Hastaksher
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अप्रैल 2018
अंक -41

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

बंद, दंगे और मानवता का आर्तनाद
ये न हिन्दू हैं, न मुस्लिम, न दलित और न ही किसी और धर्म-जाति से सम्बन्धित लोग! दरअस्ल ये अक़्ल से पैदल मानवों का एक ऐसा समूह है, जिसे सिर्फ़ और सिर्फ़ यही करना आता है इसीलिए आप जब, जो भी जी चाहे; इनसे करवा सकते हैं। आप इन्हें किसी का सिर फोड़ने को कहेंगे, ये फोड़ आयेंगे। किसी का घर तोड़ने का कहेंगे, ये तोड़ आयेंगे। आग लगाने का कहें, लग जाएगी। मार-कुटाई, लूटपाट, हत्या ये सब इनके लिए खेल हैं, तमाशे हैं जिन्हें दिखाने के एवज़ में इन्हें अच्छा भुगतान भी मिल ही जाता है। इनमें से कई वे लोग भी हैं, जो शराब की एक बोतल के बदले अपना वोट बेचते आए हैं अर्थात इन पर अधिक ख़र्च की भी कोई दरकार नहीं! ये अलग बात है कि दयालुतावश कोई इन्हें कभी कम्बल, साइकिल, बस्ता, लैपटॉप जैसी वस्तुएँ दे दिया करता है, कोई संवाद-कला में निपुण हो भरमा भी लेता है। तभी तो प्राय: सभी राजनीतिक दल इनके दुष्प्रभाव से सुरक्षित रहते हैं।
 
आख़िर, क्यों होता होगा ऐसा?
क्यों सभी पार्टियों की दिलचस्पी भौतिक वस्तुओं के वितरण में है और बुनियादी बातें कोई नहीं करता? क्या इन्होंने कमज़ोर वर्ग को कभी शिक्षित करने की बात की? या कि उन्हें नौकरी देकर आर्थिक रूप से स्वतंत्र एवं आत्मनिर्भर बनाने का कोई प्रयास किया? क्योंकि फिर लोगों को बरगलाना और दंगाइयों का जामा पहनाना आसान नहीं रहेगा नौकरीपेशा इंसान रोटी की जुगाड़ में दिनभर खटकर रात को जब घर आता है तो उसे दो ही चीज़ें प्यारी लगती हैं- एक है भोजन और दूसरा एकमुश्त नींद। शिक्षा भी व्यक्ति की सोच को समृद्ध करती है, उसे किसी भी बात पर विचार कर ही प्रतिक्रिया देने योग्य बनाती है। हाँ, पारिवारिक वातावरण, संस्कार और परिवेश का भी इसमें उतना ही योगदान रहता है। कहीं सभी समझदार हो गए तो वोट बैंक का क्या होगा? इसी के चलते दशकों से कुछ वर्गों को इन सुविधाओं से वंचित रखा जा रहा है। वे चाहते ही नहीं कि आप आगे बढ़ें या कुछ सीखें। उन्हें कठपुतलियाँ चाहिए, नचाने को। तो फिर, दिग्भ्रमित युवा के हाथों में पुस्तकें कौन थमायेगा?
 
ये जो आग लगाकर तमाशा देखने वाले लोग हैं; ये किसी विशेष जाति से ताल्लुक नहीं रखते। इनका एक ही धर्म है- अराजकता, हिंसा। ये हर दल और संगठन में भीतर तक घुसे हुए हैं। चाहे वो दशकों से चल रहे हिन्दू-मुस्लिम दंगे हों! गोधरा काण्ड हो, गुर्जर आंदोलन, राम-रहीम या रामपाल के समर्थकों द्वारा की गई हिंसा, करणी सेना का पद्मावत के विरुद्ध तथाकथित अभियान या प्रेम के विरोध में बजरंग दल का घृणा-नफ़रत का खेल! इनमें से अधिकांश को तो पता तक नहीं होता कि वे ऐसा कर क्यूँ रहे हैं क्योंकि उन्हें न कारण जानने में दिलचस्पी है और न ही किसी समस्या के समाधान में! ये वे नाकारा, फुरसती लोग हैं जिन्होंने इस धरती पर बेवज्ह, निरुद्देश्य, अनायास ही जन्म ले लिया है और अब उन्हें टाइम पास करना है! ये वही कुंठित लोग भी हैं जो, जब छोटे थे, तो अपनी पसंद का सामान न मिलने पर घर की एक-दो चीज़ें तोड़ दिया करते थे पड़ोसी का नुकसान करते थे और बस-ट्रेन में से जो भी निकल सके; उखाड़ लाते थे। किसी का सामान चुरा लेना तो इनके बाएँ हाथ का खेल रहा होगा। अब भी है। 
 
इन्हें राष्ट्रप्रेम की परिभाषा तक नहीं मालूम तो राष्ट्रीय संपत्ति की रक्षा क्या खाक़ करेंगे! उस पर बोनस यह है कि ऐसे किसी भी अपराधी को आज तक सज़ा ही नहीं मिली, तो मज़ा तो करेंगे ही न! आप एम्बुलेंस में अपने बच्चे को ले जा रहे हैं, वो मरे इनकी बला से! इनका मन किया तो आँख भी फोड़ देंगे! गर्भवती स्त्री के पेट को तलवार से चीरकर बच्चा निकाल लेते हैं ये लोग और सरकारें उफ़ तक नहीं करतीं! ये ट्रेन रोककर आपका इंटरव्यू में जाना रोक सकते हैं, आपकी गाड़ी में आग लगा सकते हैं, आपका घर-परिवार एक झटके में तबाह कर सकते हैं क्योंकि इनका अपना तो कोई है नहीं। गर दिखावे के लिए जेल जाना भी पड़ा तो वहाँ भी आनंद से मुफ़्त की रोटी तोड़ेंगे और आते-आते बल्ब निकाल लायेंगे।
 
विडम्बना यह है कि जब सारे दल अपने-अपने मौक़े और फ़ायदे के आधार पर इन घटनाओं की कड़ी निंदा में व्यस्त होते हैं तब हम और आप जैसे लोग कर्फ्यू में बच्चों के सुरक्षित घर लौटने की प्रार्थना कर रहे होते हैं। कोई अपनी गाढ़ी कमाई से ख़रीदी बाइक को अधजली पा, रो रहा होता है तो कोई अस्पताल पहुँचने की जुगत में बीच राह ही सिसककर दम तोड़ देता है।
'बंद' का अर्थ अब विरोध नहीं रहा यह सुनियोजित 'दंगा' है तभी तो  किसी को कोई आश्चर्य नहीं होता यूँ हम अभ्यस्त भी तो हो चले हैं
हम कैसे अपने बच्चों को यह विश्वास दिलाएँ कि यह गाँधी का देश है! धर्म-निरपेक्षता, सत्य, अहिंसा, ईमानदारी पर चलने का पाठ पढ़ाना आसान तो है पर वो कब तक चल सकेंगे? देशभक्ति और देशद्रोह की बदली हुई परिभाषाएँ उन्हें अब कौन समझा सकेगा? आख़िर हम किस तरह से यह बात साबित करें कि "भारत, एक शांतिप्रिय देश है" या कि यह कथन सिर्फ़ सीमाओं पर लागू होता है?
 
चलते-चलते: आरक्षण का एकमात्र आधार 'आर्थिक' हो। ग़रीबी के कारण कोई नागरिक शिक्षा से वंचित रह जाए तो देश के लिए इससे अधिक शर्मनाक और कुछ भी नहीं! हाँ, चयन केवल योग्यता के आधार पर ही होना चाहिए। यदि सचमुच देश का विकास चाहिए तो आवश्यक है कि जो योग्य हो; वही पद ग्रहण करे फिर चाहे वह किसी भी धर्म, सम्प्रदाय या जाति से सम्बंधित हो; अन्यथा मंत्रिमंडल को भी 'मंत्रिकमंडल' बनते देर नहीं लगती। प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या!
इधर सलमान केस ने एक बात को और भी स्पष्ट रूप से समझा दिया है कि आपकी मृत्यु की क़ीमत तभी होगी, जब आप विलुप्तता के कग़ार पर खड़े होंगे? तो क्या, उससे पहले आप संरक्षण नहीं, भक्षण योग्य हैं? अन्य जानवरों की कुचली हुई लाशें या उनके माँस पर मचा बवाल तो इसी तथ्य की ओर इंगित करता है।
कूड़ेदान में मिले नवजात शिशु या किसी बच्ची की बलात्कार कर फेंकी गई लाश की कहानी के तो हम इतने अभ्यस्त हैं और इनके अपराधियों की चर्चा कभी सुनने में नहीं आती!
क्या यह मान लिया जाए कि यदि आप बहुतायत में हैं तो मरते रहिए?
जीने का अधिकार और संरक्षण मात्र विलुप्त होती प्रजाति के लिए है? (उसके लिए भी सम्मान है)
फिर तो संरक्षित होने का पहला हक़ 'मानवता' का है और इसको नष्ट करने वाले को कड़े से कड़ा दंड देने का प्रावधान हो।

 


- प्रीति अज्ञात

इस अंक में ......

आवरण: ताराचन्द शर्मा

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