अगस्त 2017
अंक - 29 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

बेघर सपने

कई रातों को जागकर
एक बुनी हुई चादर को
बेदर्दी से
रेशा-रेशा कर देना
ऐसा ही होता है बेघर होना

बेघर होना, ऐसा, जैसे-
सीरिया की लड़की
खोजती है बचपन की गुड़िया
अपनी गुड़िया के लिए

बम्बई के फुटपाथ पर
तिब्बती लड़का
चाऊमीन बनाते-बेचते
बाबा से सुनता है
पहाड़ी गाँव की कहानी
जिसे उसने देखा नहीं

दिल्ली की गर्मी में
करवटें बदलता बुज़ुर्ग
देखता है सपने
करता है इकठ्ठा बर्फ
छोटे बच्चों के साथ

बेघर होना, मतलब
सपनों को मार देना
ऐसे, जैसे-
लहरों को लहरों से
अलग कर देना।


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यात्रा

सुदूर अतीत के
मुर्दे टीले में बने
तालाब की आख़िरी सीढ़ी पर
पड़ी हुई जली लाश
अस्ल में फिनिक्स पक्षी है
जो अपनी ही राख से
पुन: जीवित
स्त्री बन
सभ्यताओं के आँसू से
लिख रही है विशिष्टता की दास्तां
संभाल रही है
विशिष्ट व्यवस्थाओं के दस्तावेज़
जिसमें है रूमानियत की लाश
जज़्बातों की डिबिया
गीतों के मिसरे
कैदी मुस्कान
नफ़रतों के साये
धोखे की कहानी
बेपनाह दर्द
इल्ज़ामों का सन्दूक
आँसुओं से लिखा प्रेम-पत्र
जिसमें लिखी है
पुरुष-स्त्री के सम्मिलन की कहानी
और त्रिपथगा की यात्रा का मन्त्र
जिसे अपनी आत्मा के सुरों में डाल
पहुँचा रही है हर सभ्यता में।


- डॉ. किरण मिश्रा

रचनाकार परिचय
डॉ. किरण मिश्रा

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कविता-कानन (1)