Hastaksher
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जुलाई 2019
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

भागती हुई लडकियाँ
भागती हुई लडकियाँ
 
इस दौर की सबसे बड़ी समस्या यह है कि एक घटना घटी नहीं कि आम आदमी से लेकर समस्त मीडिया जगत न्यायाधीश की कुर्सी पर विराजमान हो जाता है। उस पर प्रेमी युगल के घर से भागने का किस्सा हो तो अंधाधुंध विचारों के शुष्क अंधड़ चलने लगते हैं। हमारी सामाजिक व्यवस्थानुसार यह भी लगभग तय ही है कि इस स्थिति में सारी लानतें-मलानतें लड़की के हिस्से में ही आयेंगी। तथाकथित इज़्ज़त भी उसी के परिवार की जायेगी और बदनामी के सारे दाग़ उस घर की दीवारों पर सदा के लिए छप जायेंगे! पिता भी उसी घर का आहत होगा और माँ भी मारे शर्म के घर से निकलना बंद कर देगी। लड़कों की तो कोई इज़्ज़त होती ही कहाँ है! उन्हें तो इज़्ज़त उछालने का हुनर आता है। बंदूक की नाल कनपटी पर टिका; इसे लूटने की कला में माहिर हैं वो, इसका वीडियो बना जब चाहे आपको धमकाकर, बरबाद कर सकते हैं। इसी से तो उनका पुरुषत्व सार्थक कहलाता है। जिसकी जितनी प्रेमिकाएँ, उतना ही महान पुरुष! ऐसे लोग एक दिन लवगुरु भी बन जाते हैं जबकि भागी या भगाई हुई लड़की के हिस्से दुनिया भर की बद्दुआएँ आती हैं और उसके चरित्र की छीछालेदर भी जमकर की जाती है। 
 
वे लोग जो एक रात अचानक ही बिन कहे घर से विलुप्त हो जाते हैं, न जाने उससे पहले कितनी रातों तक सच को कहने की हिम्मत जुटाते होंगे और हर बार एक झिड़की उस सच का दम तोड़ देती होगी! वे लोग जो किसी आकर्षण भर को प्यार समझ लेने की भूल कर बैठते हैं वे प्यार की झलक को इक उम्र तलक तरसते रहे होंगे और किसी के कंधे पर हाथ रखते ही उनका दर्द पिघलने लगता होगा! प्यार आख़िर है क्या? सुख-दुःख को समझने वाला एक साथी, संग हँसने-रोने वाला एक चेहरा, सफलताओं पर ख़ुशी से झूमता और विफलताओं पर हिम्मत बँधाता एक ऐसा इंसान कि समय के साथ-साथ जिसका स्पर्श भी सुहाना लगता है क्योंकि उसमें स्नेह है, परवाह है, उम्मीद है। सबको इसी दुर्लभ अपने की ही तलाश तो है। भले ही फिर ये बाद में भरम निकले और जीवन पर्यन्त कचोटता रहे!
वे बच्चे जिन्हें अपने घरों में अपने मन की हर बात कह देने का सुख प्राप्त है और जो अपने बड़ों से भयभीत नहीं, वे कभी नहीं भटकते! कभी हार भी गए तो जानते हैं कि उनके घर के दरवाजे उनके लिए सदा खुले हैं और एक हार उनके व्यक्तित्त्व का दर्पण नहीं होती! यह विश्वास हर घर की आबोहवा में बसना आवश्यक है। 
 
अधिकांश घटनाओं में माता-पिता भी खलनायक नहीं होते लेकिन जब कोई नामी हस्ती या राजनीति से जुड़ा व्यक्ति हो तो उनकी प्रतिष्ठा पर आँच आने का ख़तरा मँडराने लगता है। क्या करें जी! सामाजिक ढाँचा ही ऐसा है जिसमें 'लोग क्या कहेंगे' के आधार पर ही जीवन-मरण के समस्त फ़ैसले एक क्षण में हो जाया करते हैं।
आज भी हमारे देश में माता-पिता ही बच्चों के लिए जीवनसाथी चुनना पसंद करते हैं। शायद ही कहीं और ऐसा होता होगा। कुछ इतने कट्टर विचारों वाले भी होते हैं जो अपनी लड़की की या उसके पसंदीदा लड़के की लाश के ऊपर अपनी जीत की पताका फहराते स्वयं को ही सलामी देते हैं। जबकि उनकी यह जीत पितृत्व की शर्मनाक हार होती है। यूँ धोखेबाज़ प्रेमियों की रंगीन मिजाजियों के किस्से भी कम नहीं हैं।
 
रिश्तों को इतना नाजुक न बनायें कि जरा सी लचक से टूट जाएँ और न ही इज़्ज़त कोई ताश के पत्तों की खड़ी इमारत है जो दहलीज़ के पार करते ही ढह जाए! एक उम्र के बाद बच्चों को निडर हो अपने निर्णय लेने की स्वतंत्रता दे देनी चाहिए। जहाँ विश्वास होता है वहाँ गलतियाँ भी कम होती हैं क्योंकि महत्त्वपूर्ण अवसरों पर वे आपकी राय लेने से  कभी नहीं चूकते। यूँ भी एक गलती उनके सम्पूर्ण जीवन को परिभाषित नहीं कर सकती! व्यक्ति अपने अनुभवों से बेहतर सीखता है। ये परिवार की इज़्ज़त, नाक सब निरर्थक उपजाए गए हौए हैं जो किसी भूत की तरह मस्तिष्क पर चिपका दिए गए हैं और उस पर आग्रह ये कि 'डरना जरुरी है!'
भयमुक्त समाज की बाट जोहने से पहले हमें भयमुक्त परिवार की संकल्पना साकार करनी होगी। 'सबका साथ, सबका विकास' का नारा घर से शुरू हो तो कुछ बात बने! 
 
इधर जब देश किसी युगल के भागने पर रायचंद बना हुआ था उसी समय कहीं कुछ और लडकियाँ भी फ़र्राटे से दौड़ सोना बटोर रहीं थीं। हमारी हिमा दास, दूती चंद, विनेश फोगाट एवं कई अन्य पुरुष खिलाड़ियों ने जीत का जो डंका बजाया, उस पर हर भारतीय को गर्व होना चाहिए। इन्होंने यह भी सिखाया कि पर्याप्त संसाधनों एवं धन के न होते हुए भी सफ़लता के झंडे गाड़े जा सकते हैं। मेहनत और समर्पण से हर दौड़ जीती जा सकती है और किसी को भी जोरदार पटखनी दी जा सकती है। हम क्रिकेट के लिए पगलाए देशवासियों और उन पर करोड़ों लुटाते खेल मंत्रालय को हमारे एथलीट एवं अन्य खेलों से जुड़े खिलाड़ियों को भी वही प्रोत्साहन एवं सुख-सुविधायें देनी होंगी जिससे वे वर्षों वंचित रहे हैं। खेलों के ग्लैमराइजेशन के चलते बस चुनिंदा नाम ही याद रह जाते हैं जबकि देश की आन, बान और शान के क़सीदे पढ़ने को अन्य खेलों के खिलाड़ियों की एक लम्बी सूची कब की तैयार हो चुकी है। 
 
बीते दिनों केरल की IPS ऑफिसर मेरिन जोसेफ ने बलात्कार के आरोपी को सऊदी अरब से पकड़ लाने में जो सफ़लता प्राप्त की है यह उन सभी नेताओं के मुँह पर एक तमाचा है जो इसे छोटी घटनाएँ कह आगे बढ़ लेते हैं।
सीतामढ़ी के सिंहवाहिनी पंचायत की मुखिया ऋतु जायसवाल का ज़िक्र भी यहाँ आवश्यक है जो हेलीकाप्टर से बाढ़ पीड़ितों का दर्द देखने की बजाय स्वयं पानी में उतर उसे महसूसती हैं। इनकी संवेदनाएँ थोथी नहीं बल्कि दुःख की जीती जागती तस्वीर हैं और आँसू उस विवशता की तस्वीर हैं जो तंत्र में फँसे होने पर उभरती है। लेकिन अपने दम पर ये जो कार्य कर रही हैं उसे करने की हिम्मत किसी क़द्दावर नेता में भी देखने को नहीं मिलती।
  
विश्व स्तरीय चैंपियनशिप में 100 मीटर फर्राटा गोल्ड जीतने वाली दुती चंद जब भावुक पलों में यह कहती हैं कि "मुझे नीचे खींचो, मैं और भी मजबूती से वापसी करुँगी। Pull me down, I will come back stronger!" तब वे केवल अपनी ही नहीं बल्कि देश भर की तमाम स्त्रियों की आवाज बन उठती हैं जो भीतर-ही-भीतर साहस बटोर रहीं हैं। वे उनकी प्रेरणा भी बनती हैं जो स्वयं से हार मान निढाल बैठ चुकी हैं। वे उनका दृढ़ निश्चय भी बनती हैं जिन्होंने अभी-अभी अपने जीवन का महत्त्वपूर्ण निर्णय लिया है। 
ऐसी भागती हुई लड़कियों को मेरा सौ-सौ बार सलाम!

- प्रीति अज्ञात

इस अंक में ......

आवरण: सौम्या

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