प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2015
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

लघु नाटक- आखिर बरसा पानी

पात्र-परिचयः मेंढ़क/ तितली/ मुर्गा/ पहरेदार/ आलस परी/ नींद परी/ मेघ राजा

दृश्य- एक
(मंच पर एक सूखे तालाब का दृश्य। सूरज की चिलचिलाती धूप। तालाब के किनारे सूखे पेङ-पौधे। पर्दा उठते ही एक सूखी झाड़ी के पीछे से फुदककर मेंढ़क बाहर आता है।)
मेंढ़क- बहुत परेशां है सब प्राणी,
          कब बरसेगा ठंडा पानी?
          दो वर्षो से यह अकाल है।
          सब जीवों का बुरा हाल है।

(तभी एक अन्य सूखी झाड़ी से तितली थकी-हारी सी बाहर निकलती है।)
तितली- (मेंढ़क से) सुनो ओ प्यारे मेंढ़क मामा!
                          क्या है कहीं पानी का नाला?
                          जहां मैं अपनी प्यास बुझा लूं,
                          गीत जिंदगी का फिर गा लूं।
मेंढ़क- तितली बिटिया क्यां बताउं!
          कैसे तेरी प्यास बुझाउं?
          ताल-तलैया सूखे हैं सब,
          बादलों से खाली है नभ।

(मेंढ़क और तितली बुझे मन से आसमान को तकने लगते हैं। तभी नेपथ्य से ‘कूकड़ कूं’ की आवाज आती है। मेंढक और तितली चौंककर तालाब के एक   घाट की तरफ देखते हैें। कुछ देर बाद घाट के रास्ते से होकर एक मुर्गा मंच पर आता है।)
मुर्गा- मैं मनमौजी मुर्गा हूँ।
      दूर सफ़र पे निकला हूँ।
       स्वर्ग देश को जाना है।
      मेघ राजा से मिलना है।
     उनसे करनी है फरियाद।
     धरती को वे कर ले याद।
     बात वे मेरी गर मानेंगे,
    छम-छम पानी बरसायेंगे।

(मेंढ़क और तितली मुर्गे के पास आते हैं।)
मेंढ़क- मुर्गे जी मेरी बात तो सुनना!
          मैं भी चाहता हूँ संग चलना।
          मेघ राजा से मैं भी कहूंगा,
         बरसाओं जल, सूखा न सहूंगा।
तितली- हाँ, हाँ, मैं भी साथ चलूंगी,
         जाकर उनसे विनती करूंगी।
मुर्गा- चलो! चलो! सब साथ हैं चलते।
         मेघ राजा से विनय हैं करते।

(तीनों मंच के दूसरी तरफ बढते हैं। नेपथ्य से संगीत गूंजता है और मंच पर अंधेरा छाने लगता है।)


दृश्य-दो
(स्वर्ग देश का दृश्य। चारों तरफ बादल ही बादल। बादलों के बीच सोने का एक भव्य नक्काशीदार दरवाजा। दरवाजे के पास एक हट्टा-कट्टा आदमी पहरेदारी कर रहा है। पर्दा उठते ही मंच के दांयी तरफ से मुर्गा, मेंढ़क और तितली गाते हुए आते हैं।)

मुर्गा- आ गये हम तो स्वर्ग देश में!
मेंढ़क- कितने प्यारे स्वर्ग देश में!
तितली- कितने न्यारे स्वर्ग देश में!

(तीनों गाते हुए स्वर्ग देश के मेघ राजा के महल के सोने के दरवाजे के पास पहुंचते हैं। पहरेदार उन्हें हैरानी से देखता है।)
पहरेदार- कौन हो तुम सब, क्यों हो आये?
             आने की वज़ह तो बतलाये!
मुर्गा- हम है धरती के वासी।
मेंढ़क- धरती की जनता है प्यासी।
तितली- चारों तरफ है बहुत उदासी।
मुर्गा- मेघ राजा से है हमें मिलना।
मेंढ़क- धरती का उन्हें हाल है कहना।
तितली-हो संभव फिर जल का बरसना।
पहरेदार- बहुत सही समय पर आये।
             राजा को जाकर समझाये।
             दो परियों में वे खोये हैं,
             मानो सदियों से सोये हैं।

(पहरेदार खुशी-खुशी उन तीनों के लिये सोने का दरवाजा खोल देता है। तीनों गाते हुए दरवाजे के भीतर जाते हैं। मंच पर फिर से अंधेरा छाने लगता है।)


दृश्य-तीन
(मेघ राजा का कक्ष। मेघ राजा दो परियों- आलस परी और नींद परी के साथ खेल रहे है।)
आलस परी- (हंसते हुए) मुझको पकड़ न पाये राजा।
                                 आलस परी से हारे राजा।
नींद परी- (आलस परी से गले लग हंसते हुए) मुझको जीत न पाये राजा।
                                                             नींद परी से हारे राजा।
मेघ राजा- (खीझ कर) तुम परियां भी हो कमाल!
                               तुम दोनों की गहरी चाल!
                               तुमसे जीत न पाता हूँ,
                                रोज हारता जाता हूँ।

(तभी नेपथ्य से मुर्गे की कूकड़ कूं गूंजती है। मुर्गे की आवाज़ सुन दोनों परियां घबरा जाती है।)
नींद परी- यह कैसी आवाज़ है आयी!
             मैं हूँ बहुत ही घबरायी!
आलस परी- हाँ, बहिन यह कौन है आया!
                 हम दोनों का बुझाता साया!

(अचानक कमरे में धुआँ भर जाता है और दोनों परियां गायब हो जाती हैं। धुआँ हटते ही कक्ष में मुर्गा, मेंढ़क और तितली उपस्थित होकर मेघराजा को नमन करते हैं।)
मेघ राजा- (अपने आप से) जाने मुझको क्या हुआ था!
                                    दो परियों ने जादू किया था!
                                  कि मैं कुछ न कर सकता था।
                                      परियों में खोया रहता था।

(मेघ राजा अपने सिंहासन से उतर कर मुर्गे को गले लगाते हैं।)
मेघ राजा- मुर्गे जो तुम अच्छे आये।
         होश में जो तुम मुझको लाये।
          अब से पुण्य काम ये करना।
                लोगों को जगाते रहना।

(मुर्गे से गले लगने के बाद मेघ राजा बारी-बारी से मेंढ़क और तितली के गले भी लगते हैं।)
मेघ राजा- तुम तीनों की मन की बात, जादू से मैं जान गया हूँ।
           बरसेगा अब छमछम पानी, बात तुम्हारी मान गया हूँ।

(यह कहते हुए मेघ राजा अपने महल की खिड़की से हाथ बाहर निकाल कर हवा में लहराता है। अचानक बिजली के गरजने की आवाज के साथ पानी के बरसने की तेज आव़ाज आती है। तीनों मेघ राजा के साथ खिड़की से बाहर पानी को बरसते देख खुश हो उठते हैं।)
मेंढ़क- टर्र! टर्र! टरर्! भई टर्र! टर्र!टर्र!
              मेघ राजा ने बरसाया जल!
तितली- भिन-भिन अब मनवा गाये!
        चल कर सब हम प्यास बुझाये!

(सभी खुश होकर नाचते हैं। धीरे-धीरे मंच पर अंधेरा घिरने लगता है और सिर्फ बिजली के गर्जना के साथ बारिश के बरसने की गूंज रह जाती है।)


- शैलेन्द्र सरस्वती
 
रचनाकार परिचय
शैलेन्द्र सरस्वती

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