Hastaksher
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2018
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संपादकीय
जब मन रोशन तो जग रोशन!
 
हम जिस समय में रह रहे हैं, वहाँ आजकल व्यस्तता और अपनी-अपनी प्राथमिकताओं के चलते विशिष्ट दिवसों के प्रति उतना अधिक उत्साह देखने को नहीं मिलता और इन्हें लेकर यदि कोई प्रसन्नता होती भी है तो वह इनसे जुड़े अवकाश के कारण ही होती है। अच्छी बात यह है कि विद्यालयों में प्रातःकालीन सभा के समय उस तिथि से जुड़े प्रसंगों की चर्चा होती है तथा विविध कार्यक्रम भी आयोजित किये जाते हैं। इसलिए बच्चों को पूरी जानकारी होती है कि आज का दिवस इतिहास में क्यों महत्त्वपूर्ण है और उसे क्यों मनाया जाता है। यूँ इसके लिए अब गूगल भी उपलब्ध है ही। पर एक बात मुझे हमेशा ही खटकती रही है कि जिस तरह हर उम्र के विद्यार्थियों में 'शिक्षक दिवस' के प्रति उत्साह नज़र आता है, वही आनंद शिक्षकों में 'बाल दिवस' के लिए दिखाई नहीं देता! यह बात मैं कई बच्चों से चर्चा के बाद ही कह रही हूँ। विद्यालयों में यह दिन पूरी तरह से उनके ही नाम कर देना चाहिए। एक दिन बिना स्कूल बैग के भी होना चाहिए। 
हम सब जानते हैं कि इस दौर के बच्चे, अपनी उम्र से कहीं अधिक जागरूक और सतर्क हैं। दुःख यह है कि उनके बचपने की अवधि अब पहले से बहुत कम हो गई है और वे अपनी उम्र की अपेक्षा समय से पूर्व ही परिपक्व और गंभीर होते जा रहे हैं। उन्हें मालूम है कि उनके युवा होते सपनों को साकार करने की राहें उतनी आसान नहीं और मात्र प्रतिस्पर्धा, सबसे बेहतर करने की भावना और कठिन परिश्रम ही लक्ष्य को साधने का एकमात्र माध्यम नहीं! अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए और बाद में भी उन्हें इसी समाज से निभाना होगा, जहाँ तनावमुक्त रहना उतना सरल नहीं रहा।
 
हम सब देख रहे हैं कि बच्चों के ऊपर केवल गृहकार्य का ही बोझ नहीं होता बल्कि उन्हें तमाम मानसिक तनावों से भी होकर गुज़रना होता है। उनकी छोटी-सी दुनिया में भी कई परेशानियाँ होती हैं। उनके शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए यह बेहद आवश्यक है कि उम्र के हर दौर में उनके पास ऐसे कुछ नाम ज़रूर हों; जिनके बारे में वो निश्चिन्त होकर सोच सकें कि "हाँ, ये वे लोग हैं जिनसे मैं अपनी कोई भी समस्या कभी भी साझा कर सकता हूँ। जो किसी भी निर्णय को मुझ पर थोपेंगे नहीं और मेरी बात ध्यान से सुनेंगे, समझेंगे।" यह काम परिवार के सदस्यों से बेहतर और कोई भी नहीं कर सकता क्योंकि यही वे लोग हैं जिनके साथ बच्चा सर्वाधिक समय व्यतीत करता है। अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाओं और धन के पीछे भागती दुनिया में यदि कहीं कुछ पीछे छूट रहा है तो वह बचपन ही है। वही बचपन, जो समय की माँग करता है! स्वयं को सुने जाने की गुज़ारिश करता है। कहते हैं, इंसान के पास जो घर में नहीं होता, वह उसी की खोज में बाहर जुटा रहता है। कितना अच्छा हो कि बच्चों को सबसे पहले यह बतला दिया जाए कि हम उनके 'सपोर्ट सिस्टम' हैं और वे अंकों की रेस में जीतें या हारें, हर चिंता को छोड़ अपनी परेशानियों में आँख मूंदकर सीधे हमारे पास चले आयें, बेझिझक अपनी बात कहें! न केवल परिवार अपितु एक सकारात्मक समाज के लिए भी यह विश्वास और जुड़ाव अत्यावश्यक है। 
बच्चे ही क्यों, हम सभी को ये प्रश्न अपने-आप से करना चाहिए और इनके उत्तर भी कंठस्थ होने चाहिए कि हमारे जीवन में ऐसे कितने 'अपने' हैं? क्या हम अपने घनिष्ठ मित्रों के संपर्क में हैं? ऐसे कितने नाम हैं, जिन पर भरोसा किया जा सकता है? उनसे अपनी मुश्किल साझा की जा सकती है? कौन हैं वे लोग जो हमारी बात सुनने या समाधान ढूँढने से पहले घड़ी नहीं देखेंगें और न ही समयाभाव का रोना रो अनायास विलुप्त हो जायेंगे? सोचना होगा, जब हर तरफ निराशा हो और आपका मन उदास...तो कौन है, जो ख़ुद बढ़कर आपको थाम लेगा? यदि ऐसा एक भी नाम न निकला तो विचारणीय है कि क्या कमाया? क्या जिया? क्या पाया?
 
हमें न केवल हमारे बच्चों का 'सपोर्ट सिस्टम' बनना है बल्कि उन्हें यह भी सिखाना है कि वे स्वयं कैसे दूसरों के जीवन में यही रोल प्ले कर कई मुस्कुराहटें उगा सकते हैं। हारते इंसानों का हौसला बन उनके जीने का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। निराशा की स्याह रात में उम्मीदों के असंख्य दीप जला रोज दीवाली मना सकते हैं। वो कहते हैं न "जब मन रोशन तो जग रोशन!"
 
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चलते-चलते:-
* दुर्घटना सदैव दुख ही देती है पर कई बार यह हताशा और क्रोध को भी जन्म देती है जैसा कि दशहरे पर अमृतसर ट्रेन हादसे में हुआ। प्रशासन और रेलवे को दोष इसलिए दिया जा सकता है क्योंकि हमारी तो मानसिकता ही इस तरह की विकसित हुई है कि स्वतंत्रता के सात दशक बीत जाने के बाद भी अब तक हमें कचरा सही जगह पर फेंकने का तरीक़ा सीखना पड़ता है, शौचालय भी सरकार के कहने पर ही बनाते हैं। ट्रेन भले ही अपने ट्रेक से गुज़रती हो पर हमें अपनी जान की चिंता छोड़कर वहाँ इसलिए बैठना है क्योंकि किसी ने रोका ही नहीं! दुर्भाग्य यह है कि इतना होने के बाद भी न तो ट्रेन के ऊपर बैठकर जाना रुका है और न ही करंट से मरने वालों की संख्या में कोई कमी आई है। बोगियों से बाहर लटकते स्टंट प्रेमियों के करतब अब भी निरंतर जारी हैं। जहाँ तक पक्ष/विपक्ष के आरोप-प्रत्यारोप के तमाशे की बात है; उसका होना भी लगभग तय ही रहता है। अब जबकि मृत्यु इतनी आसानी से उपलब्ध है तो बेहतर है कि 'जान हथेली पर' लेकर घूमने की बजाय नागरिक अपनी सुरक्षा, स्वयं करने का संकल्प लें।
** 31 अक्टूबर को नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बाँध से 3.5 किलोमीटर की दूरी पर दुनिया की सबसे ऊँची प्रतिमा 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' का अनावरण हुआ। लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की यह प्रतिमा राष्ट्रीय गौरव और एकता की प्रतीक है। आशा है, इससे पर्यटन का भी उचित विस्तार होगा। 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' भारतवर्ष में सामाजिक ढाँचे की पुष्टता और 'यूनिटी' की स्थापना में सहायक सिद्ध हो, देशवासियों की यही मनोकामना है।

- प्रीति अज्ञात

इस अंक में ......

नवम्बर 2018

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