Hastaksher

फरवरी 2020
अंक - 57 | कुल अंक - 57
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

हर प्रेम को सिद्ध नहीं करना होता है!
हर प्रेम को सिद्ध नहीं करना होता है!
 
इन दिनों आप जिस भी दिशा में दृष्टिपात करेंगे, आपकी आँखों में निराशा की झलक ही लौटकर आएगी। हृदय उस उदासी का साक्षी बनेगा जो आशाओं के तिलिस्म से बाहर आ और भी गहराती चली जाती है। समाज की बदलती तस्वीर पर अब गर्व नहीं होता बल्कि मस्तक शर्मिंदगी से झुक जाता है। यह वही देश है जो विश्वगुरु की राह पर चलने का दावा करता है। यह वही देश है जो कभी सोने की चिड़िया कहा जाता था। यह वही देश है जिसकी सभ्यता और संस्कृति की दुहाई विश्वभर में सदियों से दी जाती रही है। तमाम विविधताओं के मध्य भी यहाँ की एकता, अखंडता और धर्मनिरपेक्षता का उजला चेहरा सदैव ही चमचमाता रहा है। दुःख और क्षोभ का विषय है कि हमारे अपने इसी देश में प्रेम के सुर्ख़ महीने में प्रेम ही लापता है। जहाँ वातावरण गुलाब की सुगंध से मन-मस्तिष्क को सुवासित कर देता है, शांति और अहिंसा की प्रतिमूर्ति बने उसी देश में, उसी की कनपटी पर बंदूक रख हिंसा का सामान्यीकरण होता जा रहा है। 
 
इन मुट्ठी भर लोगों को यह समझना होगा कि हम देशवासियों में वो प्रेम अब भी जीवित है जो सबको जोड़ता आया है। हम उस संस्कृति के पूजक हैं जिसने हमें अपने सभी त्योहारों से बाँधे रखा है। होली, दीपावली, ईद, क्रिसमस, लोहड़ी, नवरोज, गुरुपर्व या कोई भी त्योहार हो; हम एक सच्चे भारतीय की तरह उसे सबके साथ मनाते हैं।
उत्सवों ने हमें केवल उमंग और उल्लास भरे पल ही नहीं दिए बल्कि प्रेम के उस वृहद रूप से भी मिलवाया है जो मनुष्यता जीवित रखता है, मानव को मानव होने का मूलमंत्र देता है, भाईचारा बनाये रखता है।
 
हमारी भारतीयता उन दिनों की ऋणी है जिसने हममें मानवता के बीज बोए, जिसने सिखाया कि हम सब एक ही हैं, हाड़माँस के बने वो इंसान जिनके लहू का रंग भिन्न वस्त्र पहन लेने या भोजन बदल जाने से रत्ती भर भी परिवर्तित नहीं होता। हमारी मुस्कानें एक हैं, हमारे दुःख एक हैं, हमारी शिक़ायतें और कर्तव्य भी एक ही हैं। हमें उन चंद लोगों की बातों को अस्वीकृत करना होगा जो हमारी भारतीयता का हिन्दू-मुस्लिमीकरण करने में लगे हैं। यह देश हम सबका है और ये बात हमारे जन्म के समय से सिद्ध है। इसे तय करने का हक़ किसी और का कभी नहीं हो सकता! इस देश की माटी में हमारे बचपन की साँसें घुली हुई हैं। हमारा जीवन इस देश की आबोहवा का ग़ुलाम है। हमने इस धरती पर उम्मीदों के बीज बोये हैं, इसके आसमान पर हमारी चाहतों का चाँद उगाया है। यहाँ के पक्षियों से हमने अपने स्वप्न साझा किये हैं। पहाड़ों पर जा इस सुन्दर धरा को सौ-सौ बार नमन किया, इसे अपना कह पुकारा। हम इस ज़मीन को चूमकर दिन का प्रारम्भ करते हैं। यहाँ की नदियों में हमारी सरसराती उमंगों की नाव बहती है। हमारी प्रत्येक श्वाँस जिसके जंगलों, पठारों, प्राकृतिक छटा के प्रेम में रची-बसी है; उसे सिद्ध करने के लिए किसी काग़ज़ की नहीं बल्कि महसूसने के लिए मात्र एक निश्छल ह्रदय की दरक़ार है। यही हम भारतीयों का प्रेम है, यही हमारा देशप्रेम है जो स्वार्थ और थोथे दिखावे के हर भाव से हजारों गुना ऊपर है।
 
हम प्रकृति के कण-कण से प्रेम करने वाले पूर्वजों की संतान हैं। हम ये भी जानते समझते हैं कि हम किसी भी घर में जन्म ले सकते थे, कोई और भी हो सकते थे इसलिए हमने किसी का धर्म-जाति न देख केवल मनुष्यता को चुना। हमारे प्रेम की यही परिभाषा है जो दुर्भाग्य से उन नेताओं की परिभाषा से मेल नहीं खाती जो राष्ट्रप्रेम की बातें तो ख़ूब करते हैं पर उसे समझते नहीं। या यूँ कहें कि वे चाहते ही नहीं कि हम सब इसे समझ सकें। हमें एक क्षण को भी नहीं भूलना चाहिए कि जो लड़ाने की बात करे, दो इंसानों के बीच खाई पैदा करे, आपको भारतीय न कहकर हिन्दू-मुस्लिम करे वह मानवता का कट्टर दुश्मन है। 
हमें ख़तरा केवल आततायियों से ही नहीं है बल्कि बढ़ते अपराधों के प्रति हमारी सहजता भी इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रही है। देश की ही संपत्ति को नष्ट करके, निर्दोषों पर हमले कर 'देशभक्ति' की नई परिभाषाएँ गढ़ी जा रही हैं। कैमरे पर क़ैद अपराधियों को कभी कोई भय रहा ही नहीं। वे जानते हैं उनके आक़ा उन्हें बचा ही लेंगे। ऐसे लोग स्वहित के लिए जी रहे हैं इन्हें न आपसे प्रेम है, न देश से। यथाशीघ्र इनको प्रेम सहित नमस्कार कर दूरी बना लें। हमारे लिए किसी भी व्यक्ति विशेष से पहले हमारा देश है।  
हमारी भाषा, प्रेम की ही भाषा है जिसे हमारे दिल से कोई जुदा नहीं कर सकता! और हाँ, हर प्रेम को सिद्ध नहीं करना होता है!
जय भारत!

- प्रीति अज्ञात

इस अंक में ......

आवरण: के. पी. अनमोल

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विमर्श
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जो दिल कहे
मूल्यांकन
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ख़बरनामा
हाइकु
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ज़रा सोचिए!
'अच्छा' भी होता है!
संस्मरण
यात्रा वृत्तांत
फ़िल्म समीक्षा
जयतु संस्कृतम्
धारावाहिक
कर्मभूमि-अहमदाबाद
कथेतर