Hastaksher
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
दिसम्बर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्याँकन
अश्वत्थामा, यातना का अमरत्व
- पूर्णिमा शर्मा
 
 
अनघा जोगलेकर जी की पुस्तक मुझे 13 जून की शाम को मिली और 14-15 जून मेरे पतिदेव उसे लेकर बड़ी तन्मयता से पढ़ते रहे। मेरी जानकारी में पिछले कई वर्षों से उन्होंने शायद ही कोई पुस्तक इतनी तन्मयता से पढ़ी हो। मेरे हाथ यह 16 जून को लगी। जब मैंने राजगोपालाचार्य जी की महाभारत पढ़ी थी और बाद में बी आर चोपड़ा द्वारा निर्देशित 'महाभारत' सीरियल देखा, तब से अब तक मुझे अश्वत्थामा के चरित्र से घृणा ही रही और कभी उसके दृटिकोण से उसके पक्ष को जानने की न तो इच्छा हुई और न ज़रूरत महसूस हुई यद्यपि महाभारत के अन्य सभी चरित्रों के लिए जानना दिलचस्प लगा था।
 
पतिदेव की एकग्रता देखकर विस्मित थी। उसके बाद कपिल शास्त्री जी एवं डॉ. कुमार सम्भव की समीक्षा से इस पुस्तक को पढ़ने की और अश्वत्थामा को करीब से जानने की उत्सुकता हुई तो 17 जून को किताब हाथ में ली। जैसे-जैसे पढ़ती गयी; मुझे चरित्र समझ में आने लगा। हर कार्य के पीछे कारण अवश्य होता है। कोई भी इंसान जन्म से न बहुत अच्छा होता है और न बुरा। उसका वातावरण, माता-पिता की आर्थिक और सामाजिक स्थिति, उसकी परवरिश, उसके मित्र उसको मिलने वाली शिक्षा, उसके शिक्षक, माता-पिता का, उसके मित्रों का उसके साथ व्यवहार सभी कारकों के प्रभाव से उस बालक का चरित्र निर्माण होता है।
 
पिता द्रोणाचार्य, जो गरीबी में निस्वार्थ नि:शुल्क शिक्षा देते रहे और घर में बालक को पीने को गोरस उपलब्ध नहीं था, बालक के माँगने पर कैसे माँ कृपी आटे को पानी में घोलकर उसे बहलाती हैं और उनके द्वारा पहली और आखिरी बार द्रोणाचार्य को उपालम्भ दिए जाने पर वो अपने गुरुभाई और बाल सखा द्रुपद के पास धन सम्मान हेतु जाते हैं और द्रुपद कैसे उन्हें अपमानित करता है, जिससे उनकी आसक्ति धन और शक्ति के लिए बढ़ती जाती है और किस प्रकार पद और सम्मान मिलने पर उनमे अहंकार भाव पनपने लगता है कि वह अपने कर्तव्यच्युत हो एकलव्य व कर्ण को शिक्षा देने से मना करते हैं। एकलव्य से अंगूठा और राजपुत्रों से द्रुपद को बंदी बनाने की गुरुदक्षिणा माँग बैठना आदि प्रसंग बालक से युवा होते अश्वत्थामा के मन पर गहरा असर डालता है।
 
पिता का प्रिय होने के बावजूद उसे शिक्षा न देना, अर्जुन के लिए अतिरिक्त प्रेम उस बालक को शुरू से पांडवों से नफ़रत और दुर्योधन व कर्ण के समीप करता जाता है। महाभारत के युद्ध में पांडवों के छल द्वारा पिता को मारने से अश्वत्थामा क्रोध के अतिरेक से भर उठता है और यह क्रोध उसके विवेक को हर लेता है अंत में अपने पिता का कटा शीश और दुर्योधन की फटी जाँघ बस उसे दिखाई देती है और वह सोते हुए पांडवों की हत्या के साथ ही सुभद्रा की कोख के भ्रूण पर ब्रम्हास्त्र चला कर श्री कृष्ण के कोप का भागी होकर अमरत्व का श्राप पा; वन-वन कोढ़ी तन लिए भटक रहा है। उसके घावों से लगातार पीव और मवाद बहता रहता है, जिसकी दुर्गंध पूरे वन में इस कदर फैली रहती है कि लोग दूर से ही किनारा कर जाते हैं। लघु उपन्यास के सूत्रधार शारण देव पूरी कथा जानने को उत्सुक होते हुए भी कई बार दुर्गन्ध और उसके पीव-रक्त से साणे शरीर को देख वमन कर देते हैं। 
 
शारण देव ही नहीं बल्कि कई बार पढ़ते हुए मैं इस कदर डूब गयी, दुर्गन्ध न होते हुए भी मेरी इच्छा वमन की हुई, किन्तु पूरी किताब पढ़ने के बाद मेरी अश्वत्थामा से घृणा कम और नियति पर विश्वास बढ़ गया। हानि लाभ, जीवन मरण, यश-अपयश विधि हाथ।"
लेखिका ने पाठक के मन में उपजते प्रश्नो के उत्तर/ सम्भावना भी साथ-साथ दी हैं। कुल मिलाकर महाभारत से मिलती सीख और चेतावनी जानने के लिए सभी को एक बार अवश्य पढ़ने की सलाह दूँगी। अनघा की लेखन शैली ग़जब की है। वीभत्स रस से परिपूर्ण उपन्यासिका को भी अगर एक बार पढ़ने के लिए उठाएंगे तो कदाचित पूरा पढ़े बिना छोड़ नहीं सकेंगे; यह मैं दावे से कह सकती हूँ।
 
'अश्वत्थामा..... यातना का अमरत्व की सफलता व आगामी लेखकीय प्रस्तुति के लिए अग्रिम शुभकामनाएँ मेरी ओर से।
 
 
 
 
 
समीक्ष्य पुस्तक- अश्वत्थामा: यातना का अमरत्व
प्रकाशक- उद्वेली बुक्स, मुम्बई
पृष्ठ- 150
मूल्य- 200  रूपये

- पूर्णिमा शर्मा
 
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आवरण: प्रीति अज्ञात

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