प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2017
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

लोक संस्कृति और आधुनिकीकरण- डॉ. विमलेश त्रिपाठी
 


लोक और लोक संस्कृति
ऐसी मान्यता है कि "लोक जगत् की आत्मा है।"1 लोक शब्द को प्रायः विद्वानों ने अंग्रेजी के फोक लोर (Folklore) से जोड़कर देखने की कोशिश की है। पाश्चात्य शब्दकोश में 'लोक' का समानार्थक शब्द FOLK स्वीकार किया गया है। अंग्रेजी भाषा के प्रसिद्ध शब्दकोश में FOLK की व्याख्या करते हुए लिखा गया है-
1. "People in general, or any part of them without distinction, formerly alike in both singular and plural, but now the plural folk in most used, as falks will talk, some folk say so.
2. A race of people, a nation, a community.2

कोशगत अर्थों से जो बात उभर कर आती है, वह स्थापित करती है कि लोक शब्द बहुत ही व्यापक है और इसमें संपूर्ण मानव समाज की सत्ता, रहन-सहन, आचरण, व्यवहार एवं परंपरागत गीत, त्योहार, विश्वास और मान्यताएं सन्निहित होती हैं। यहाँ अंग्रेजी के 'फोल्क' शब्द से लोक की तुलना का उद्देश्य मात्र इतना है कि इस शब्द के अन्य समानार्थी शब्द का मूल्यांकन भी हो सके, लेकिन हमारी यह मान्यता है कि हमारी संस्कृति में यह शब्द अपनी व्यापकता के साथ शुरूआती दौर से ही मौजूद रहा है और इस शब्द का मूल्यांकन भारतीय साहित्य और संस्कृति के आधार पर करना ही समीचीन होगा। हाँ, यह जरूर है कि अन्य भाषा जैसे कि अंग्रेजी में इसे समझने के जो प्रयास हुए हैं, उन्हें भी स्पर्श करना हम अपना दायित्व समझते हैं।
बहरहाल प्रयोग और परम्परा की दृष्टि से लोक शब्द की व्याप्ति असीम है। ऋगवेद के विख्यात पुरूष सूक्त में स्थान और जीव दोनों ही के अर्थों में इस शब्द का प्रयोग दृष्टिगत होता है–

नाश्या आसीदंतरिक्षं शीर्ष्णा द्यौ समपर्तत।
पदश्यां भूमिर्छिशः श्रोता तथा लोकां अकल्पयन्।3

इसी प्रकार ऋगवेद में ही लोक शब्द का प्रयोग जन के अर्थ में भी हुआ है – “य इमें रोदसी उभे अहमिदमतुष्टवं। विश्वमित्रस्य रक्षति ब्रह्मेंद भारतं जनं।”4 इसी प्रकार यजुर्वेद में विराट समाज के रूप में लोक की कल्पना की गई है। ऋषि का कथन है – वह विराट पुरुष सहस्त्र मुख, नेत्र और पद से युक्त है –सहस्त्र शीर्षां पुरुषः सहस्त्रपात्। इसी तरह उपनिषद से लेकर महाभारत तक में लोक का उल्लेख एक व्यापक अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। कहीं यह जन के रूप में है, कहीं समुदाय तो कहीं इसे इश्वर से समान विराट रूप में चित्रित किया गया है। पाणिनी ने अपने अष्टाध्यायी में भी लोक की व्युत्पति की चर्चा की है। गीता में  लोक और लोक संग्रह इत्यादि शब्दों पर विशेष बल देते हुए कहा गया है –

कर्मणैव हिंससिद्धिमास्थिताः जनकादयः।
लोक संग्रह मेवापि संपश्यन कर्तृमर्हसि।।5

प्राकृत तथा अपभ्रंश में ‘लोक जत्ता’, ‘लोअप्पवाय’ आदि शब्दों का प्रयोग लोक के अर्थ में किया गया है। साथ ही सम्राट अशोक के शिलालेखों तक में संपूर्ण प्रजाजनों के अर्थ में लोक शब्द का प्रयोग मिलता है।

वस्तुतः “ ‘लोक’ शब्द संस्कृत के ‘लोक दर्शने’ धातु से ‘घञ’ प्रत्यय करने पर निष्पन्न होता है। जिसका लट् लकार के अन्य पुरूष के एक वचन का रूप ‘लोकते’ है। अतः लोक शब्द का अर्थ हुआ- देखने वाला। इस प्रकार वह समस्त जन-समुदाय जो इस कार्य को करता है लोक कहा जा सकता है। लोक शब्द से ही हिन्दी के लोग शब्द की व्युत्पति मानी जाती है जिसका अर्थ है सर्वसाधारण जनता। अतः ‘लोक’ शब्द का अभिप्राय उस समस्त जनसमूह से है जो किसी देश में निवास करता है।”6
आशय यह है कि लोक शब्द भारत और भारतीय संस्कृति में कोई नया शब्द या नई अवधारणा नहीं है, इस शब्द का प्रयोग सदियों से यहाँ के साहित्य-इतिहास में प्रयुक्त होता रहा है जिसका अर्थ भिन्न होते हुए भी समग्रता में उसके अर्थ को समान्य जन के रूप में ग्रहण किया जाना चाहिए, कि किया भी गया है।7
आधुनिक काल में लोक और लोक संस्कृति का व्यापक अध्ययन शुरू किया गया। इस अवधारणा पर प्राच्य एवं पाश्चात्य दोनों ही विद्वानों ने गंभीर अध्ययन करते हुए अपने-अपने निष्कर्ष प्रस्तुत किए। इन अध्ययनों के निष्कर्षों को समझने के पहले उन अध्ययनों पर एक संक्षिप्त दृष्टि डालना समीचीन होगा।

हिन्दी के सुप्रसिद्ध विद्वान डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लोक की व्याख्या करते हुए लिखा है – “लोक शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम्य नहीं है बल्कि नगरों और गाँवों में फैली हुई वह समस्त जनता है जिनके व्यवहारिक ज्ञान का आधार पोथियां नहीं है। ये लोग नगर में परिष्कृत, रुचि संपन्न तथा सुसंस्कृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा, अधिक सरल तथा अकृत्रिम जीवन के अभ्यस्त होते हैं और परिष्कृत रूचि वाले लोगों की समूची विलासिता और सुकुमारता को जीवित रखने के लिए जो भी वस्तुएँ आवश्यक होती हैं उन्हें उत्पन्न करते हैं।”8 भारत के लोक साहित्य के प्रसिद्ध विद्वान डॉ. कुंजबिहारी दास ने लोक को परिभाषित करते हुए लिखा है – “The people that live is more or less primitive conditions out side the sphere of sophisticated influences.” 9

इस तरह हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि लोक हमारी सभ्यता-संस्कृति में कोई नया शब्द नहीं है और इसका तात्पर्य उस जनता से है जो स्मृतियों के आधार पर अपनी परम्परा, विश्वास और संस्कृति को अपने पेट में छुराए रखती है और कि शिष्ट जनों से उसका सरोकार मात्र इतना है कि वह उनके मनोरंजन और विलासिता की सामग्री उपलब्ध कराती है। जैसा कि उपरोक्त परिभाषा में द्विवेदी जी ने भी स्वीकार किया है, लेकिन हमारी मान्यता के अनुसार लोक सिर्फ शिष्ट जनों के लिए विलासिता की समग्री ही उपलब्ध नहीं कराता, उसकी महत्ता इस बात में निहित है कि वह अपनी पीठ पर कई तरह के मूल्यों और धरोहरों को भी लिए चलता है जो मानव सभ्यता को बनाए-बचाए लखने के लिए जरूरी उपकरण के रूप में काम आते हैं। यहाँ डॉ. श्याम सुंदर दास की बात का का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा। वे लिखते हैं – “एक तरह से भारतीय ग्राम संस्कृति (लोक) ही मानवीय मूल्यों की संप्रसारण स्थली और सन्धारण स्थली रही है। हजारों वर्षों से ये मूल्य वहाँ के जीवन में सुरक्षित रहे हैं।”

इसी संदर्भ में उस संस्कृति की भी याद आती है जिसे लोक की संस्कृति कहते हैं। यह वह संस्कृति है जो हजारों वर्षों से लोक में प्रचलित है और अबाध गति से आज भी जारी है। आधुनिकीकरण के प्रभाव स्वरूप वर्तमान समय में उसमें कई तरह की विकृतियां भी पैदा हुई हैं, जिसे हम आगे समझने का प्रयास करेंगे। बहरहाल, इसे पश्चिम के विद्वानों ने ‘फोकलोर’ कहकर अभिहित किया है, जिसे हम लोक संस्कृति के नाम से जानते हैं। कुछ विद्वानों ने ‘फोकलोर’ का अर्थ लोक वार्ता के रूप में समझा है। फोकलोर को हिन्दी की लोक संस्कृति का समानार्थी शब्द समझना चाहिए क्योंकि इसकी परिभाषा से यह ज्ञात होता है कि इसमें लोक की परंपरा, रीति-रिवाज, गीत-गाथा, लोकविश्वास-अंधविश्वास आदि सम्मिलित हैं। अतः हम फोकलोर का उल्लेख मात्र कर के यहाँ लोक संस्कृति को ही व्यापक तौर पर समझने का प्रयत्न करेंगे।
"लोक संस्कृति आदिम मानव से लेकर ग्राम्य जीवन की सामूहिक सौन्दर्यमूलक अभिक्रियाओं की सहजात अभिव्यक्ति है। आदिम मनुष्य ने जिस समय खुद के आनंद को सामहूहिक आनंद से जोड़कर अपने और प्रकृति के सहज संबंध को व्यापक तौर पर अनुभव किया होगा – उसी समय लोक संस्कृति की अवधारणा का सूत्रपात हुआ होगा।"11

यदि हम प्राचीन भारतीय संस्कृति का अध्ययन करें तो हमें दो तरह की संस्कृतियाँ शुरू दौर से ही दिखायी पड़ती हैं – पहली लोक संस्कृति तथा दूसरी शिष्ट संस्कृति। ये दोनों संस्कृतियाँ पृथक-पृथक धाराओं में प्रवाहित होती दिखायी पड़ती हैं।
शिष्ट संस्कृति से तात्पर्य उस अभिजात वर्ग की संस्कृति से है जो बौद्धिक विकास की पराकाष्ठा पर पहुंची हुई थी। यह वर्ग अपनी प्रतिभा के कारण समाज का अग्रणी तथा पथ-प्रदर्शक था तथा जिसकी संस्कृति का स्त्रोत वेद और शास्त्र था।12 इसके विपरीत लोक संस्कृति जन साधारण की वह संस्कृति है जो अपनी प्रेरणा लोक से ग्रहण करती है जिसकी उत्सभूमि वह साधारण जनता रही है, जिसके पास लिखित शास्त्र नहीं है, वह अपनी संस्कृति और मूल्य और धरोहरों को अपनी स्मृतियों की मार्फत बचाए सदियों से चुपचाप गतिमान है। इस संस्कृति के लोग बौद्धिक विकास के निम्न धरातल पर अवस्थित दिखते हैं। यह पार्थक्य तब अधिक स्पष्ट हो जाता है जब हम ऋगवेद तथा अथर्ववेद का सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं। यहाँ पं. बलदेव उपाध्याय की बातों का उल्लेख कर उक्त बातों को और स्पष्ट करने में सहायता मिल सकती है – “किसी देश के धार्मिक विश्वासों, अनुष्ठानों तथा क्रियाकलापों के पूर्ण परिचय के लिए दोनों संस्कृतियों में परस्पर सहयोग अपेक्षित रहती है। इस दृष्टि से अथर्ववेद ऋगवेद का पूरक है।.. यदि अथर्ववेद लोक संस्कृति का परिचायक है तो ऋगवेद शिष्ट संस्कृति का दर्पण है। अथर्ववेद के विचारों का धरातल समान्य जन जीवन है तो ऋगवेद का विशिष्ट जन जीवन है।”13 यहाँ इसे उद्धरित करने का हमारा उद्देश्य मात्र इतना है कि लोक संस्कृति और शिष्ट संस्कृति के बीच के अंतर को समझाया जा सके। उक्त विवेचन से हम आसानी से इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि लोक संस्कृति और शिष्ट संस्कृति के मध्य सदैव से ही एक अंतर रहा है। एक समाज में दो संस्कृतियाँ एक साथ एक ही समय सामानांतर रूप में गतिमान होती हैं। लोक संस्कृति के पास अपनी आदिम स्मृतियाँ होती हैं, अपने मूल्य होते हैं, अपनी परंपरा और अपने रीतिरिवाज होते हैं और अपना विपुल मौखिक साहित्य भी होता है, जिसे वे अपने साथ लिए सभ्यता के कंटीले और कठिन रास्ते पर अग्रसर होते रहते हैं। जबकि शिष्ट संस्कृति इनसे भिन्न होती है, वह निरंतर स्वयं का परिमार्जन करती हुई चलती है, तथा उसका अपना लिखित साहित्य होता है। कई बार उनके पास लिखित नियम और कानून भी होते हैं। लोक के साथ ऐसा नहीं होता है। लोक संस्कृति पूर्णतः स्मृतियों पर आश्रित रहती है।

हालाँकि समय-समय पर समाज में हुए व्यापक परिवर्तन लोक संस्कृति की संरचना में भी परिवर्तन लाते रहे हैं, लाते रहते हैं। जैसा कि डॉ. श्याम सुंदर दुबे ने रेखांकित किया है – “लोक संस्कृति में ग्रामीण समाज की संरचना ने व्यापक परिवर्तन किए। एक तरह से संस्कृति के समग्र स्वरूप में शास्त्रीय धारणाओं का प्रवेश हो गया। कला माध्यमों और कर्मकांड में नियमों, विधि-विधानों का सूत्रपात इसी समय हुआ। एक महत्वपूर्ण बात यह हुई कि सामाजिक जीवन के स्थायित्व एवं कर्म विभाजन ने मनुष्य और प्रकृति के रिश्तों को स्थानापन्न करना शुरू कर दिया।... बाद में धर्मतंत्र के विकास ने लोक संस्कृति को धार्मिक अभिप्रायों से परिपूर्ण कर दिया और लोक संस्कृति के क्षेत्र में शास्त्रीय पद्धतियों का समावेश हो गया।”14 इस तरह समाज में हुए परिवर्तन ने समय-समय पर लोक में भी बदलाव किया। आधुनिक वैज्ञानिक विकास और आधुनिकीकरण की प्रक्रिया ने लोक में घुसपैठ कर उसे विकृत करने का काम किया। लोक की परम्पराओं में तेजी से परिवर्तन हुए और लोक की अक्षुणता और उसकी गरिमा समय-समय पर ध्वस्त हुई। लेकिन कुछ संस्कृतियों ने आज भी स्वयं को बचाए हुए रखा है, यहाँ बहुत कम परिवर्तन घटित हुए हैं। श्याम सुंदर दुबे के ही शब्दों में – “आज भी लोक संस्कृति में शास्त्रीयता का अभाव उन अंचलों में है जहाँ आदिवासी जीवन पद्धतियों की एकांगिकता हजारों वर्षों से ज्यों-की-त्यों है।”15

इस तरह हम देखते हैं कि लोक के अंदर एक व्यापक अर्थ अंतर्भुक्त है जिसमें उस समान्य जनता का निवास है, जो सदियों से अपने साथ अपने कला-साहित्य और मूल्यों को साथ लेकर अग्रसर होती रही है और आज भी अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखे हुए है। यह सही है कि विकास के साथ उसमें समय-समय पर परिवर्तन भी हुए हैं लेकिन लोक अपनी विशेषताओं के साथ आज भी पहचाना जा सकता है। आधुनिक वैज्ञानिक विकास के साथ लोक की संस्कृति व्यापक तौर पर प्रभावित हुई, कई बार विकृत होने के अर्थ तक भी। आधुनिकता और वैज्ञानिक विकास ने लोक का परिमार्जन तो किया लेकिन उसे विकृत भी किया। इस तरह कई संस्कृतियाँ नष्ट भी हुईं और अब उनके अवशेष ही रह गए हैं। बहरहाल आज आधुनिकता और लोक के बीच इस अंतर्क्रिया का अध्ययन भी दिलचस्प हो उठा है। हम भी आगे इस द्वद्व को समझने का एक सक्षिप्त प्रयास करेंगे।


आधुनिकता की अवधारणा और आधुनिकताबोध
अधिकांश अवधारणाओं की तरह आधुनिकता की भी कोई निश्चित और सर्वमान्य अवधारणा या परिभाषा संभव नहीं है। इसे लेकर विद्वानों ने अलग-अलग मत और धारणाएं व्यक्त की हैं और हर किसी ने इसे अपने तरीके से समझने की कोशिश की है। और यह भी एक तथ्य है कि अवधारणाएँ देश काल के अनुरूप अपने मूल रूप को बदलती हुई और अधिक जटिलतर होती जाती हैं। इनके जटिल होने का एक कारण इनकी निरंतर गतिमानता और बहुआयामि विस्तार भी है। “आधुनिकता इतनी पास है कि इसे तटस्थ दृष्टि से आंकना कठिन जान पड़ता है।”18 जाहिरा तौर पर आधुनिकता भी अपवाद नहीं है।

एक साधारण मनुष्य और एक बुद्धिजीवी के विचार आधुनिकता को लेकर अलग-अलग हैं। साधारण अर्थों में आधुनिकता का आशय पूर्ववर्ती समय से आगे की सोच है। वह जो पुरातन है, पारंपरिक है उससे कुछ नया। लेकिन शास्त्रीय शब्दावली में आधुनिकता का अर्थ वही नहीं है। यह एक ऐसी अवधारणा है जो एक निश्चित ऐतिहासिक समय और परिस्थिति में उभर कर सामने आती है और उसके अपने कुछ खास लक्षण हैं जिसके आधार पर उसकी पहचान हम करते हैं। जब हम अवधारणात्मक पद के रूप में आधुनिकता का प्रयोग देखते हैं तो पाते हैं कि ज्ञान के क्षेत्र के अनुसार इसकी समझ और प्रतिमामों का विस्तार होता है। राजनीति, अर्थशास्त्र, सामाजशास्त्र अथवा दर्शनशास्त्र आदि ज्ञान क्षेत्रों में आधुनिकता को एक ही तरीके से परिभाषित या विश्लेषित नहीं किया जाता है। इतना ही नहीं, चूंकि आधुनिकता एक गतिशील अवधारणा है, अतः इसपर देशकाल का पर्याप्त असर पड़ता है। यूरोपिय देशों की आधुनिकता और एशियाई और अफ्रिकी देशों की आधुनिकता एक जैसी नहीं है, बल्कि उन देशों में आधुनिकता के प्रादुर्भाव के काल और कारण भी अलग-अलग हैं। संदर्भ और परिवेश बदलते ही आधुनिकता की प्रक्रिया और इसलिए परिणामतः प्रकृति में भी फर्क आ जाता है। इसलिए कहा जाता है, और जैसा कि डॉ. रमेश कुंतल मेघ ने स्वीकार किया है – “आधुनिकता कई प्रकार की हो सकती है। जितने प्रकार के इतिहास और दर्शन के एकत्रबोध हैं, उतने ही प्रकार की आधुनिकता है। जितनी विविधतावाली सामाजिक अवस्थाएं तथा उन्हें परिवर्तित करने वाली समस्याएँ हैं, उतनी ही व्यापक अथवा संकीर्ण आधुनिकता है।”19 बहरहाल, आधुनिकता की अवधारणा अपने आप में एक व्यापक और जटिल अवधारणा है जिसके लिए किसी सर्वमान्य निष्कर्ष पर पहुँचना लगभग नामुमकिन है।

“शब्दार्थ पर विचार करें तो अधुना या इस समय जो कुछ है वह आधुनिक है। पर आधुनिक का यही अर्थ नहीं है।”20 क्योंकि डॉ. रामधारी सिंह दिनकर के अनुसार नैतिकता, सौंदर्य-बोध और अध्यात्म के समान आधुनिकता कोई शाश्वत मूल्य नहीं है।
फिर भी आधुनिकता के जिन कुछ खास लक्षणों की तरफ विद्वानों ने इशारा किया है उन्हें यहाँ समझना अप्रासंगिक नहीं होगा।
विज्ञान के विकास और औद्योगिकरण के परिणाम स्वरूप आधुनिकता का आभिर्भाव कुछ विद्वान मानते हैं। और यह सत्य भी है कि विज्ञान अपने साथ तर्क बुद्धि लेकर आया, और उसके प्रसार के साथ सदियों से स्थापित परंपराएँ ध्वस्त हुईं। पहली बार मनुष्य ने अपनी बुद्धि के आधार पर सत्य के अन्वेषण की ओर कदम बढ़ाया। आधुनिकता का एक लक्षण यह तर्क बुद्धि है, जिसके मूल में वैज्ञानिक चेतना का विकास और कालांतर में औद्योगिकरण की प्रकिया शामिल है। डॉ. रामधारी सिंह दिनकर इस संबंध में लिखते हैं – “युरोप और अमेरिका में जो आधुनिकता फैली है, उसका असली कारण वैज्ञानिक दृष्टिकोण की प्रथमिकता और प्राबल्य है। यह दृष्टि उद्योग और टेक्नालॉजी से नहीं उत्पन्न हुई है बल्कि टेक्नालॉजी और उद्योग ही इस दृष्टि के परिणाम हैं।”21 दिनकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रमुखता देते हुए विज्ञान एवं तकनीक के विकास को आधुनिकता का कारण नहीं बल्कि परिणाम मानते हैं।

कुबेरनाथ राय आधुनिकता को फैशन से कहीं अधिक सूक्ष्म और गहरी चीज कहते हुए इसे एक दृष्टिक्रम, एक बोध प्रक्रिया, एक संस्कार-प्रवाह या इन सबसे अलग एक खास तरह का स्वभाव मानते हैं। वे लिखते हैं – “इस खास स्वभाव की रचना जिन संस्कारों से हुई है, वे बड़े ही उलझे हुए हैं.. प्रश्नाकुलता, संशयशीलता, जीवन के आस्वादन में विश्वास, मात्र तात्कालिक या शुद्ध ऐन्द्रिक अनुभूति में ही विश्वास या परंपरा से निरपेक्ष होकर नए मूल्यों का अन्वेषण, इस अन्वेषण की तीव्र यंत्रणा का बोध, चरम क्षणों ( यथा जन्म के समय का क्षण या मृत्यु के समय का क्षण जब हम नितांत अकेले रहते हैं) को पकड़ने और उनके माध्यम से  जिज्ञासा और सिसृक्षा को तुष्ट करने का प्रयास आदि। इन सारे संस्कारों से संपृक्त मन को आधुनिक मन कहते हैं। आधुनिकता को हम आज इसी रूढ़ अर्थ में ग्रहण करते हैं।”22
कहने का तात्पर्य यह कि उपरोक्त बातें जिन्हें कुबेरनाथ ने संस्कार के रूप में गिनाए हैं, वे आधुनिकता के लक्षण हैं।
लेकिन यहाँ इस बात को समझना जरूरी है कि आधुनिकता अपने शुरू दौर में नूतन विचारधारा को लेकर आई, और कई अच्छी बातों के साथ इसने पुराने आडंबरों पर भी प्रहार किए, खासकर धार्मिक आडंबरों पर। आधुनिकता ने पहली बार व्यक्ति की सत्ता ‘मैं’ को महत्व दिया। मनुष्य धार्मिक समुदायों एवं गढ़ों में अपनी अस्मिता को भुला चुका था। आधुनिकता ने पहली बार मनुष्य को उसके ‘मैं’ से, उसकी अपनी अस्मिता से परिचय कराया।

एक दूसरी बात जो आधुनिकता के आने के बाद संभव हुई, वह है वैज्ञानिक सोच। हर बात को मुनष्य ने तर्क और बुद्धि की कसौटी पर परखना शुरू किया। हालाँकि यह तथ्य है कि इसमें विज्ञान की तर्क पद्धति का अपना योगदान है, इसलिए आधुनिकता के एक औजार के रूप में विज्ञान को स्वीकार किया जाता रहा है।
विज्ञान ने आधुनिकीकरण का मार्ग प्रशस्त किया, और आधुनीकीकरण ने आधुनिकता का। यही वजह है कि विद्वान आधुनिकता को औद्योगिक क्रान्ति के बाद हुए आधुनिकीकरण और औद्योगिक विकास को इसका कारक मानते हैं और उपनिवेशवाद के साथ इसे जोड़कर इसके नकारात्मक पहलुओं को उजागर करने की कोशिश करते हैं। इस तरह विद्वानों ने दो तरह की आधुनिकता को स्वीकार करने की पहल की है – एक तो वह आधुनिकता जिसके पास साकारात्मक मूल्य हैं और एक वह आधुनिकता जो उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के साथ जुड़कर दो विश्वयुद्धों की भूमिका रचती है। असल में आधुनिकता अपने परवर्ती काल में आधुनिकतावाद का रूप ग्रहण कर रूढ़ हो जाती है। आधुनिकता जहाँ एक सतत विकास की प्रवहमाम प्रक्रिया है, वहीं आधुनिकतावाद एक रूकी हुई जड़ अवधारणा है। यहाँ आधुनिकता और आधुनिकतावाद के बीच के अंतर को समझ लेना भी जरूरी है।

“आधुनिकतावाद आधुनिकता की तरह जीवन, समाज और साहित्य के साथ सकारात्मक तरीके से नहीं नकारात्मक तरीके से व्यवहार करता है। इस व्यवहार को आधुनिकतावाद से चिन्हित करने की बजाय प्रायः आधुनिकता से चिन्हित किया जाता है। जबकि इनका संदर्भ सुनिश्चित हो चुका है। पर यह स्वयं में परस्पर विरोधी आंदोलनों का आन्दोलन है।”23 डॉ. नामवर सिंह लिखते हैं – इसलिए हमें न भूलना चाहिए कि आधुनिकतावादी साहित्य क्या आधुनिकता का सर्जनात्मक साहित्य है? आधुनिकतावाद नाम की अवधारणा सिद्धांत या आइडियोलॉजी के रूप में दूसरे महायुद्ध के बाद की सृष्टि है। इसलिए इसपर शीत युद्ध की गहरी छाप है, कुछ लोगों का कहना है कि  अवधारणा के रूप में यह ‘एम्पटी’ ‘कान्सेप्ट’ है। ‘एम्पटी’ इसलिए है कि इसका जो ‘रिफरेंट’ है वह सुनिश्चित नहीं है।”24

आधुनिकता अपने विकास की प्रक्रिया में आगे बढ़कर आधुनिकतावाद में तब्दील हो गई प्रतीत होती है। लेकिन कहना चाहिए कि अगर आधुनिकता  एक सतत विकासशील प्रक्रिया है जो एक शुरूआती साकारात्मक मूल्यों वाली आधुनिकता थी तो उसका एक छोर वर्तमान तक आना चाहिए और दूसरी जो नाकारात्मक आधुनिकता का विकास है, वह आज की उत्तर आधुनिकता है ही।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि “आधुनिकता एक ऐसा संप्रत्यय है जो समय और युग की सापेक्षता में अपने अर्थ का क्रमिक विकास करता है। इस दृष्टि से आधुनिकता एक गतिशील धारणा है। दूसरे शब्दों में, वह एक समय-सापेक्ष दृष्टि है।”25 और बदले हुए संदर्भों में उसका आज भी अविरल विकास हो रहा है।


आधुनिकीकरण की प्रक्रिया
कई बार आधुनिकता और आधुनिकीकरण को एक ही समझ लिया जाता है। यह जरूर है कि एक की संकल्पना के बिना दूसरे की व्याख्या लगभग असंभव है, फिर भी ये दोनों अवधारणाएँ भिन्न अस्तित्व रखती हैं। डॉ. धनंजय वर्मा ने आधुनिकीकरण की परिभाषा देते हुए लिखा है – “आधुनिकीकरण, चाहे वह भारतीय संदर्भ में हो या पश्चिमी, आधुनिकता की ही तरह एक ऐसा शब्द है जिसकी कोई आत्यन्तिक परिभाषा नहीं दी जा सकती। 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में उसे धर्मनिरपेक्षता और बौद्धिकता के विकास के रूप में स्वीकार किया जाता था और उसका संबंध उस प्रगति से था जो मनुष्य ने निरंकुशता और अंधविश्वासों पर विजय के रूप में पायी थी। लेकिन आज आधुनिकीकरण का अर्थ साधारणतः आर्थिक प्रगति और औद्योगिक उन्नति माना जाता है और पश्चिमीकरण को उसका पर्याय  स्वीकार कर लिया गया है।”26 लेकिन आधुनिकीकरण को पश्चिमीकरण का पर्याय मानना उचित नहीं है। उसी लेख में डॉ. वर्मा ने प्रो. साइडेल का हवाला देते हुए लिखा है – “एशिया में आधुनिकीकरण पर हुए अंतर्राष्टीय सम्मेलन में प्रो. साइडेल ने सच ही कहा था कि आधुनिकीकरण का अर्थ पश्चिमीकरण नहीं है। वह आदमियों की और समाज की  एक नए प्रकार की सभ्यता का निर्माण है।

आधुनिकीकरण हमेशा नवसंस्कृतिकरण की समस्या रही है। ... दरअसल वह मनुष्य की वृत्तियों, उसके सामाजिक व्यवहारों और संबंधों तथा आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तनों को व्यंजित करनेवाला शब्द है और ये सारे परिवर्तन एक दूसरे से संबद्ध हैं। विकासशील देश इन या ऐसे ही परिवर्तन से गुजर रहे हैं और युरोप या अमरीका इससे पहले ही गुजर चुके हैं। आधुनिकीकरण के अर्थ भिन्न संदर्भों में भिन्न हो जाते हैं, लेकिन वे सब मिलकर विकास और परिवर्तन की एक दिशास्थिति को पूर्ण करते हैं।”27
समाजशास्त्रियों, अर्थशास्त्रियों, नृतत्वशास्त्रियों एवं इतिहासविदों एवं राजनीतिशास्त्रियों के लिए आधुनिकीकरण की समझ और प्रक्रिया भिन्न है। लेकिन जिस एक बात में सबकी समानता है वह है विकास की ओर निरंतर गतिशीलता। साहित्य चुंकि सामाज से सीधे-सीधे युक्त है, इसलिए अन्य विचारधाराओं की तरह आधुनिकीकरण की प्रक्रिया का असर भी उसपर पड़ता है। साहित्य में समाज से लेकर अर्थ, राजनीति, दर्शन एवं यहाँ तक कि व्यक्ति की सत्ता भी समाहित है, इसलिए इन सभी क्षेत्रों का परिवर्तन साहित्य में ‘रिफलेक्ट’ होता है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसपर किसी तरह की असहमति का सवाल नहीं उठता।

बहरहाल आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को अक्सर स्तरीय शिक्षा, प्रजातंत्र व धर्मनिरपेक्षता जैसे विचारादर्श, राष्ट्रवाद, कुशल नेतृत्व और नियामक शासन से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन इस प्रकिया को घटित होने में औद्योगिकरण की मुख्य भूमिका है। प्राचीन अर्थव्यवस्था और राजनैतिक प्रणाली में सुधार भी औद्योगिकरण के पश्चात संभव होते हैं। लेकिन यह परिवर्तन सिर्फ बाह्यरूप में घटित नहीं होते, इनका संबंध मनुष्य की सोच और विचार पद्धतियों से भी जुड़ता है। गाँव के शहर में बदलने की प्रक्रिया को भी आधुनिकीकरण के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन यह शहरीकरण भी जितना बाह्यरूप में बदला हुआ होता है, उतना ही उसमें रहने वाले लोगों की सोच और चिंतनदिशा में भी परिवर्तन लाता है। इसलिए यह समझना जरूरी है कि आधुनिकीकरण जितनी बाह्य प्रक्रिया है, उतनी ही आभ्यंतरिक भी। लेकिन भारतीय संदर्भ में आधुनिकीकरण के जो अर्थ हैं, ठीक वही अर्थ पश्चिम की आधुनिकता या आधुनिकीकरण का नहीं है।

आधुनिकीकरण की प्रारंभिक प्रक्रिया पश्चिम में घटित हुई, वैज्ञानिक विकास, औद्योगिकरण एवं औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप एक तरह का वैचारिक सैलाब आया। इस प्रक्रिया में आधुनिकता ने अपने जन्म की एक आधारभूमि तैयार की। औद्योगिक विकास के साथ व्यापक पैमाने पर शहरीकरण तथा कलामाध्यमों में व्यापक परिवर्तन एक तरह की नई क्रान्ति के सूचक थे जो आधुनिकीकरण के औजार के रूप में कार्य कर रहे थे। आधुनिकीकरण की प्रक्रिया पश्चिम में बाह्य तौर पर घटित होने के साथ मनुष्य की चेतना में भी घटित हुई। परंपरावाद से मुक्ति, धार्मिक रूढ़ियों से संघर्ष और व्यक्ति की सत्ता की स्थापना सभी वैचारिक स्तर पर घटित हुए। पश्चिम की आधुनिकता और आधुनिकीकरण जहाँ यथार्थ संकल्पना थी, भारतीय आधुनिकता और आधुनिकीकरण, एक निश्चित काल विशेष में, एक स्वप्न मात्र। इसलिए यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि भारतीय आधुनिकता का शुरूआती दौर पश्चिम से आयातित बौद्धिक विचारधारा से अधिक कुछ न थी, क्योंकि उस समय तक आधुनिकता और आधुनिकीकरण के लिए भारत की जमीन तैयार नहीं थी। “समान्यतः आधुनिकीकरण के तीन आधार माने गए हैं – औद्योगिकरण, यंत्रीकरण और वैज्ञानीकरण। शहरीकरण औद्योगिकरण में ही अंतर्भूत है और कुल मिलाकार ये आधुनिक विकास की सर्वमान्य दिशाएं हैं।युरोप में ये विकास दिशाएं अपने स्वभाविक गति और चरण में सुंन्न हुईं, इसलिए वहाँ आधुनिकता भी स्वाभाविक विकास की तरह उद्भूत हुई। इसके विपरीत भारत में यह सहज गति से नहीं हुआ। गाँवों के शहरीकरण के बजाय यहाँ गाँवों का शहरों में सिर्फ स्थानांतरण हुआ, इसलिए गाँव और कस्बों से शहर और नगर की ओर संक्रमण की वह यंत्रणा, जिससे 19वीं शताब्दी का युरोप गुजरा था, हमारी ‘प्राप्ति’ नहीं रही।… आधुनिकीकरण के प्रथम चरण में ही  यहाँ आधुनिकता का स्वभाविक जन्म नहीं हो पाया। सामूहिक स्तर पर उसके स्वीकार और उससे समरस होने का अवसर नहीं मिल पाया। वे संस्कार हममें विकसित नहीं हुए।...हमने आधुनिकताबोध को नितांत बौद्धिक वस्तु मान लिया। इसका परिणाम यह हुआ कि पश्चिम के प्रसंग में परतंत्रता से मुक्ति की जो खोज एक विकासशील और आधुनिक धारणा थी, वह भारतीय संदर्भ में  सिर्फ वैचारिक और कुछ हद तक नकली भी लगती है।”28  इस संदर्भ में वेद रमण की बातों का उल्लेख प्रसंगिक होगा – “भारत में आधुनिकता की गति हुत धीमी रही है। इसका प्रभाव सभी लोगों तक एक समान नहीं पहुंचा है। स्वाधीनता के बाद जब बड़े पैमाने पर औद्योगिकरण की शुरूआत अभी हो रही थी; जिन्हें हम आज महानगर कहते हैं, वे अपनी नगरीय सीमा को तोड़ले के लिए हाथ-पांव मार रहे थे, कि हिंदी में आधुनिकता के संकटबोध की, महानगरीय एकरसता की, अमानवीयता की चर्चा होने लगी। इससे और अदिक हैरत की बात क्या हो सकती है। डॉ. धर्मवीर भारती ने लिखा ‘संकट का बोध और आधुनिकता का बोध बहुधा अभिन्न रहते हैं – परस्परावलंबित।’  इस संकट बोध का अर्थ क्या था, अपने आसन्न संदर्भ इसकी संगति, यदि बैठती थी तो किस तरह? कहना न होगा हिन्दी लेखक आधुनिकता के यथार्थ की अपेक्षा आधुनिकता के विचार से अधिक प्रतिकृत होता रहा है।  बहुतों के लिए आधुनिकता का यथार्थ अभी भी एक सपना है।”29

 


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- विमलेश त्रिपाठी
 
रचनाकार परिचय
विमलेश त्रिपाठी

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