Hastaksher
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
फरवरी-मार्च 2019 (संयुक्तांक)
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

देश सर्वोपरि है
देश सर्वोपरि है।
 
पुलवामा में हमारे अर्धसैनिक बलों पर जो निंदनीय और घृणित  हमला हुआ और उसके बाद जिस तरह घटनाक्रम करवटें लेता रहा, तस्वीरें और परिस्थितियाँ धूप -छाँव का खेल खेलती रहीं; उसने हमारे देशवासियों को सारे मुद्दे भुलाकर देशहित में एक साथ खड़ा कर दिया। जहाँ एक ओर हमारे जवानों के वीरगति प्राप्त करने की अथाह पीड़ा थी, वहीं थोड़े दिनों बाद ही पाकिस्तान में बने आतंक के ठिकानों को नष्ट किये जाने ने कुछ पलों के लिए जोश और उत्साह से भी भर दिया था। यद्यपि यह प्रसन्नता क्षणिक ही रही, जब पता चला कि  भारतीय वायुसेना के विंग कमांडर अभिनन्दन पाकिस्तानी कब्ज़े में हैं। अब अभिनन्दन की सकुशल घर वापिसी ने देश की अटकी हुई साँसों को थोड़ी गति अवश्य प्रदान की है। अटारी बॉर्डर पर उनके स्वागत के लिए सुबह से ही लोग जमा थे और शेष सभी अपने टीवी सेट से चिपके हुए इन सुन्दर पलों के साक्षी बनना चाहते थे जब हमारा अभिनन्दन सीना ताने हुए अपनी धरती पर पुनः क़दम रखेगा। अभिनन्दन के अदम्य साहस पर हम सभी को गर्व है। उनके किस्से आने वाली पीढ़ियाँ भी सुनेंगीं।
 
दुखद यह है कि इंसानियत के ढोल पीटते पाकिस्तान द्वारा किये जाने वाले हमलों में कोई कमी नहीं आई है और हमारे वीरों के शहीद होने का क्रम अभी थमा नहीं है। देखना होगा कि अभिनन्दन के घर आने की ख़ुशी अन्य शहादतों के ग़म पर भारी न हो जाए। इससे पहले कि मुद्दे का रुख़ मोड़ दिया जाए हमें उन वीर जवानों के लिए भी प्रश्न करने होंगे! हमारी दिलचस्पी अमर जवानों के स्मारक बनाये जाने से कहीं अधिक हमारे जवानों के जीवित रहने में है। 
 
यह भी सोचना होगा कि युद्ध हमें क्या देता है और इससे किसका भला होता है? घर दोनों तरफ तबाह होते हैं, बदला देने की क़सम दोनों ही लोग खाते हैं, मौके की तलाश और उचित समय पर आक्रमण की योजनाएँ लगातार बनती हैं और सीमाओं पर तनाव बदस्तूर जारी रहता है। वायदों की फूंकनी से राजनीति की रोटियाँ सिकती रहती हैं और एक नाम को पत्थर पर खुदवाकर कर्त्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है लेकिन जिसने अपना कोई खोया है वो उम्र भर इस दुःख से जूझता रहता है। दो माह बाद उस परिवार से न तो देश को वास्ता रहता है और न ही किसी सरकार को। बासी मुद्दे का यहाँ कोई मोल ही नहीं!
विचारणीय है कि क्या नफ़रत की बंजर जमीन पर प्रेम की लहलहाती फ़सल उग सकती है? क्या असभ्य व्यवहार, सभ्यता और सभ्य समाज की नींव बन सकता है? वो प्रक्रिया जो किसी को नष्ट करने का हर संभव प्रयत्न करती है, निर्माण के बीज बो सकती है?
 
परिस्थितियाँ और भी विकट रूप धारण कर लेती हैं जब किसी प्रतिकूल समय में इंसानियत को भुलाकर लोगों के मन में ठूँस-ठूँसकर सांप्रदायिक ज़हर भरा जाने लगता है। यह ज़हर दिमागी संक्रमण की तरह फैलता है और इस हद तक फैलता है कि वे जिन्होंने किसी गलत सोच का साथ नहीं दिया, किसी एक के नाम का जयकारा नहीं लगाया और इस ख़ूनी खेल में तालियाँ पीटकर शाबाशी देने को लालायित भी नहीं रहे; वे सभी देशवासी संदेह की दृष्टि से देखे जाने लगते हैं। ऐसे में यही महसूस होता है कि आपस में लड़ मरने के लिए हमें दुश्मन देश के उकसाने की कोई आवश्यकता नहीं! हम ख़ुद ही काफ़ी हैं। तभी तो विपत्ति और दुःख के हर दौर में भी हम एकजुट होने की बजाय परस्पर दोषारोपण से नहीं चूकते।
 
हमें चाहिए कि संकट की घड़ी में हम अफ़वाहों पर विश्वास न कर अपनी समझ से काम लें और यह भी स्वीकार करें कि हमसे बेहतर जानने वाले और सक्षम वे लोग हैं जो इस क्षेत्र-विशेष से जुड़े हुए हैं। उन पर पूर्ण रूप से भरोसा रखना ही होगा। 
सोशल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में दिखने वाली हर बात को पत्थर की लकीर समझने से बचना भी जरुरी है क्योंकि उनमें से नब्बे प्रतिशत जनमानस में धार्मिक उन्माद पैदा करने और एक वर्ग, दल विशेष के प्रति समर्थन पैदा करने के उद्देश्य से उन्हीं की टीम के द्वारा फैलाई जाती हैं। यह पक्ष/विपक्ष दोनों द्वारा समान रूप से संचालित होता है अतः इनसे दूर रहना ही सुखकारी और देशहित में है।
हमें अपने घर का माहौल संयमित रखने के साथ-साथ बच्चों को भी विषय की गंभीरता और संवेदनशीलता के बारे में बताना होगा क्योंकि उनकी छोटी और ख़ुशहाल दुनिया इस तरह की बातों से बहुत घबरा जाती है। हमें उनको एक सुरक्षित और भयमुक्त वातावरण की निश्चिंतता देनी ही होगी। 
 
एक तथ्य यह भी है कि सच कहने वाला सदैव ही अपने विरोधियों की आँखों में किरकिरी बनकर चुभता रहा है लेकिन उसके साथ गाली गलौज कर, उसे गद्दार का नाम देकर उसकी आवाज दबाने का जो नया चलन चल पड़ा है; वह इन नकारात्मक लोगों को उनके आकाओं की नज़र में तो उठा देगा परंतु ये लोग आने वाली पीढ़ियों के हाथों में जिस तरह का शब्दकोश सौंपकर जायेंगे, वह अत्यंत चिंतनीय है। जिस गंगा जमुनी संस्कृति का परचम हम दुनिया भर में लहराने की बात करते हैं, वह तो भरसक ही ऐसी निकृष्ट शब्द शैली और कुत्सित सोच की पक्षधर कभी नहीं रही।
घृणा की थाली में परोसा घी का लड्डू कुछ चाटुकारों की स्वाद कलिकाओं को उत्साह से भर सकता है, स्वार्थ से लबरेज़ भूख का पेट भी भर सकता है लेकिन आम जनता के हिस्से सिवाय एक कठिन समय के और कुछ नहीं आता! हमारे बच्चों को हम ये किस समाज की परिकल्पना दे रहे है?
कहते हैं कि अच्छा पड़ोसी भाग्य से मिलता है। सच है क्योंकि मुसीबत में सबसे पहले वही काम आता है। उससे बिगाड़ना माने हमेशा के लिए तनाव और चिंता मोल ले लेना! उनके दुर्व्यवहार से क्षुब्ध होकर हम ऊँची दीवारें खड़ी कर उनके चेहरे न देखने की कसमें खा सकते है लेकिन उन मजबूत दीवारों में उम्मीद की रौशनी और सौहार्द्र की झीनी बयार की आवाजाही के लिए एक झिर्री तब भी छोड़ देनी चाहिए कि हमारे बच्चों की गेंद जब कभी उनके पाले में चली जाए और वो कुछ समय बाद ही सही; पर लौटा दें, तो मुस्कान की एक किरण उन तक जरूर पहुँचे।
 
कुछ पलों के लिए राजनीति को ताक पर रखकर देखें तो यदि किसी ने स्वार्थ या विवशता में हमारी सहायता की है तब भी उसको धन्यवाद कहना हमें छोटा नहीं, और बड़ा ही बनाता है। हमारी संस्कृति और सभ्यता ने यही सिखाया है और संस्कृति की रक्षा बड़े-बड़े पोस्टर चिपकाकर या आत्मस्तुति से नहीं होती, उसे व्यवहार में लाना प्रथम नियम है। 
होली का त्योहार आप सबके घरों में ख़ुशी के रंग भर दे और जीवन में मिठास क़ायम रहे। मिठास की इन गुजियों को बनाने वाली हमारी महिलाओं को भी महिला दिवस की अशेष शुभकामनाएँ!
जय भारत!
 
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चलते-चलते: देशहित में क्या सही है, इतनी समझ हर कोई रखता है। यदि किसी के विचार आपके अनुकूल नहीं हैं, तब भी कृपया उसे देशभक्त या देशद्रोही का टैग देने से बचें। 
वैसे भी देशभक्ति कोई बताशा नहीं है कि किसी के भी मुँह में डाला और झट से घुल गया! न ही देशद्रोही वो तमगा है कि कोई जरा -सा असहमत क्या हुआ; आपने जबरन उसके गले में ही लटका दिया और स्वयं महानता का ढोल पीट देश के सच्चे नागरिक होने की मुनादी करने लगे!
देश सबका है जनाब और देशभक्ति वो भाव है जो इस धरती की माटी पर जन्म लेते ही स्वतः ख़ून में घुल जाता है और मृत्यु पर्यन्त अनवरत बहता रहता है। आप न तो इसे पैदा कर सकते हैं और न ही छीन सकते हैं! सबूत माँगने की ग़ुस्ताख़ी तो भूलकर भी न करें क्योंकि यह आपको न केवल दुनिया की नज़रों में सदा के लिए नीचे गिरा देगा बल्कि आपकी अपनी मनुष्यता ही संदेह के दायरे में आ जाएगी।
देश सर्वोपरि है। स्वार्थ से परे हो, कभी इंसानियत से प्रेम करके देखिये, अच्छा लगेगा।  

 

 


- प्रीति अज्ञात

इस अंक में ......

आवरण: गूगल से साभार

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