Hastaksher
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2018
अंक -42

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संपादकीय
प्रकृति, विभाजन में विश्वास नहीं रखती!
 
सूरज कभी भी अपने नाम की तख़्ती लिए नहीं घूमता और न ही चाँद अपनी सूरत को देख स्वयं आहें भरा करता है। जीवनदायिनी प्राणवायु सरसराती हुई किसी तप्त मौसम में शीतलता ओढ़ाती और शीत ऋतु में जमकर ठिठुराती है पर आज तक उसने हौले-से भी कभी कानों के पास आकर यह नहीं कहा कि "सुनो, मैं हवा हूँ"....सागर, नदियाँ, ताल-तलैया कभी अपनी पहचान की माँग नहीं करते। ऊँचे-ऊँचे पहाड़ तक अपनी जगह मौन, स्थिर खड़े हैं किसी ने हरियाली की चादर ओढ़ी हुई है तो कोई सर्द बर्फ़ की मोटी रजाई में आसरा लिए पड़ा है, कोई पत्थरों से क्षत-विक्षत। पर अपनी-अपनी ऊँचाई के घमंड से चूर हो या दूसरे से घृणा/ईर्ष्या कर ये सब एक-दूसरे को आहत करते कभी नहीं पाए गए। वृक्षों ने भी अपने छायादार, फलदार, कँटीले, लघु-वृहद स्वरुप को लेकर कोई प्रश्न नहीं उठाये। पुष्प सदियों से मुफ़्त में ही अपनी सुगंध फैलाते आ रहे हैं। प्रत्येक देश-प्रदेश की माटी का रंग अलग-अलग पर फिर भी सभी वनस्पतियों को एक-सा प्रेम देती है। जीव-जंतुओं का आसरा भी यह भूमि ही है, जो अपने नाम का उल्लेख तक नहीं करती।
 
तात्पर्य यह कि जो देना जानता है, वह न तो अपने गुण कभी गिनाता है और न ही श्रेय लेने का प्रयास करता है। सब कुछ उसे स्वतः मिलता है। प्रकृति विभाजन में विश्वास नहीं रखती। अच्छाई स्वयं अपनी पहचान बनाती है और सद्कर्मों को गिनाये जाने की कोई आवश्यकता नहीं होती। सूरज की रोशनी ने हम में जीवन भरा, हमने बिन मांगे उसे सरताज बना दिया। चाँद की शीतलता को प्रेम से जोड़ हमने उसे पवित्र प्रेम के सर्वोच्च शिखर पर बिठा दिया। हवाओं के आगे सर झुकाया और ऋतुओं के गुणगान किये। देश-प्रदेश, पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं को उनके गुणधर्मों के आधार पर विभाजित कर संवाद हेतु सुविधाजनक मार्ग बनाया। बात यहीं पर रुक जानी चाहिए थी। परेशानी ने अपने पाँव तब पसारने प्रारम्भ कर दिए जब हमने मनुष्यों को बाँटना शुरू किया। किसी को उत्कृष्ट और किसी को निकृष्ट मानना तय कर लिया गया। किसी को सारे अधिकार मिले तो कोई युगों तक वंचित रहा। पाने का अर्थ छीनना और जीतने की परिभाषा दमन हो गई। धर्म के पक्ष में खड़े होना तो स्वाभाविक है पर अधर्म को भी सबल का आश्रय मिलता रहा। इंसानियत ने अपने अर्थ खोये। अधिक बुद्धि और तकनीक के ग़लत प्रयोगों ने न केवल अपराध को बढ़ावा दिया बल्कि इंसानों से उनके दिन-रात छीन लिए। अब हम विज्ञान और तकनीक के उपभोक्ता नहीं; ग़ुलाम बन चुके हैं। यह एक ऐसा मुश्किल समय है कि अब एक क़दम आगे बढ़ाने से बेहतर है कि दो क़दम पीछे खींच कुछ पल ठहरा जाए, विचार किया जाए कि सर्वश्रेष्ठ हो जाने की दौड़ में कितना कुछ छूट रहा है। कितनी ऐसी घटनाएँ हैं, जिनका घटित होना या उन पर हमारी चुप्पी हमें पशुओं की श्रेणी में सम्मिलित कर रही है। हम सच के साथ खड़े होने में हिचकते क्यों हैं? अन्याय का विरोध करने की शक्ति इतनी क्षीण क्यों हो गई है? हमारे भीतर की इंसानियत हमें झिंझोड़ती, धिक्कारती क्यों नहीं?
जैसे-जैसे मनुष्य बँटते गए, मनुष्यता क्यों सरकती जा रही है?
 
यहाँ यह स्वीकारोक्ति भी आवश्यक है कि निश्चित तौर पर स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से लेकर अब तक बहुत कुछ बदला है और विश्व के मानचित्र पर हमारी उपस्थिति हमें गौरवान्वित करती है। परेशानी जो है, वो घर के भीतर ही है और अब दुनिया की नज़र में आने लगी है। इससे स्वतंत्र होना हमारी प्राथमिकता होनी ही चाहिए-
गली, मोहल्ले, गाँव, शहर के स्नेह को हृदय में सजाये हुए इस देश के प्रत्येक नागरिक को सबसे पहले स्वयं को भारतीय स्वीकारना होगा। तभी वह अपने-अपने प्रदेश की वाह-वाही और दूसरे पर आक्षेप की मानसिकता से स्वतंत्र हो सकेगा। हर घटना के हिंदू-मुस्लिम मुलम्मे ने देशवासियों को सिवाय पीड़ा के और कुछ भी नहीं दिया, हमें इस पीड़ा से स्वतंत्रता चाहिए।
 
ग़रीब बचपन चीखकर रोता है, एक बेबस पिता कहीं बोझा ढोता है, इधर रोटी की प्रतीक्षा में तीन भूखे पेट दरवाज़े पर आँखें रख हमेशा-हमेशा के लिए वहीं गहरी नींद सो जाते हैं। जो रोटी न दे सके, वे उन्हीं भूखे पेटों को चीरकर मृत्यु के कारण तलाशने की कोशिशों में जुटे हैं। यह भूख का दोष ही रहा होगा कि वह कुछ नहीं कह पाती। सूखे हलक और आँतों से चिपककर सुन्न हो बैठ जाती है। हमें इस ग़रीबी और लाचारी से स्वतंत्रता चाहिए।
 
हमें भ्रष्टाचार, शोषण, अशिक्षा और अपराधमुक्त भारत चाहिए। हमें वह आज़ादी भी चाहिए, जिसमें हमारे बच्चों और प्रियजनों को घर से बाहर भेजते समय, यात्रा के समय हमारा मन सशंकित न हो और हम उनकी सुरक्षा के प्रति कोई घबराहट न महसूस करें। अंग्रेज़ों से मिली आज़ादी की क़ीमत भले ही हम ठीक से न समझ सके हों, पर फिर भी हमने इसे भरपूर जिया है। अब यह आवश्यक है कि बच्चों को भी उनके हिस्से की स्वतंत्रता मिले-
 
बहुत समय हुआ जबसे मैंने 
इन आँखों में कुछ स्वप्न पाले हैं
ज़्यादा कुछ नहीं बस इनमें 
वो हँसते-खेलते बच्चे हैं 
जो अब भी पड़ोस में खेलकर 
माँ के बुलाने पर ही घर लौटते हैं 
जिन्हें आनंद मिलता है छुट्टी की घोषणा का 
और जो हो-हो कर तालियाँ पीट 
बैग उठा गलियों में सरपट दौड़ पड़ते हैं 
बच्चे, जो बारिश में रेनकोट लिए बिना
जब चाहे घर से निकलते हैं 
छपाक-छपाक कर कहीं भी कूद पड़ते हैं
और मस्ती के किस्से सुनाते एक पल भी नहीं अघाते
जो झूलते हैं बेझिझक दादा-दादी के कन्धों पर 
और अपनी मीठी बोली से नाना-नानी तक 
दुनिया भर की तमाम शिकायतें पहुँचाते हैं
बच्चे जो भयभीत नहीं
जिन पर स्कूल और पढ़ाई का 
अंतहीन भार नहीं 
जो अब भी मिट्टी में खेलते हैं 
चहककर बाग़ में तितलियाँ पकड़ते हैं
 

 


- प्रीति अज्ञात

इस अंक में ......

आवरण: डॉ. लवलेश दत्त

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