Hastaksher
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2018
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संपादकीय
'जय जवान, जय किसान' की जयकार के साथ मार्च में 'मार्च' 
 
भारत एक कृषि-प्रधान देश है, जिसकी सत्तर प्रतिशत आबादी गाँवों में निवास करती है। हम जैसे शेष तीस प्रतिशत प्राय: इन गाँवों के शहरीकरण की बात करते हुए दुःख प्रकट करते हैं, अपनी माटी की स्मृतियों को संजोये रखना चाहते हैं, जड़ों से कट जाने के भय को भी महसूस करते और जताते रहे हैं। लेकिन इस सबके बीच में हम, हमारे अन्नदाताओं की सुध लेना भूल गए। वे अन्नदाता जो हर मौसम में सारे कष्ट सहते हुए हमारे घर भोजन पहुँचाते हैं जबकि उनके अपने घरों में न जाने कितनी बार चूल्हे नहीं जलते! कितनी बार लागत से कम मूल्य मिलने पर निराश किसानों को फ़सल स्वयं ही नष्ट करनी पड़ती है।
उत्तम उपकरणों, आधुनिक खेती की गुहार लगा और उपयोगिता समझाकर, उन्हें प्रत्येक सरकार लोन तो दिलवा देती है पर शिक्षित करना सदैव भूल जाती है। तब भी यह वर्ग भूखे पेट रहकर हम सबका पेट भरता रहता है, गाहे-बगाहे उत्सवों में हँस भी लिया करता है, बदलती सरकारें यूँ भी सबकी उम्मीदें बढ़ाती आई ही हैं, इन्होनें भी बाँध लीं तो क्या गुनाह किया! पर नतीजा वही ढाक के तीन पात!
फिर यूँ भी हुआ कि किसानों का मनोबल और उम्मीद दोनों टूटने लगीं।  क़र्ज़ के बोझ से दबा किसान खेतों की बजाय पेड़ पर लटका नज़र आने लगा। हर मौत के पीछे की कहानी बनने लगी, जिससे यह सिद्ध हो सके कि उसने ग़रीबी, भुखमरी से तंग आकर नहीं बल्कि अन्य समस्याओं के चलते आत्महत्या की है। ये नियम प्रतिपादित करने वाले संभवतः यह भूलते जा रहे थे कि ग़रीब का धर्म 'रोटी' होता है और उसके जीवन की एकमात्र समस्या भी यही है।
 
इसीलिए इस बार मैं बेहद प्रसन्न हूँ। मैं इन अन्नदाताओं को इनके आंदोलन के लिए हार्दिक बधाई देना चाहती हूँ कि इन्होंने हार मानकर मृत्यु वरण करने के स्थान पर संघर्ष-पथ पर निरंतर चलते रहने को प्राथमिकता दी। यही उचित क़दम है और समय भी कि जिस देश के लिए आप अपने प्रियजनों की जान तक गँवा बैठे हैं, वक़्त आ गया है कि अब आप उससे अपने अधिकारों की माँग करें! सहनशीलता, अनुशासन और विनम्रता क्या होती है, ये कोई हमारे किसान भाइयों से सीखे! वे शिक्षित लोग जो विरोध और अपनी मांगों को पूरा करवाने के नाम पर तोड़फोड़, दंगे-फसाद में विश्वास रखते हैं, वे थोड़ी-सी सभ्यता इन पोषकों से सीखें जिन्होंने बोर्ड के विद्यार्थियों को कोई असुविधा न हो, इस सोच के साथ रात को भी चलना मंज़ूर किया; वो भी छिले-जले और लहुलुहान पैरों के साथ। इनके साथ न सुरक्षाकर्मी थे, न एम्बुलेंस। बस, एक अदद मुट्ठी-भर हौसला था, जो नासिक से मुंबई इन्हें पैदल ही खींच लाया।
परिणाम सकारात्मक रहा, सुनते हैं कर्ज़माफ़ी का आश्वासन भी मिला है लेकिन इन काग़ज़ी बातों से ही प्रसन्न हो, निश्चिन्त नहीं बैठ जाना चाहिए। खुशहाली की बातें और योजनाएँ तो वर्षों से बनती आ रही हैं पर कोई ऐसी टीम भी गठित हो, जो इन सब पर सुचारू रूप से अमल होते देखने के लिए ही कार्य करे। प्रशंसनीय बात यह है कि इक्के-दुक्के सिरफिरों को छोड़कर समस्त देशवासियों ने इनका खुलकर समर्थन किया है। पूर्व प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ने जब 'जय जवान जय किसान' का नारा दिया था तो यह उसी एकजुटता का प्रतीक था, जिसके परिणामस्वरूप देश की आर्थिक व्यवस्था परवान चढ़ती है। दुर्भाग्य से करोड़ों-अरबों की संपत्ति नाक के नीचे से गायब कर स्मार्ट, शिक्षित लुटेरे देश छोड़ देते हैं, आयोजनों-प्रदर्शनों के नाम पर पैसा पानी की तरह बहाया जाता है, पैसों का घालमेल चलता है और इधर आम जनता आलू-प्याज के भावों में उलझ निरीह किसान की कमर तोड़ उसे कोस रही होती है। लेकिन अब हमें हमारे किसानों के साथ खड़ा रहना है, क्योंकि उनकी हर समस्या अंततः हमारी ही समस्या है। हमारे इन भाइयों के समर्थन में फैज़ अहमद 'फैज़' के ये शब्द कितने सटीक हैं-
 
जब सब सीधा हो जाएगा, जब सब झगड़े मिट जायेंगे
हम मेहनत से उपजायेंगे, बस बाँट बराबर खायेंगे
 
हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्‍सा मांगेंगे
इक खेत नहीं, इक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे
 
किसान-आंदोलन इस देश का सबसे आवश्यक आंदोलन है, जो न केवल अपने अधिकारों के प्रति सचेत रहने की माँग करता है बल्कि सरकार और व्यवस्था को आगाह भी करता है। हमारे बैंककर्मी भी कई समस्याओं से जूझ रहे हैं। नोटबंदी के बाद से लेकर अब तक उन पर काम का बोझ तो दुगुना, चौगुना बढ़ता जा रहा लेकिन तनख्वाह जस-की-तस है। उस पर परेशानी यह भी कि किसी की ज़रा-सी भी ग़लती का भुगतान उन्हें अपनी जेब से ही करना होता है। हम सबके धन को सुरक्षित रखने और हमारे सपनों को पूरा करने में मददगार इन मित्रों के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए अब सरकार को भी चेत जाना चाहिए। वरना कहीं ऐसा न हो कि एक और आंदोलन की लहर उसकी पेशानी पर बल डाल दे।
सच तो यह है कि देश को किसी मंत्री की सी.डी, कपड़ों का खर्चा, विदेश की सैर, रहस्यमयी गुफाएँ और ढोंगी बाबाओं के करतब से कहीं ज्यादा इन मुद्दों पर फ़ोकस करने की आवश्यकता है। यही तगड़ा 'विपक्ष' हमें हमारे देश के पक्ष में और विकास में हमेशा साथ खड़ा रखेगा।
 
इधर होली के रंग फ़ीके ही रहे और मिठाईयों में भी मिलावट की ख़बरें स्थान बनाती रहीं। पुरानी परम्पराएँ और त्यौहार गुज़रते समय के साथ कहीं गुज़र न जाएँ, उन्हें बचाने की कोशिश ज़रूर होनी चाहिए। साथ ही इसकी आड़ में छिपी विकृत मानसिकता से परहेज़ भी करना चाहिए। 'महिला-दिवस' भी अन्य दिवसों की तरह थोड़े समर्थन और थोड़े विरोध की बलि चढ़ गया। इस दिन भी दुखद घटनाओं में कहीं कोई कमी नहीं आई। कहीं महिलाएं अपने दिवस की ख़ुशी मना रहीं थी तो कहीं कोई सूदखोरों के हाथों ज़िन्दा ही जला दी गई। कैसी विडम्बना है कि अरबों-खरबों रुपयों की चपत को आसानी से झेलने वाले देश में कुछ हजार रुपए के कारण हुए इस क्रूर और अकल्पनीय व्यवहार से एक महिला को बचाने वाला इस बार भी कोई भी नहीं था।
 
इस बीच इच्छामृत्यु के समर्थन में एक निर्णय भी आया, जो देश वैमनस्य, दुर्भावना, क्लेश, फ़साद के इंडेक्स में दुनिया में चौथे स्थान पर खड़ा है वहाँ इच्छामृत्यु का ऐतिहासिक फ़ैसला कितना सराहनीय है, यह तो आने वाला वक़्त ही तय करेगा पर क्या यह बुजुर्गों के प्रति अपराध को बढ़ावा नहीं देगा? हमारे संवेदनहीन और पैसों के लिए मर-मिटने वाले समाज में ज़मीन-जायदाद के लिए हत्याएँ होना आम बात है, इन्हें इच्छामृत्यु में बदलवाना अपराधियों के लिए कितना मुश्किल होगा? ग़रीबों को असाध्य बीमारियों से लड़ने की इच्छाशक्ति देने के बजाय उनके द्वारा मृत्यु को चुनवा लेना आसान है और सरकारी बजट भी शायद इससे संतुलित हो जाएगा। खैर, फ़िलहाल हम माननीय न्यायालय के निर्णय का आदर कर इसके उचित उपयोग की कामना अवश्य कर सकते हैं।
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चलते-चलते: इस अंक के साथ ही 'हस्ताक्षर' अपने चतुर्थ वर्ष में प्रवेश कर रहा है। हमें यह देखकर अत्यधिक प्रसन्नता हो रही है कि इन तीन वर्षों की यात्रा में हमें हमारे पाठकों और रचनाकारों का भरपूर स्नेह एवं सहयोग प्राप्त हुआ है। जैसा कि प्रथम अंक से ही स्पष्ट कर दिया गया था कि इस पत्रिका का मुख्य उद्देश्य वरिष्ठ और स्थापित साहित्यकारों के मार्गदर्शन में नए और प्रतिभावान रचनाकारों को एक मंच प्रदान करना है, हमें धर्म विशेष और राजनीति में किसी एक दल के पक्ष/विपक्ष में खड़े न होकर निष्पक्ष रहना है ; साथ ही समाज की सच्ची तस्वीर भी आप सबके समक्ष रखनी है। 'जुगाड़-प्रथा' से प्रकाशित होने वाले 'साहित्यकारों' और भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देती अपने-अपनों को पुरस्कार बाँटती तमाम साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं को मुँह-तोड़ जवाब देना भी हमारी प्राथमिकताओं में से एक है। चोर रचनाकारों के लिए भी इस पत्रिका में कोई स्थान नहीं, फिर भले ही वे स्थापित नाम क्यों न हो चुके हों।
इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हम सदैव प्रत्येक अंक को तैयार कर उसे इन सभी मानदंडों पर परख संतुलित बनाए रखने का प्रयास करते रहे हैं। हम अपने-आप को कितनी सही दिशा में ले जा पा रहे हैं यह निर्णय तो आप सुधीजन ही तय करेंगे परन्तु फ़िलहाल आप सबके प्रेम के आगे हमारी टीम नतमस्तक है। हम यह भी मानते हैं कि 'हस्ताक्षर' आपकी अपनी पत्रिका है और आपसे ही इसका अस्तित्व है। हमारा कार्य तो मात्र उचित एवं सामयिक रचनाओं का चयन कर उन्हें आप तक पहुँचाना भर है। आशा है भविष्य में भी आपसे यही स्नेह एवं सहयोग प्राप्त होता रहेगा तथा हम सब मिलकर एक सकारात्मक समाज के निर्माण में सहायक सिद्ध होंगे। हमें विश्वास है कि हमारा लक्ष्य अवश्य पूर्ण होगा, आप भी हमारे प्रति यही विश्वास बनाए रखिए। 

जय भारत!

- प्रीति अज्ञात

इस अंक में ......

आवरण: डॉ. कामरान ख़ान

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