अगस्त 2017
अंक - 29 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

नवगीत- श्रम की एक शकल

गिरे पसीना
जहाँ धरा पर
उगती वहाँ फसल
दाने-दाने
पर  उभरी है
श्रम की एक शकल

लोई की
लालच में मछली
रही निगलती पिन
उठा-पटक के
बीच बीतते
अच्छे वाले दिन

किन्तु न पीड़ा
समझ सकी है
बदली हुई नसल!

तीखे स्वर ने
कान उमेठे
तन-मन गया सिहर
रोज गरीबी
चक्कर काटे
ज़मींदार के घर

आशा की
दीवार ढही फिर
दब के मरी अकल


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नवगीत- मिट्टी की तकदीर

भट्टे के घेरे में
सिमटी
मिट्टी की तकदीर

शीशे जैसी
रोज़ चटकती
यहाँ नयी उम्मीद
कब होली,
बैसाखी बीती
और दिवाली, ईद

शोषण और
ग़रीबी मिलकर
निश-दिन देती पीर

बजा रही है
सुनो डुगडुगी
फिर से तपकर ईंट
धीरे-धीरे
ताल हो गई
लंबी-चौड़ी भीट

चीरहरण हो रहा
प्रकृति का
चुप हैं मगर वजीर

उजड़ी बस्ती
रोटी माँगे
बन बँधुआ मजदूर
लगा देह पर
क्रीम पाउडर
फ्लैट रहे हैं घूर

दर्पण देखा
मुँह लटकाए
चीख रही तस्वीर

 


- योगेन्द्र प्रताप मौर्य

रचनाकार परिचय
योगेन्द्र प्रताप मौर्य

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गीत-गंगा (1)