अगस्त 2017
अंक - 29 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

भारतीय आधुनिकता की अवधारणा
जैसा कि ऊपर कहा गया है भारतीय आधुनिकता पश्चिम से अलग रही है, इसके विकास की प्रक्रिया, संदर्भ और प्रकृति उससे भिन्न रही है। “आधुनिकता की प्रकिया वैश्विक होने के बावजूद युरोपीय आधुनिकता और भारतीय आधुनिकता में अंतर है। इंगलैंड में अंग्रेजी ने जिस लैटिन को अपदस्थ किया, वह लैटिन ‘ इंगलैण्ड के लिए दूर देश की भाषा थी अतः उसका साहित्य भी वहाँ के अपने निवासियों के अपने चिर संचित संस्कार और भावव्यंजन पद्धति से दूर पड़ता था’ (रामचंद्र शुक्ल)  – जबकि हिन्दी में खड़ी बोली, मैथेली, ब्रज, अवधि, राजस्थानी आदि भाषाओं ने जिस संस्कृत-प्राकृत-अपभ्रंश को अपदस्थ किया, वह रामचंद्र शुक्ल के ही शब्दों में –“ संस्कृत काव्य और उसी के अनुसरण पर रचित प्राकृत अपभ्रंश काव्य भी हमारा ही पुराना काव्य है, पर पंडितों और विद्वानों द्वारा रूप ग्रहण करते रहने और कुछ बंध जाने के कारण जनसाधारण की भावमयी वाग्धारा से कुछ हटा-सा लगता है।” भारत में आधुनिकता की असली शुरूआत औपनिवेशिक सत्ता से संघर्ष के साथ पैदा हुए नवजागरण के साथ हुई। युरोप की आधुनिकता का सामना मध्ययुगीन मान्यताओं  और मूल्यों से था और अमरीकी आधुनिकता का सीधे ब्रिटिश साम्राज्य से। लेकिन भारतीय आधुनिकता को अनेक स्तरों और दिशाओं में संघर्ष करना पड़ा। यह संघर्ष जहाँ एक ओर ब्रिटिश सत्ता के साथ सम्राज्यवाद के आर्थिक-राजनैतिक मोर्चे पर था, वहीं दूसरी ओर सांस्कृतिक और धार्मिक मोर्चे पर भी और इन सबके बीच शामिल था कमजोर पूंजीपतिवर्ग, संकटग्रस्त सामंतवर्ग और उनके मूल्य, नई शिक्षा और पश्चिम के अनुकरण की कश्मकश।


भारत सन्यासियों जादूगरों, सपेरों का देश है, यह धारणा अंग्रेजों ने भारत के बारे में पूरी दुनिया में फैला दिया था। युरोप में जो समाजशास्त्रीय अध्ययन शुरू हुए या नृतत्व का तुलनात्मक अध्ययन शुरू हुआ तो अंग्रेजों ने यत्न पूर्वक यह साबित करने की कोशिश की कि भारत वर्ष में तो दरअसल दर्शन, समाजशास्त्र और राजनैतिक दृष्टि जैसी कोई चीज ही नहीं थी। डार्विन के विकासवादी सिद्धांत ने इस मध्ययुगीन अंधविश्वास को तोड़ा कि ईश्वर ने मनुष्य को बनाया है। लेकिन समाज के प्राकृतिक विज्ञान से नस्लवाद चला और इस आधार पर सामाजिक अंतर को खोजने की कोशिश की गई। इसीलिए विद्वानों ने रेखांकित किया कि “ अंग्रेजी शिक्षा का भारत में मुख्य उद्देश्य अंधविश्वासों और रूढ़ियों को समाप्त करना नहीं था, वे हमें सभ्यता का वरदान देने नहीं, वरन् बड़े अप्रत्यक्ष ढंग से  भारतीय मानस में यह अहसास जगाने आए थे कि दर्शन, विचारादर्श, और सांस्कृतिक स्तर पर हमारे पास कुछ नही था या है।”31  इस तरह वे युरोपीय समाज जो श्वेत होने के कारण नस्लीय रूप से श्रेष्ठ माने जाते थे – को सर्वश्रेष्ठ साबित कर  अपने उपनिवेशवादी विस्तार को उचित ठहरा रहे थे। इसकी प्रतिक्रिया होना स्वभाविक थी और इसी प्रतिक्रिया स्वरूप भारतीय अतीत और परंपरा का उत्खनन हुआ, और भारतीय संदर्भों में आधुनिकता की खोज और कोशिश शुरू हुई।


युरोपीय आधुनिकता से भारतीय आधुनिकता इस मायने में भी अलग है कि युरोप में जहाँ आधुनिकता धर्म और विज्ञान के प्रखरतम संघर्ष की परिणति थी, वहीं भारत में धर्म और विज्ञान का कोई वास्तविक द्वन्द्व नहीं उभरा। भारत में तो वैज्ञानिक चेतना का अधिकतर आयात ही हुआ और धर्म की भूमिका हमेशा की तरह निर्णायक बनी रही। राष्ट्रीय जागरण की अभिव्यक्ति धार्मिक जागरण के प्रतिबिंब के रूप में हुई। और यह भी एक तथ्य है कि “ भारत में पूँजीवाद और आधुनिक सभ्यता के विकास के लिए संघर्ष अभिन्न रूप से धर्म के प्रति दृष्टिकोण से जुड़ा हुआ है।”32


इस तरह हम देखते हैं कि भारतीय आधुनिकता पश्चिमी आधुनिकता का भारतीय संस्करण नहीं है। पश्चिम की आधुनिकता उपनिवेशवाद में ढलती है, भले ही यह पूंजीवादी विकास का परिणाम क्यों न हो, तो भारतीय आधुनिकता उपनिवेशवाद से संघर्ष करते हुए रूप लेती है। ऐसे में उपनिवेशवादी मूल्य भारतीय आधुनिकता के मूल्य कैसे हो सकते हैं। इस तरह हम देखते हैं कि आधुनिकता की दो परंपराए हैं – साम्राज्यवादी आधुनिकता और प्रतिरोधी आधुनिकता। जिस हद तक वे आधुनिक परिवेश और विश्वबोध से निर्मित हुई है, उस हदतक उनमें समानता है जिस हद तक उसकी अंतर्वस्तु प्रतिरोध और वर्चस्व की परस्पर विरोधी शक्तियाँ हैं, उस हदतक उनमें भिन्नता है। पूरी आधुनिकता को संदिग्ध और समस्याग्रस्त बना देने वाला उत्तर-आधुनिक विमर्श  इस द्वन्द्वात्मकता को नजरअंदाज करता है। यहाँ यह दुहराना जरूरी है कि  आधुनिक पूँजीवाद ने  अंतर्राष्ट्रीय अपनिवेश कायम किए, सिकंदर के विश्व-विजय के अधूरे सपने को पूरा किया, आधुनिकीकरण और पश्चिमीकरण को एक बनाया, लेकिन इससे औपनिवेशिक परियोजना और आधुनिक चेतना एक नहीं हो जाती।33 दोनों आधुनिकताओं का अंतर साधन से ज्यादा मूल्यों में निहित है।
अंत में भारतीय आधुनिकता को अलगाने वाला एक पहलू भारत में प्रचलित जातिवाद भी है, जो सदियों से चला आ रहा है, और वर्तमान समय में भी बुद्धिजीवियों के लिए एक तरह की चुनौती बना हुआ है। केदारनाथ सिंह के शब्दों में –“एक भारतीय नागरिक के रूप में मैं जानता हूँ कि मेरा समाज सांतवाद के विरूद्ध एक लंबे संघर्ष के बाद भी, अपने मूल्यों और अपने आचरण में सामंती अवशेषों से अभी पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया है। उसी अवशेष का एक रूप है जाति व्यवस्था जो मेरे चारों ओर है। मैं चाहूँ या न चाहूँ, अपने समाज में अपने सारे मानववाद के बावजूद , मैं एक जाति विशेष का सदस्य माना जाता हूँ।... मेरी आधुनिकता में यह खंरोच भी शामिल है।”34  बहरहाल पश्चिमी आधुनिकता से अलग भारतीय आधुनिकता में ऐसे अनेक खरोंच शामिल हैं।





संदर्भ ग्रन्थः
1. कल्ला डॉ. नंदलाल,  लोक साहित्यशास्त्र, संजय बुक सेंटर, गोलघर, वाराणसी, संस्करण, 1997 पृष्ठ -2
2. Webster’s New Twentieth Century Dictionary, Simon &    Schuster Publication, 1983,  पृष्ठ- 681
3. ऋगवेद – 10/90/14, पेंगूइन इंडिया, संस्करण- 2000
4. वही – 3/53/12
5. गीता – 3/20, रूपा पब्लिकेशन इंडिया, संस्करण - 2005
6. उपाध्याय डॉ. कृष्णदेव, लोक संस्कृति की रूपरेखा, लोक भारती    प्रकाशन , पृष्ठ – 8
7. उपाध्याय डॉ. कृष्णदेव, लोक साहित्य की भूमिका, लोक भारती प्रकाशन, पृष्ठ 10-13
8. जनपद, वर्ष 1, अंक 1, पृ. 65
9. दास डॉ. कुंज बिहारी, द स्टडी ऑव ओरिसन फोकलोर , कल्ला डॉ.  नंदलाल की पुस्तक लोक साहित्य शास्त्र, जवाहर बुक सेंटर, 1997 से उदधृत, पृ. 5
10. दुबे डॉ. श्यामसुंदर, लोकः परंपरा, पहचान एवं प्रवाह, राधाकृष्ण  प्रकाशन, 2003, पृ. 69
11. दुबे डॉ. श्यामसुंदर, लोकः परंपरा, पहचान एवं प्रवाह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 2003, पृ. 45
12. उपाध्याय डॉ. कृष्णदेव, लोक संस्कृति की रूपरेखा, लोक भारती  
     प्रकाशन , पृष्ठ – 12
13. समाज पत्रिका (काशी विद्यापीठ) वर्ष 4, अंक 3 (1958), पृ. 446
14. दुबे डॉ. श्यामसुंदर, लोकः परंपरा, पहचान एवं प्रवाह, राधाकृष्ण प्रकाशन, 2003, पृ. 47
15. वही, पृ. 47
16. कोलख्यान प्रफुल्ल, साहित्य, समाज और जनतंत्र, आनंद प्रकाशन, कोलकाता, 2003,  पृ. 26-27
17. डॉ. शंभुनाथ, संस्कृति की उत्तरकथा, वाणी प्रकाशन, 2000, पृ.80
18. मदान डॉ. इन्द्रनाथ, आधुनिकता और हिन्दी साहित्य, राजकमल प्रकाशन, तीसरी आवृति 2010, पृ. 11
19. मेघ डॉ. रमेश कुंतल, आधुनिकता और आधुनिकीकरण, अक्षर प्रकाशन, दिल्ली, 1969, पृ. 317
20. द्विवेदी डॉ. हजारी प्रसाद, हजारी प्रसाद द्विवेदी ग्रंथावली, राजकमल प्रकाशन, 2013 भाग-9, पृ.- 359
21. डॉ. शंभुनाथ (सं.), समकालीन सृजन, कोलकाता, आधुनिकता की पुनर्व्याख्या, अंक-21, वर्ष-2002, पृ. 20
22. वही, पृ. 29
23. वही, पृ. 130
24. पूर्वग्रह, अंक -70-71, शताब्दी का अवसान और उत्तरआधुनिकता नामक डॉ. नामवर सिंह का लेख, पृ. 101
25. डॉ. शंभुनाथ (सं.), समकालीन सृजन, कोलकाता, आधुनिकता की पुनर्व्याख्या, अंक-21, वर्ष-2002, आधुनिकता का परिदृश्यः वैज्ञानिक दृष्टि नामक वीरेंद्र सिंह का लेख, पृ. 143
26. वही, आधुनिकीकरण और आधुनिकता नामक धनंजय वर्मा का लेख, पृ. 69
27. वही, पृष्ठ, 69
28. वही, पृ. 77
29. वही, आधुनिकताः अनेकार्थता का संसार नामक वेद रमण का लेख, पृ. 106
30. वही, पृ. 109
31. आधुनिकता के बारे में तीन अध्याय, धनंजय वर्मा1984, पृ. 207
32. दामोदरन के., भारतीय चिंतन परंपरा, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस. दिल्ली, तीसरा संस्करण, 1982 पृ. 361
33. अखिलेश (सं.), तद्भव, अंक-11, वर्ष- 2004,  पृ.33
34. सिंह केदारनाथ, मेरे समय के शब्द, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली  1993, पृ. 14-15

 


- विमलेश त्रिपाठी

रचनाकार परिचय
विमलेश त्रिपाठी

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