी लगी हुई थी। उसमें वह विजयी चिन्ह के रूप में अपने बाएं हाथ की तीन उंगलियों को दबाएं और दो उंगलियों को अंग्रेजी के अक्षर ‘वी’ के आकार में उठा खड़ा था। 
इसी खबर के नीचे एक ओर खबर लगी थी। उसमें हारे हुए अलीम और उसकी बगल में मायूस चेहरे के साथ वहीद की फोटो लगी थी। उस खबर की हैडिंग थी- “भीड़ तो जुटाई, पर वोट दिलाने में नाकाम रहे वहीद।” 
 

- शहादत खान
 
रचनाकार परिचय
शहादत खान

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कथा-कुसुम (1)