Hastaksher
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अक्टूबर 2016
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संपादकीय
आओ,रतजगा मनाएं
 

हमारी संस्कृति में त्योहार इतने योजनाबद्ध तरीके से रचे-बसे हुए हैं कि हम प्रत्येक माह और हर ऋतु में इनका भरपूर आनंद उठा सकते हैं। हरेक उत्सव का अपना एक संदेश, मनाने का विविध तरीका होता है, पर मूल बात यही है कि हर्षोल्लास से परिपूर्ण ये उत्सव मात्र आनंद और मनोरंजन का साधन ही नहीं बल्कि जनमानस में नवजीवन का संचार करने में भी सहायक सिद्ध होते हैं लोगों को ताज़गी, स्फूर्ति और प्रेरणा मिलती है। जातीयता, प्रांतीयता की कमज़ोर दीवारें स्वत: ही ढह जाती हैं। आपसी वैमनस्य, ईर्ष्या, द्वेष दूर हो उठते हैं और दिलों में सहयोग और भाईचारे की भावना उत्पन्न होती है। राष्ट्रीय त्योहार हमें अन्याय और अत्याचारों से लड़कर देश में न्याय और शांति स्थापना का उत्तम संदेश देते हैं, तो इनमें कहीं त्याग और तपस्या से जीवन को स्वर्णिम बनाने का अचूक उपाय भी निहित होता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह प्रेरणा हमारे मन-मस्तिष्क में टिकती कब तक है? कहीं यह केवल निर्धारित दिन तक ही तो सीमित नहीं रह जाती
 
दीपावली प्रतीक है, अंधकार पर प्रकाश, असत्य पर सत्य की विजय का। इसके आगमन के पूर्व ही घरों में सफ़ाई और सजावट का कार्य प्रारंभ हो उठता है, ताकि इस दिन तक हमारा घर जगमग रोशनी से भर उठे। तरह-तरह से घर को प्रकाशवान किया जाता है, आतिशबाज़ी होती है, नये कपड़े खरीदते हैं और अनगिनत व्यंजन भी बनाए जाते हैं। सभी का खुशी मनाने का अपना एक अलग तरीका होता है। पर कितना अच्छा हो, यदि हम अपनी दीवाली में एक ग़रीब परिवार को भी शामिल कर लें, उनके चेहरे पर भी वही हँसी बिखेर दें, जो हमारे अपनों के चेहरों पर हैं। क्यूँ न एक वक़्त का भोजन उनके साथ भी किया जाए। फिर देखिए आपके घर, परिवार और दिलों की रौनक कुछ और ही होगी।

            घर से मस्ज़िद है बहुत दूर, चलो यूँ कर लें
            किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए   - निदा फ़ाज़ली
 
घर की सफ़ाई के साथ-साथ यदि मन भी साफ़ कर लिया जाए, तो क्या बात! सारी परेशानियों की जड़ ये मन ही तो है, जो किसी के प्रति हमारी भावनाओं को पल में ही बदल देता है। किसी अपने से हुई दूरी को मिटाने के लिए, आगे बढ़कर उन्हें गले लगाने के लिए.....होली या ईद पर ही क्यों आश्रित रहा जाए, रोशनी तो हर दिशा में फैलानी है, दीपावली हो या न हो! सफाई भी केवल ये नहीं कि घर की गंदगी उठाकर बाहर फेंक दी, सार्वजनिक स्थलों, हमारी सड़कों इन सब की सफ़ाई में हमारा उतना ही योगदान आवश्यक है। माँग करनी है, तो ज़्यादा कूड़ेदान रखने की करो, सिर्फ़ यह कह देने से काम नहीं चलता, कि कहाँ फेंकें? एक थैले में भरते जाइये और कूड़ेदान मिलते ही उसमें डाल दीजिए टोकिए हर उस इंसान को, जो गंदगी फैला रहा है लड़ना है तो आपस में नहीं; मिलकर लड़िए भ्रष्टाचार, ग़रीबी, बेरोज़गारी के रावण से। उखाड़ फेंकें, इन्हें जड़ों से आपस में स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता रखें, ईर्ष्या नहीं देशभक्ति और देशप्रेम के लिए तीन राष्ट्रीय त्योहारों पर ही निर्भर नहीं रहा जा सकता, ये जज़्बा हर वक़्त धड़कनों में जवां रहे राष्ट्र के पतन में नहीं, उन्नति में सहायक बनें
 
दिलों की रोशनी से सबका आँगन और हृदय आलोकित कर दें सामाजिक जीवन को एक नई ज्योति दें छल, कपट, असत्य, अन्याय और समाज में व्याप्त सभी बुराइयों की अग्नि को बुझाकर, राख बना गंगा में प्रवाहित कर दें सबको नूतन वर्ष के कर्त्तव्यों को पूरा करने का संबल दें, सबकी खुशी का हिस्सा बनें, अपनी अप्रतिम मुस्कान से सबका मन आह्लादित कर दें
जगमगाते पर्व की रोशनी बिखेरती,आरा (बिहार) के रचनाकार मित्र, सिद्धार्थ वल्लभ जी की इन ख़ूबसूरत पंक्तियों के साथ दीपावली की अपार शुभकामनाएँ-
 
ये रौशन रात
ये बजती शहनाई
ये दिल धड़कने का सबब
ये लरजती अंगड़ाई
ये वक़्त की पलकों का
शरबती रंग
ये धड़कनों में शामिल
महकती नज़्म
ये मदहोश फ़िज़ा
ये शाम-ए-दिवाली
आओ यारा....!
आओ के रतजगा मनाएं !!

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चलते-चलते: चलते-चलते, भारतीय सेना को प्यार भरा सलाम, शुक्रिया और शुभकामनाएँ। सर्जिकल स्ट्राइक्स को लेकर जो कुछ हो रहा, वह घोर निंदनीय है। देश सर्वोपरि है और कुछ बातें राजनीति से परे होती हैं। राजनीतिक लाभ के उद्देश्य से न तो हर बात का श्रेय लूटने की आवश्यकता होती है और न ही किसी अनर्गल कथ्य को तूल देने की। ये हमारी ही ज़िम्मेदारी है कि हम दुनिया के सामने अपने देश की कैसी छवि प्रस्तुत करते हैं। घरेलू मुद्दों या समस्या की चर्चा, घर की चहारदीवारी के भीतर ही हो तो बेहतर!

जहाँ तक युद्ध का सवाल है तो यह समस्या से जूझने का अंतिम विकल्प हो सकता है पर समाधान नहीं! युद्ध ने किसका भला किया है कभी! कोई जीते, कोई हारे.....बच्चे दोनों तरफ अनाथ होते हैं, घर दोनों के उजड़ते हैं, चूल्हा दोनों तरफ नहीं जलता, पीड़ा एक-सी ही होती है।
किसी अन्य देश के उत्पाद का बहिष्कार करना भी, अपने ही परिवार की रोटी छीनने जैसा है। बंद करना ही है तो आयात बंद हो। जिसने अपनी मेहनत की कमाई से उन उत्पादों को क्रय कर दुकान पर विक्रय के लिए रखा, उसके लिए ज़रुरी है कि पूरा माल बिके। हम भारतीयों को क्रोध, जोश में अपने होश सँभालने होंगे। जय भारत!

- प्रीति अज्ञात

इस अंक में ......

आवरण चित्र: प्रीति अज्ञात

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