Hastaksher
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जुलाई 2017
अंक -28

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संपादकीय
हम चुप क्यों हैं?
 
सोशल साइट्स पर दृष्टिपात किया जाए तो पचास प्रतिशत लोग, अपने धर्म का बड़प्पन और दूसरे पर चोट करते ही दिखाई देते हैं। इनकी ज़हर उगलती पोस्ट मस्तिष्क को बार-बार इस प्रश्न से मथती है कि आख़िर 'धर्म निरपेक्ष राष्ट्र' की परिभाषा क्या है और यदि लिखी हुई परिभाषाएँ सत्य हैं तो इन तमाम लोगों को 'राष्ट्रद्रोही' क्यों नहीं माना जाता? किस अधिकार से ये अपने ही देश के नागरिकों को अपमानित करते आए हैं? वो भी उस धर्म के लिए जो इन्हें जन्म के साथ स्वत: ही मिल गया और जिसे पाने में इनका कोई व्यक्तिगत योगदान या प्रयास नहीं रहा। इनका कर्त्तव्य बनता है कि ये अपने धर्म को मलीन करने की बजाय सम्पूर्ण देश की सभ्यता और संस्कृति का संरक्षण करें.....वो सभ्यता जो पाशविकता के कुटिल हाथों दिन-प्रतिदिन आहत होती आ रही है, वो संस्कृति जिसकी दुहाई सम्पूर्ण विश्व देता आया है। वो गौरव, जिसकी चर्चा हम पीढ़ियों से सुनते आए हैं।
 
हमें बुराइयों से लड़ना है, परस्पर नहीं!
हमें अपना घर स्वच्छ रखना है, पर इसका अर्थ यह नहीं कि कचरा पड़ोस में उछाल दिया जाए।
मात्र अपने घर की ही नहीं, राष्ट्र की बेटियों की इज़्ज़त करना भी पुरुष को सिखाना होगा।
छेड़खानी की सज़ा ही फांसी हो, हम अपराध के सारी हदें पार कर लेने की प्रतीक्षा क्यों करते हैं?
दुःख यह भी है कि उसके बाद भी क्या करते हैं?
स्त्रियों को घर बैठने की सलाह देने वाले पुरुष स्वयं घर क्यों नहीं बैठ जाते? फिर जो कुत्सित मानसिकता वाले पुरुष हैं, क्या वो घर बैठी स्त्रियों, बच्चों को छोड़ देते हैं? नहीं साहेब, इन्हें देह से मतलब है फिर चाहे वो इनकी बहिन हो, माँ या बेटी।
अब तो इन विषयों पर लिखते-लिखते मन भी हार चुका है। घिन आने लगी है। लेकिन कानून की लचरता और कच्छप गति की आड़ में अपराधी अब भी बे-ख़ौफ़ घूमता है।
 
'गौ रक्षा' के समर्थन में किसी इंसान की हत्या कर देना, क्या उन तथाकथित रक्षकों की 'संवेदनशीलता' दर्शाता है?
जिनकी संवेदनाएँ मृत हों क्या वे किसी और के प्रति सहृदय हो सकते हैं?
क्या उन्हें सचमुच किसी की जान की रक्षा करनी थी?
या अपने 'जानवर' होने का पुख़्ता प्रमाण देना था?
उत्तर कोई भी आए....फ़र्क़ पड़ेगा क्या?
दरअस्ल हमें संवेदनशीलता को लाश की बोरी की तरह ढोने की आदत हो गई है। एक पुलिस ऑफिसर जो अपनी पूरी निष्ठा और कर्त्तव्यपरायणता के साथ लोगों की रक्षा के लिए तैनात है, वो अपनी सिक्योरिटी यह कहकर हटवा देता है कि "मैं अपने ही लोगों के बीच हूँ" और फिर वही 'अपने' भीड़ का मुँह ओढ़े उसे लाश में तब्दील कर देते हैं। ये सिर्फ़ इंसान ही नहीं, उसके विश्वास की भी हत्या है। इस दुर्दांत व्यवहार के साथ ही उस भीड़ ने भी अपने मुँह पर कालिख़ पोत ली है कि वो इस लायक़ ही नहीं कि उन्हें कोई सुरक्षा दी जाए!
 
'भीड़' की सबसे बड़ी दिक़्क़त यह है कि उसका कोई चेहरा नहीं होता, कोई नाम नहीं होता, कोई पहचान नहीं होती, कोई सबूत न ग़वाह! यहाँ तक कि पीड़ित स्वयं भी उन्हें नहीं पहचान सकेगा!
ये 'भीड़तंत्र' है! यहाँ सौ चेहरों का वहशीपन, उनकी कुटिल सोच और घृणित मानसिकता चौ-तरफ़ा वार करती है और एक ही झटके में इंसानियत और समूचा न्याय-तंत्र, अत्यंत लाचार हो धराशाई नज़र आता है।
 
ट्रेन में एक नवयुवक को मारकर फेंक दिया जाता है और किसी ने कुछ देखा ही नहीं! ये उन्हीं अंधों की भीड़ है, जिसमें से किसी का सामान बर्थ के नीचे रखने में उस युवक ने मदद की होगी! किसी का चार्जर लगाया होगा! किसी के साथ अपनी सीट एडजस्ट की होगी! कइयों के साथ कुछ मुस्कानें भी अवश्य ही बाँटी होंगी। अचानक सभी घटनास्थल से लुप्त हो गए। क्यों हुए होंगे, भला? कहाँ गए वो दिन, जब ट्रेन में भी एक परिवार हुआ करता था!
 
दुर्भाग्य यह है कि कोई भीड़ चुप है और कोई भक्षक बन खड़ी है। इन्हें माँस दिखता है तो ये उसकी बिक्री बंद क्यों नहीं करवा पाते? लाइसेंस देने वालों को क्यों नहीं रोक पाते? ये कौन और कैसे तय कर पाता है कि लाया गया गोश्त वैध बूचड़खाने का था या अवैध? इसे खाने वाले तो सभी धर्म के लोग हैं तो फिर एक विशेष धर्म के प्रति ही विरोध के स्वर क्यों मुख़रित होते हैं? और सिर्फ़ गाय ही क्यों, बाकी पशु-पक्षियों के प्रति इनकी कोई संवेदना नहीं उपजती?
 
मुझे पूरा यक़ीन है कि चाहे गौ रक्षा के नाम पर हत्या का मामला हो या बीफ़ के भरम से उपजा नरसंहार, कश्मीर का वो जांबाज़ पुलिस ऑफिसर हो या ट्रेन में सवार यह लड़का.....इन सब घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी भीतर-ही-भीतर कसमसा रहे होंगे! इनकी आत्मा इन्हें रोज़ कचोटती होगी....इन दिनों शायद इनके गले से निवाला भी ठीक से न उतर पाता हो! पर ये क्या बोलें? किससे बोलें और क्यों बोलें? बोलने से आज तक हुआ क्या है? सारी उम्र अदालतों के चक्कर काटते रहो, धमकी भरे फ़ोन उठाते रहो, हर समय भयभीत होकर चलो या फिर पारिवारिक विवशता और गुलाबी कागज़ के लालच में बयान बदल लो! न्याय तो फिर भी बाट जोहता ही नज़र आएगा।
पहले न्याय मिलने की उम्मीद तो हो.....बात उसके बाद ही आगे बढ़ेगी! आख़िर सबको अपनी जान प्यारी होती है। एक भय है, जो साथ चलता है!
 
प्रश्न यह नहीं कि हम चुप क्यों हैं?...प्रश्न यह भी है कि बोलने से हमारा जो नुक़सान होता आया है! फिर उसकी भरपाई कौन कर पाता है?

- प्रीति अज्ञात

इस अंक में ......

आवरण: अजय सिंह राणा असर

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